झारखंड में खून जांच की प्रक्रिया में भी निजी लाभ की तैयारी

झारखंड में खून जांच की प्रक्रिया में भी निजी लाभ की तैयारी
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  • खास कंपनी के तीन टेंडर स्वीकारने का राज आखिर क्या

  • सिर्फ दो कंपनियों ने तैयार की है यह विधि

  • निविदा में अब सर्विस प्रोवाइडर भी जोड़े गये

  • अफसर की बेनामी कंपनी को फायदा देने की साजिश

संवाददाता

रांचीः झारखंड में अब खून जांच के नाम पर भी एक अधिकारी के बेनामी कंपनी को फायदा पहुंचाने की साजिश चल रही है।

दरअसल इस खेल में एक नहीं कई लोग शामिल हैं।

इनलोगों ने अपनी साजिश को अंजाम देने के लिए फिर से निविदा शर्तों में ऐसा हेरफेर किया है जो किसी खास कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए है।

चूंकि सिर्फ कंपनी को फायदा पहुंचाने के असली मकसद हल नहीं होता है।

लिहाजा इस कंपनी के तीन सप्लायरों से भी खून आपूर्ति की इस तकनीक के टेंडर में भाग लेने की नई रणनीति बनायी गयी है।

तीन के टेंडर में भाग लेने के बहाने केंद्रीय सतर्कता आयोग के दिशा निर्देशों का

गलत तरीके से पालन कर बच निकलने का रास्ता तैयार रखना है।

दरअसल झारखंड में अब खून जांच की ऑटोमैटिक विधि पर काम चल रहा है।

एनएचआरएम इसके लिए प्रक्रियाबद्ध है।

इसी संस्था ने अब जो टेंडर फाइनल किया है,

उससे दुनिया में इस विधि की जांच के लिए सबसे अधिक ख्यातिप्राप्त कंपनी ही टेंडर प्रक्रिया से बाहर आ रही है।

दुनिया में इस  काम की दो विधियां वर्तमान में प्रचलित

जान लेना जरूरी है कि ऑटेमैटिक विधि से खून जांच की दो अलग अलग विधि इस दुनिया में प्रचलित है।

इनमें से एक को होमोजेनिक्स बनाती है, जिसे आइडीनेट भी कहा जाता है।

इस विधि में सभी खून के नमूनों को एक साथ मशीन में डाल दिया जाता है।

एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत मशीन यह निर्धारित कर देती है कि

खून के जो नमूने जांच के लिए डाले गये हैं,

उनमें से कोई एचआइवी अथवा हेपाटाइटिस संक्रमण से पीड़ित है अथवा नहीं।

मशीन द्वारा संक्रमण होने की रिपोर्ट आने के बाद सभी को अलग अलग जांचा जाता है।

ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दरअसल कौन सा खून संक्रमित है।

जानकार मानते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया में संक्रमण पाये जाने की स्थिति में

सारा काम निपटने में 24 घंटे का वक्त लग सकता है।

रक्त जांच की दूसरी विधि मैनीपुल की है, जिसे रोश कंपनी ने तैयार किया है।

इस विधि में एक साथ छह छह नमूने जांच के लिए डाले जाते हैं।

छह घंटे में यह मशीन बता देती है कि खून में कौन सा संक्रमण है।

संक्रमण की रिपोर्ट आने पर संक्रमित सैपल की विस्तारित जांच की जाती है।

झारखंड एनएचआरएम पर एक प्रभावी गुट का कब्जा

झारखंड एनएचआरएम से मिली जानकारी के मुताबिक वहां का एक प्रभावशाली गुट

किसी तरीके से आइडीनेट विधि के टेंडर को पास कराना चाहता है।

मामले की भनक मिलने के बाद जब संबंधित चिकित्सकों से जानकारी ली गयी

तो सभी ने स्वीकार किया कि उन्हें इसी पक्ष में मत देने का दबाव डाला गया था।

लेकिन वे नौकरी करते हैं इसलिए किसी किस्म के विवाद में पड़ना ही नहीं चाहते हैं।

इस विवाद की राष्ट्रीय परीक्षण में यह बात सामने आयी कि

भारत में अभी तक इस खून जांच के साठ उपकरण लगाये गये हैं।

इनमें से 44 रोश कंपनी के मैनीपुल विधि से काम कर रहे हैं।

शेष 16 मशीन आइडीनेट पद्धति पर आधारित हैं।

आइटीनेट विधि से ही रक्त जांच की मशीन खरीदने के आग्रह पर

थोड़ा विवाद होने पर बड़े लोगों ने निविदा की शर्तों में निर्माता के साथ साथ

स्थानीय सर्विस प्रोवाइडर की शर्त को जोड़ दिया।

सारे नियम कानूनों को तोड़ा मरोड़़ा जा रहा है

इससे स्पष्ट होता है कि दरअसल तीन निविदादाताओं के भाग लेने की शर्त पर धूल झोंकने का काम किया जा रहा है।

मामले की जांच में यह पता चल रहा है कि दरअसल विभाग के ही एक अफसर ने इसी कंपनी का बेनामी ठेका ले रखा है।

जिस कारण वह अपनी बेनामी कंपनी को ही लाभ पहुंचाने के लिए सारा खेल खेल रहे हैं।

इसमें उन्होंने एनएचआरएम के कुछ अन्य लोगों को भी मिला लिया है।

दूसरी तरफ यह भी पता चला कि दरअसल जिस कंपनी को दरकिनार करने की साजिश रची जा रही है, वह रोश कंपनी दुनिया की श्रेष्ठ 25 कंपनियों में से एक है।

यानी अनेक भारतीय कंपनियों के मुकाबले भी उसका वैश्विक स्थान बहुत ऊपर है।

दुनिया की इस अन्यतम श्रेष्ठ कंपनी को दरकिनार कर पूरी प्रक्रिया से फिर से कमाई करने की साजिश रची गयी है।

वैसे इसी क्रम में यह भी स्पष्ट हो गया है कि हाल के दिनों में एनएचआरएम द्वारा जारी किये गये अधिकांश निविदाओं में इस किस्म का गोरखधंधा हुआ है।

जिसका लाभ चंद अधिकारियों की बेनामी कंपनियों को मिला है।

खून जांच के संबंध में जब रिम्स के ब्लड बैंक के प्रभारी डॉ एके श्रीवास्तव से जानकारी मांगी गयी

तो उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि उनकी तरफ से दोनों ही विधियां दुनिया में मान्यता प्राप्त हैं।

इसलिए टेंडर करने वालों को यह तय करना है कि कौन सी मशीन ली जाए

ताकि सरकार के साथ साथ मरीजों को भी उसका बेहतर लाभ मिले।

उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने किसी खास मशीन को ही लेने जैसी कोई सिफारिश भी नहीं की है।

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