fbpx Press "Enter" to skip to content

इस बार के जातिगत समीकरणों में उलटफेर के संकेत मिल रहे ह

  • वोट का क्षरण तो दोनों तरफ होता दिख रहा है

गौतम चौधरी

रांचीः इस बार जातिगत समीकरणों में भी थोड़ा उलट-फेर के संकेत मिल रहे हैं। उच्च वर्ग

की कुछ जातियां जो पारंपरिक रूप से विगत 25 वर्षों से भाजपा के साथ जुड़ी है वह इस

बार भाजपा से बेहद नाराज दिख रही है, जिसमें भूमिहारों का प्रतिशत ज्यादा है। ब्राह्मण

मौन है लेकिन भाजपा के प्रति नाराजगी ब्राह्मणों में भी देखने को मिल रही है। हालांकि

इसका कारण क्षणिक भी हो सकता है लेकिन इस नाराजगी का असर वोट पर पड़ना तय

माना जा रहा है। दूसरी ओर बड़ी संख्या में उच्च वर्ग के मतदाता इस बार अपने पारंपरिक

राजनीतिक दुश्मन आरजेडी यानी लालू प्रसाद यादव की पार्टी को भी वोट दे सकते हैं।

हालांकि तेजस्वी यादव के बाबूसाहब वाले बयान से बड़ी संख्या में राजपूतों ने नाराजगी

व्यक्त की है और इसका असर वोट पर भी पड़ना तय माना जा रहा है लेकिन अन्य सवर्ण

जातियों में इस बयान का कोई खास असर देखने को नहीं मिल रहा है।

दूसरी और इस बार एनडीए गठबंधन में जीतनराम माझी और वीआईपी शामिल है।

वीआईपी का वोटबैंक मल्लाहों को बताया जाता है। इस जाति का प्रभाव उत्तर बिहार में

ज्यादा है। वैसे भी मल्लाहों के बीच भाजपा का प्रभाव पहले से मजबूत रहा है। भाजपा के

रणनीतिकारों का मानना है कि भूमिहार व ब्राह्मण चाहे जितना नाराज हो लें लेकिन वे

अंततोगत्वा महागठबंधन को वोट नहीं दे सकते। चूकि आरजेडी मुसलमान और यादवों

को खुश करती रही है इसलिए अन्य पिछड़ी जातियों का वोट एनडीए को मिल सकता है।

इसी रणनीति के आधार पर इस बार भाजपा ने बड़ी संख्या में पिछड़ी जाति के उम्मीदवारों

को मैदान में उतारा है। इसका असर चुनाव परिणाम बताएगा लेकिन फिलहाल इस

रणनीति का भाजपा को फायदा होता दिख रहा है। धीरे-धीरे माहौल बदलने लगा है।

इस बार के जातिगत  समीकरण पिछली बार से अलग हैं

भाजपा और जनता दल यूनाइटेड के पारंपरिक उच्च वर्गीय वोटर एनडीए के समर्थन में

आने लगे हैं और सामाजिक अभियंत्रण के कारण इस बार भाजपा का जनाधार पिछड़ी

जातियों में भी बढ़ता दिख रहा है। ऐसे में अंतिम चरण तक एनडीए और भाजपा को

फायदा होता दिख रहा है।

इस चुनाव में चिराग पासवान की सूझ-बूझ ने लोक जनशक्ति पार्टी को व्यापक आधार

प्रदान किया है। ऐन चुनाव के वक्त देश के प्रभावशाली दलित नेता रामविलास पासवान

का निधन चिराग के लिए व्यक्तिगत क्षति हो सकती है लेकिन इसका दूरगामी प्रभाव

व्यापक पड़ने वाला है और अब चिराग दलित राजनीति के केन्द्रीय व्यक्ति के रूप में

उभरकर सामने आए हैं। इस चुनाव में चिरोग के नेतृत्व वाली पार्टी खुद के बदौलत मैदान

में है। यदि चिराग पासवान की रणनीति सफल रही तो बिहार में चुनाव बाद नया

राजनीतिक गठजोड़ बन सकता है।

कुल मिलाकर बिहार में भाजपा इस बार बड़े भाई की भूमिका में आने की पूरी कोशिश कर

रही है। भाजपा की रणनीति सफल रही तो जनता दल यूनाइटेड से ज्यादा सीटें भाजपा

जीतेगी और ऐसा हुआ तो नीतीश की जगत भाजपा का मुख्यमंत्री होगा। हालांकि नीतीश

के रहते यह उतना आसान नहीं है लेकिन फिलहाल नीतीश कुमार के सामने कोई विकल्प

भी नहीं है। हां अपनी प्रकृति के अनुरूप नीतीश कुमार फिर से पलटी मार दिए तो तेजस्वी

का मुख्यमंत्री बनाना तय हो जाएगा और इसके बाद नीतीश पर्दे के पीछे से बिहार की

राजनीति को अपने तरीके से संचातिल करेंगे। इस तमाम बिन्दुओं पर सोचने के बाद ऐसा

लगता है कि बिहार की राजनीति एक बार फिर से पलटी मारने वाली है। यह नए

राजनीतिक युग की शुरूआत हो सकती है।

[subscribe2]

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
More from ताजा समाचारMore posts in ताजा समाचार »
More from पत्रिकाMore posts in पत्रिका »
More from बिहारMore posts in बिहार »
More from बिहार विधानसभा चुनाव 2020More posts in बिहार विधानसभा चुनाव 2020 »

Be First to Comment

... ... ...
%d bloggers like this: