fbpx Press "Enter" to skip to content

भोला प्रसाद सिंह बिहार में प्रथम गैर-कांग्रेसी सरकार के सूत्रधार

  • मूलवासी मोर्चा का गठन कर झारखंड मुक्ति मोर्चा का रास्ता बनाया था

ई. प्रभात किशोर
अपर राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी
बिहार शिक्षा परियोजना परिषद, पटना

पटनाः भोला प्रसाद सिंह एक ऐसा नाम है, जिसे बिहार की राजनीति में गैर कांग्रेसी

सरकार केसूत्रधार के तौर पर हमेशा याद किया जाएगा। बिहार में जब कभी समाजवाद के

दर्शन की लहर उभरती है तथा उपेक्षित वर्ग के वास्तविक कल्याण की बात उठती है, तब-

तब लगभग 60 वर्षों तक राज्य एवं देश की राजनीति में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले

समाजसेवी धुरन्धर बाबू भोला प्रसाद सिंह का नाम दृष्टिपटल पर स्वतःउकरित हो जाता

है । राज्य में जुझारू समाजवाद की नींव रखने वाले भोला बाबू का जन्म 1 जनवरी 1932

को पाटलिपुत्र की पवित्र भूमि पर काली मंदिर चैहट्टा पटना सिटी में एक परम्परागत

किसान कुर्मी परिवार में हुआ था । उनके पिता श्री देवशरण सिंह उच्चतम न्यायालय में

नामी वकील थे तथा माता श्रीमती मुन्दर कुंवर एक धार्मिक महिला थीं। उनका जन्म

जिस कमरे में हुआ था वहां पूर्व से एक शिवलिंग स्थापित था, जिस कारण परिवार वालों ने

उनका नाम ‘‘भोला‘‘ रखा । उन्होनें सन् 1945 में पटना विश्वविद्यालय से मैट्रिक, सन्

1950 में स्नातक प्रतिष्ठा तथा सन् 1952 में बैचलर ऑफ लॉ की डिग्री प्राप्त की । सन्

1951 में उनका विवाह तत्कालीन मेकैनिकल इंजीनियर श्री नारायण प्रसाद की पुत्री

विद्यावती से हुआ । सन् 1952 में उन्होंने ‘‘बार‘‘ ज्वाइन किया तथा जनवरी 1956 में

पटना उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में नामांकित हुए।

भोला प्रसाद सिंह ने लोहिया का रास्ता पकड़ा था

सन् 1955 में राम मनोहर लोहिया ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से अलग होकर सोशलिस्ट

पार्टी का गठन किया तथा कांग्रेसी सरकार के कुशासन के विरूद्ध स्वतंत्र भारत में पहली

बार सत्याग्रह की शुरूआत की । भोला बाबू इस दल के सदस्य बने तथा उन्हें पूरे बिहार में

आंदोलन की रूपरेखा तय करने एवं उसके आयोजन की जबाबदेही सौंपी गयी । सत्याग्रह

के दौरान उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर डॉ लोहिया के साथ

हजारीबाग जेल में रखा गया । आंदोलन के सिलसिले में उन्हें पुनः 1968 में गिरफ्तार कर

लिया गया। उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सचिव तथा कोषाध्यक्ष के रूप में पार्टी के

उतरदायित्व का वहन किया ।मात्र 30 वर्ष की छोटी आयु में सन् 1962 में भोला बाबू

विधान सभा क्षेत्र से सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में कांग्रेसी उम्मीदवार को

पराजित कर पहली बार बिहार विधान परिषद के लिए चुने गए । सन 1967 में वे संयुक्त

सोशलिस्ट पार्टी विधायक दल के उपनेता तथा विधान परिषद में नेता बनाये गए । सन्

1967 में बिहार में धुर विरोधी विचारधारा वाले दलों को एक मंच पर लाकर प्रथम गैर-

कांग्रेसी सरकार के गठन में उन्होने सूत्रधार की निर्णायक भूमिका निभायी थी। महामाया

प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व वाले इस मंत्रिमंडल वे स्थानीय प्रशासन, निगरानी, आवास एवं

पर्यटन विभाग के कैबिनेट मंत्री बने ।

कई बड़े नेताओं के खिलाफ जांच बैठाने का साहस किया

निगरानी विभाग के मंत्री रहते हुए उन्होंने पूर्व कांग्रेसी मंत्रिमंडल के मुख्यमंत्री श्री कृष्ण

वल्लभ सहाय एवं पूर्व धाकड़ मंत्रियों महेश प्रसाद सिन्हा, सत्येन्द्र नारायण सिन्हा,

रामलखन सिंह यादव, राघवेन्द्र नारायण सिंह तथा अम्बिका शरण सिंह के विरूद्ध

भ्रष्टाचार की जांच हेतु उच्चतम न्यायालय के निवर्तमान न्यायाधीश श्री टी0 एल0

वेंकटराम अय्यर की अध्यक्षता में जांच आयोग का गठन कर बिहार हीं नहीं, देश की

राजनीति में भूचाल ला दिया । आयोग ने सभी आरोपितों को दोषी पाया । सन् 1968 में

विधान सभा क्षेत्र से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में विधान परिषद के

लिए वे दूसरी बार निर्वाचित हुए । वे 1970 में कर्पूरी ठाकुर मंत्रिमंडल में योजना एवं

भ्रष्टाचार निरोध विभाग के मंत्री बने । उन्होंने भ्रष्टाचार निरोध विभाग को और धारदार

बनाने के उद्देश्य से उसे ‘‘निगरानी विभाग‘‘ के रूप में पुनर्गठित किया । उन्होने भारत

सेवक समाज के माध्यम से निर्मित कोशी बांध में अनियमितता हेतु तत्कालीन केन्द्रीय

मंत्री स्व0 ललित नारायण मिश्र एवं भारत सेवक समाज के अन्य प्रतिनिधियों के विरूद्ध

न्यायाधीश दत्ता के नेतृत्व में आयोग का गठन किया ।

साठ के दशक में बिहार की राजनीति के एंग्री यंग मैन बने

साठ एवं सत्तर के दशक में बिहार की राजनीति में उग्र ऐंग्री यंग मैन के रूप में चर्चित

भोला बाबू विपक्ष दलों के वे मुख्य आवाज रहे । जन समस्याओं पर सरकार से दो-दो हाथ

करने में उनका कोई सानी था । उनके जुझारू व्यक्तित्व के कारण पटना के प्रेस जगत में

उन्हें गंभीरता से कवर किया जाता था । सन् 1971 में श्री धर्मवीर सिंह के बाढ़ लोकसभा

निर्वाचन क्षेत्र से सांसद चुने जाने के उपरान्त बख्तियारपुर विधान सभा की सीट रिक्त हो

गयी । उस सीट पर हुए उपचुनाव में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में

भोला बाबू कांग्रेस प्रत्याशी को पटखनी देते हुए पहली बार विधान सभा के लिए चुने गए

और सन् 1972 में विधान परिषद की सीट से त्याग पत्र दे दिया । सन् 1972 में वे विधान

सभा में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उपनेता बने । सन् 1974 में सम्पूर्ण क्रान्ति आंदोलन

के प्रथम दौर में आंदोलन की रूपरेखा पर उनका जयप्रकाश नारायण से मतभेद हो गया ।

परिणामस्वरूप जेल से बाहर आने पर वे आंदोलन से अलग हो गए और भारतीय

सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की एवं उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष बने । इस पार्टी को आठ

राज्यों क्रमशः केरल, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, बिहार एवं

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग के द्वारा मान्यता प्रदान की गयी। सन् 1977 में जनता

पार्टी की लहर के बावजूद भोला बाबू ने हरनौत विधान सभा क्षेत्र से जनता पार्टी के

उम्मीदवार नीतीश कुमार को शिकस्त दी तथा उनकी पार्टी को बिहार विधान सभा में दो

सीट मिली। सन् 1980 में हरनौत के बदले हिलसा विधान सभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा, पर

लगभग 2000 मतों से पराजय का सामना करना पड़ा ।

रांची लोकसभा सीट पर भी चुनाव लड़े थे पर हार गये

सन् 1980 में उन्होंने राॅंची लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा, पर सफल नहीं हो सके । सन्

1986 में वे कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए तथा सन् 1988 में उन्हें बिहार पाठ्यपुस्तक

निगम का अध्यक्ष बनाया गया । सन् 1990 में हरनौत विधान सभा क्षेत्र से वे जनता दल

के प्रत्याशी के रूप में उतरे, पर स्वजातीय मतों के बिखराव के कारण एक निर्दलीय

उम्मीदवार बृजनंदन यादव से पराजित हो गए । सन् 1995 में उन्हें दानापुर विधान सभा

क्षेत्र से जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व वाले नवगठित समता पार्टी का उम्मीदवार बनाया गया,

पर यादव बहुल इस सीट पर वे तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद से पराजित हो गए । सन्

1998 में वे राज्यपाल के द्वारा मनोनीत होकर तीसरी बार बिहार विधान परिषद् के

सदस्य बने । सन् 2007 में उन्हें बिहार नागरिक परिषद् का वरीय उपाध्यक्ष बनाया गया ।

वे अनेक सरकारी आयोगों, समितियों सहित विभिन्न पार्टी संगठनों के अध्यक्ष, संयोजक

तथा सदस्य रहे ।

सिर्फ राजनीति हीं नहीं, सामाजिक क्षेत्र में भी भोला बाबू ने अपने दायित्व का जोरदार

तरीके से निर्वहन किया । सन् 1962 में चीनी आक्रमण के विरूद्ध संसद सदस्यों रामशेखर

सिंह एवं राजेन्द्र सिंह के साथ मिलकर पटना में विशाल सभा का आयोजन किया जिसमें

निवर्तमान राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद एवं फिल्ड मार्शल के एम करियप्पा ने भी भाग

लिया । सन् 1961 में उन्होने स्वामी दयानंद सरस्वती के सहयोग से ‘‘जाति तोड़ो

सम्मेलन‘‘ का आयोजन किया, जिसे राम मनोहर लोहिया एवं जयप्रकाश नारायण ने भी

संबोधित किया ।

उनकी पहल पर गठित मूलवासी मोर्चा से झामुमो की नींव पड़ी थी

सन् 1963 में उन्होंने रांची क्षेत्र में कुर्मी समाज एवं आदिवासियों के हितार्थ ‘‘मूलवासी

मोर्चा‘‘ का गठन किया, जो कालान्तर में ‘‘झारखंड मुक्ति मोर्चा‘‘ के उदय में सहायक

सिद्ध हुआ । सन् 1971 में पटना में ‘‘कुर्मी सम्मेलन‘‘ एवं ‘‘पिछड़ा वर्ग सम्मेलन‘‘ का

आयोजन कर समाज के कमजोर एवं वंचित वर्ग को एकजुट करने में उन्होंने महती

भूमिका अदा की, जिसमें सरदार पटेल के पुत्र श्री डाह्या भाई पटेल एवं पुत्री मणि बहन

पटेल की भागीदारी महत्वपूर्ण रही । उन्होंने नालन्दा जिलान्तर्गत हरनौत में गुरूसहाय

देवशरण मेमोरियल कॉलेज की स्थापना कर इस पिछड़े क्षेत्र को उच्च शिक्षा की मुख्य

धारा से जोड़ा । उनके द्वारा समाज के कमजोर वर्ग को समर्पित ‘‘शम्बूक‘‘ नामक

साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन भी किया गया । डॉ लोहिया के विचारों से सराबोर रहने एवं

उनका प्रियपात्र होने के कारण भोला बाबू ‘‘लिटल लोहिया‘‘ के रूप में चर्चित रहे ।

आजीवन समाजवादी विचारधारा से ओत प्रोत यह महान राजनीतिज्ञ 9 अक्टूबर सन्

2017 ई. को संसार को अलविदा कह पंचतत्व में विलीन हो गया।

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
More from झारखंडMore posts in झारखंड »
More from ताजा समाचारMore posts in ताजा समाचार »
More from नेताMore posts in नेता »
More from बिहारMore posts in बिहार »

One Comment

... ... ...
%d bloggers like this: