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समुद्री पर्यावरण को बचाने के लिए अब बड़े केकड़ों का सहारा

  • फ्लोरिया के वैज्ञानिकों का शोध निष्कर्ष

  • खरपतवार का रसायन प्रवाल को मारता है

  • कैरेबियन प्रजाति के केकड़ों का भोजन खरपतवार

  • खरपतवार खाकर प्रवाल को बचा लेते हैं यह जीव

राष्ट्रीय खबर

रांचीः समुद्री पर्यावरण इनदिनों पूरी दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। आम आदमी

भले की इस खतरे से वाकिफ ना हो लेकिन यह वैज्ञानिक जानते हैं कि समुद्री उथलपुथल

का असर पूरी दुनिया पर पड़ने जा रहा है। समुद्री जलस्तर के ऊपर उठने की स्थिति में

दुनिया के अनेक महानगर और अन्य इलाके समुद्री के अंदर समा जाएंगे। इसी तरह

समुद्री पर्यावरण के बिगड़ जाने से पूरी दुनिया के मौसम का चक्र भी बिगड़ जाएगा। समुद्र

में प्रवाल की निरंतर हो रही कमी की वजह से यह खतरा दिनोंदिन बढ़ रहा है। इसकी जांच

कर रहे शोध दल ने पाया है कि बड़े आकार के समुद्री केकड़े इसमें इंसानों की बड़ी मदद कर

सकते हैं। इस शोध के निष्कर्ष के साथ ही शोध दल ने समुद्र में इन भीमाकार केकड़ों के

संरक्षण और उनकी आबादी बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास करने की सलाह दी है। यह

जान लें कि समुद्री प्रवाल के विशाल पहाड़ों और जंगलों के बीच ही अनेक किस्म की समुद्री

मछलियों और अन्य जीवों का जीवन पलता है। प्रवाल के नहीं होने की वजह से ऐसे समुद्री

जीव भी खत्म होते जा रहे हैं। इसी वजह से समुद्री पर्यावरण के लिए प्रवाल के समूहों का

सुरक्षित होना तथा समुद्री प्रवाल के बचे रहने के लिए इन विशाल केकड़ों का होना

आवश्यक समझा गया है। समुद्र में प्लास्टिक प्रदूषण से होने वाले नुकसान के अलावा

समुद्री खरपतवार के बढ़ने से भी प्रवाल के इलाके खाली होते जा रहे हैं। यह भीमाकार

केकड़ा इन्हीं खरपतवारो को अपना भोजन बनाकर प्रवाल को सुरक्षा प्रदान करने में सबसे

महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

समुद्री पर्यावरण पर यह शोध फ्लोरिडा के समुद्र में

इसका गहन प्रयोग फ्लोरिडा के इलाके में किया गया है। वहां मिलने वाले कैरेबियन

प्रजाति के बडे आकार के केकड़े समुद्र के अंदर प्रवाल को खाने वाले खरपतवार को अपना

भोजन बनाकर यह जिम्मेदारी निभा रहे हैं। शोध दल ने समुद्र की गहराई में तथा प्रवाल

के इलाके में तेजी से बढ़ने वाले खरपतवार को भोजन बनाने वाले केकड़ों की पहचान की

है। इन केकड़ों के लगातार भोजन बनने की वजह से ऐसे खरपतवार इतने बड़े नहीं हो पाते

हैं कि वे प्रवाल समूहों को नुकसान पहुंचा सके। वरना खरपतवार के तेजी से बढ़ने की वजह

से ही प्रवाल का जीवन समाप्त हो जाता है। कुछ इलाकों में यह देखा गया कि इन केकड़ों

से आने के बाद वहां खरपतवार का इलाका पचास प्रतिशत कम हो गया। इससे प्रवाल के

समूहों को जबर्दस्त सुरक्षा मिली है। वरना जिस तेजी से प्रवाल खत्म हो रहे हैं, उससे तो

यह आशंका बनी है कि वर्ष 2100 के आते तक पूरे समुद्र से प्रवाल पूरी तरह गायब हो

जाएंगे। पहले के मुकाबले समुद्र में वैसे भी प्रवाल का इलाका बहुत कम हो गया है।

दरअसल प्रवालों के खत्म होने की एकमात्र वजह सिर्फ खरपतवार ही नहीं हैं। समुद्री

जलस्तर का तापमान बढ़ने की वजह से भी प्रवाल के इलाके साफ हो जाते हैं क्योंकि वहां

दूसरे किस्म की रासायनिक प्रतिक्रिया होती है जिससे वे मर जाते हैं।

इस शोध से जुड़े फ्लोरिया इंटरनेशल यूनिवर्सिटी के प्रोफसर मार्क ने कहा कि अब नई

जानकारी से एक नया रास्ता दिख रहा है, जिसके माध्यम से समुद्र में प्रवाल की स्थिति

को बेहतर बनाया जा सकता है। इसके लिए केकड़ों का अधिकाधिक संरक्षण प्रदान किये

जाने की आवश्यकता है।

रसायनों के प्रभाव से मर जाते हैं प्रवाल के जंगल

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों ने यह जानने की भी कोशिश की है कि आखिर खरपतवार

बढ़ने से प्रवाल के जंगल नष्ट क्यों हो जाते हैं। इस अनुसंधान में यह पाया गया कि

खरपतवार की अधिकता से जो रसायन वहां के पानी में घूलता है, उसकी मात्रा अधिक होने

पर प्रवाल पर उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसी वजह से प्रवाल मर जाते हैं।

जिन केकड़ों को इसके बचाव के लिए मददगार पाया गया है वे कैरेबियन प्रजाति के बहुत

बड़े आकार के केकड़े हैं। वैज्ञानिक शब्दावली में इन केकड़ों को मिथरेक्स स्पिनसिसीमूस

कहा जाता है। इन केकड़ों की खास बात यह है कि वे अधिक भोजन करते हैं। इसी वजह से

इस प्रजाति के केकड़े अधिक खरपतवार खा जाते हैं। जहां जहां समुद्र की गहराई में ऐसा

संकट है, उन इलाकों में अगर खरपतवार खाने वाले केकड़ों की प्रजाति को संरक्षण प्रदान

किया जाए तो प्राकृतिक तौर पर इस भीषण परेशानी का समाधान हो सकता है, ऐसा

वैज्ञानिक मानते हैं।

कुछ और रोचक खबरों को यहां भी पढ़ सकते हैं

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