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सांस्कृतिक क्रांति के अग्रदूत लोकरत्न भिखारी ठाकुर




  • देवेन्द्र नाथ तिवारी

पटनाः सांस्कृतिक क्रांति का बिहार के परिदृश्य में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। क्रमिक

विकास के इस सामाजिक दौर में यह सबसे बेहतर और कारगर पैमाना होता है। दूसरे

शब्दों में किसी भी समय, समाज और संस्कृति के संबंध में जानकारी प्राप्त करने हेतु

सबसे बेहतर तरीका उस समय, समाज और संस्कृति के वाचिक, लौकिक और लिखित

साहित्य को पढ़ना होता है। साहित्य में तत्कालीन समय, समाज, संस्कृति, देशकाल,

भाषा, इतिहास, वेशभूषा आदि का विस्तृत वर्णन पढ़ने व जानने को मिलता है। भोजपुरी

लोक साहित्य के लोकरत्न भिखारी ठाकुर के लिखे- रचे नाटक अपने दौर के इतिहास को

बताते ही हैं वह एक बेहतर भविष्य के लिए तत्कालीन समाज को शिक्षित भी करते हैं,

जागरूक भी करते हैं। भोजपुरी प्रदेश के सांस्कृतिक आकाश में ‘भिखारी ठाकुर’ का उदय

एक नक्षत्र की तरह हुआ। यह नक्षत्रीय घटना आज के भोजपुरी समाज के सांस्कृतिक एवं

सामाजिक चेतना का अवलंबन बन गया है।‌ वस्तुत: भिखारी आम जन की चेतना के

पर्याय हैं‌। यह कला और कलाकार की प्रधानता ही है कि सदैव समाज में सद्भाव का

वातावरण बनाता रहता है। वैसे भी कला व्यक्ति को संवेदनशील और विनम्र बनाती है।

यह भिखारी द्वारा सृजित कलाओं में देखी, सुनी जा सकती है। 18 दिसंबर, 1887 को

छपरा के कुतुबपुर में जन्में भोजपुरी के पहरूआ भिखारी ठाकुर भोजपुरी लोक संस्कृति के

अमर संवाहक हैं। भोजपुरिया माटी की गोद में खेले, भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी को एक

नयी और अलग पहचान दिलाने की ठानी, यही कारण रहा कि उन्होंने भोजपुरी को ही

अपने काव्य और नाटक की भाषा बनाया। ख्यातिलब्ध आलोचक महेश्वराचार्य की एक

टिप्पणी भिखारी ठाकुर के व्यक्तित्व का भाष्य करने में सक्षम है। “गोली से भी नहीं दबने

वाली जनता कान पात कर भिखारी को सुनती थी‌।

सांस्कृतिक क्रांति का जीता जागता उदाहरण दे भिखारी ठाकुर

क्या मजाल था कि भिखारी के मंच पर होते किसी के मुँह से कोई आवाज निकल सके।

भिखारी, विभूति थे उनमें अप्रतिम प्रतिभा थी।” भिखारी ठाकुर का परिचय इन दो

पंक्तियों से समझा जा सकता है- केहु कहत बा राय बहादुर, केहु कहत बा शेक्सपीयर/ केहु

कहत बा कवि भिखारी, घर कुतुबपुर दियर… रचने और अभिनय करने की अद्भुत क्षमता

से संपन्न भिखारी ने भोजपुरिया समाज को सांस्कृतिक रूप से जागरुक, तार्किक,

विवेकशील एवं आधुनिक बनाने का कार्य किया। उन्होंने स्त्री-दासता के दंश को बड़े करीब

से देखा-परखा था, दु:ख से बेजार नारी शक्ति के पक्ष में खड़ा होने के अद्भुत सामर्थ और

कौशल से भिखारी विभूषित थे। उनकी रचनाएँ जीवन के यथार्थ को ही अभिव्यक्त करती

हैं।

बेमेल विवाह पर ‘बेटी-वियोग’ की नायिका कहती है-
रूपिया गिनाई ले लऽ/पगहा धराई दिहलऽ/चेरिया के छेरिया बनवलऽ ए बाबू जी/ के अइसन जादू कइल/पागल तोहार मति मइल/बूढ़े घरे बेटी भसिअवलऽ ए बाबू जी…
भिखारी लोकमानस के अद्भुत चितेरे थे।

अपना विधा से सामाजिक कुरीतियों पर लगातार चोट किया

लोक के हर राग को उन्होने स्वर दिया, हर पीड़ा को अभिव्यक्त किया एवं कुरीतियों पर

पुरजोर वार भी किया‌‌‌। भिखारी के नाटकों में जो मनुष्यता की चीख है, पलायन, प्रवसन

और विछोह, वियोग का जो वर्णन है वह आप को चैन से नहीं रहने देती। उनके नाटक जैसे

बिदेसिया, गबर-घिचोर, बेटी-वियोग, बेटी बेचवा, विधवा विलाप, गंगा स्नान, भाई विरोध,

कलयुगी प्रेम ने एक नई चेतना फैलाई। जीवन भर सामाजिक कुरीतियों और बुराइयों के

खिलाफ कई स्तरों पर जूझते हुए भिखारी सांस्कृतिक क्रांति और सामाजिक बदलाव के

संवाहक बने।

अपने नाटकों के माध्यम से समाज में फैली कुरीतियों पर उन्होंने ज़बरदस्त प्रहार किया।

कई बार वे हमले या आलोचना के भी शिकार हुए बावजूद इसके सच बोलने का ख़तरा

उठाया। जातिवाद, भेदभाव, पितृसत्तात्मक समाज, विधवा शोषण, अनैतिकता, बेटी

बेचने के रिवाज पर उन्होंने करारा प्रहार किया। उनकी खूब आलोचना हुई मगर कभी झुके

नहीं। उनकी कला में वह सादगी और सरलता है जिसके लिए बड़े-बडे़ कलाकार तरसते हैं।

लोकसंगीत और लोकरूचि के इस पारखी को गुरू के संपर्क में रमना और अपने श्रोताओं

दर्शकों को रमाना भी अच्छा लगता है। भिखारी की इस लोक परंपरा को पानी मिलता रहे

यह समय और समाज दोनों के लिए बेहद जरूरी है। वर्ष 1971 में 10 जुलाई को सांस्कृतिक

क्रांति की जीती जागती मशाल यानी भिखारी का 83 की उम्र में निधन हो गया



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