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भारत से भी मिलने लगे हैं कोरोना चिकित्सा के बेहतर संकेत

  • स्वदेशी वैक्सिन के शोध में हो रही है तरक्की

  • अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनुसंधान केंद्र हैं भारत में 

  • भारतीय वैज्ञानिकों को पहले से ही वैश्विक मान्यता

  • केंद्र सरकार के साथ नियमित समन्वय के साथ काम

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः भारत से भी कोरोना के ईलाज के संबंध में बेहतर संकेत मिल रहे हैं।

औपचारिक तौर पर कोई एलान नहीं होने के बाद भी भारतीय कंपनियां वैक्सिन बनाने की

दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है, इसका पता चल जाता है। याद रहे कि पीएम केयर्स फंड

से भी इस अनुसंधान के लिए अलग से एक सौ करोड़ रुपये आवंटित किये गये हैं। मिली

जानकारी के मुताबिक देश में भारत में वैक्सिन तैयार करने के काम में दुनिया के सबसे

बड़े वैक्सिन निर्माता सीरम इंस्टिटियूट के अलावा जायडस कैडिला, भारत बॉयोटेक,

इंडियन इम्युनोलॉजिस और माइनवैक्स जैसी कंपनियां काम कर रही है। सभी ने अपने

अनुसंधान के बारे में सार्वजनिक जानकारी देना बंद कर रखा है। समझा जाता है कि केंद्र

सरकार की तरफ से कुछ ऐसी हिदायत भी है। लेकिन दुनिया के वैक्सिन अनुसंधान से जुड़े

अन्य केंद्रों के साथ उपलब्धियों के आंकड़े साझा किये जा रहे हैं। इन तथ्यों के आधार पर

देश के जेनेटिक वैज्ञानिक मान रहे हैं कि अनुसंधान जिस दिशा और गति से आगे बढ़ रहा

है, उससे यह उम्मीद की जा सकती है कि इसी साल भारत से भी वैक्सिन तैयार कर सारी

दुनिया को इसे उपलब्ध कराने का काम प्रारंभ हो सकता है। भारत से भी दुनिया को इस

मामले में यही उम्मीद भी बंधी हुई है।

भारत से भी पूरी दुनिया को उम्मीद

भारत में वैक्सिन तैयार करने में जुटी कंपनियों के साथ केंद्र सरकार के तालमेल के लिए

अलग से एक समन्वय डेस्क की स्थापना की गयी है। इसके माध्यम से कहां का शोध

किस मुकाम तक पहुंच रहा है, उस बारे में सरकार को जानकारी दी जा रही है। वैसे

भारतीय जानकर इस बात से इंकार नहीं करते कि फिलहाल भारतीय शोध दुनिया के

अन्य विकसित देशों के मुकाबले अधिक पिछड़ा हुआ है लेकिन भारतीय बुद्धिमत्ता और

तकनीक की वजह से शीघ्र से यह दूसरों से आगे निकल जाने का माद्दा रखती है। भारत में

जो कंपनियां वैक्सिन तैयार करने के काम में जुटी हैं, उनमें से सीरम इंस्टिटियूट, जायडस

कैडिला, इंडियन इम्नुनोलॉजिस और भारत बॉयोटेक को विश्व स्वास्थ्य संगठन की सूची

में भी शामिल कर लिया गया है। देश के प्रमुख वाइरोलॉजिस्ट शाहीद जमील ने इस बारे में

औपचारिक टिप्पणी की है कि भारत की वैक्सिन बनाने की क्षमता पूरी दुनिया में

अद्वितीय है। इसलिए भारत के लिए यह काम कर पाना कोई कठिन चुनौती कभी नहीं

रही है। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि इन सभी भारतीय कंपनियों के काम करने की

गुणवत्ता भी दुनिया की श्रेष्ठतम कंपनियों के मुकाबले बेहतर है।

यहां कोरोना के संक्रमण के कारण आंकड़े भी अधिक हैं

इसलिए जब यहां काम हो रहा है तो आने वाले दिनों में भारत के अपने परिवेश और

स्थानीय कोरोना के आंकड़ों के आधार पर वर्तमान वायरस के स्वरुप के आधार पर

वैक्सिन बनाने का काम और गति प्राप्त करेगा। अभी पशुओं पर जो प्रयोग हो रहा है

उसके सफल होने के बाद इंसानों पर क्लीनिकल ट्रायल के लिए भी भारतीय परिवेश

अनुकूल है और अभी यहां कोरोना का विस्तार जारी है। लेकिन यह एक तय मानदंड पर

आधारित प्रक्रिया होने की वजह से उनमें कोई जल्दबाजी नहीं की जा सकती है। वैसे भी

ऐसे मामलों में जल्दबाजी के और घातक परिणाम हो सकते हैं। इस संबंध में

सीएसआइआर के सहयोगी शोध केंद्र सीसीएमबी के निदेशक राकेश मिश्र ने कहा कि अभी

के हिसाब से भारत से वैक्सिन तैयार करने का काम अन्य देशों के मुकाबले पीछे चल रहा

है। लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों के अनुभव और उनकी कार्यदक्षता अपने आप में श्रेष्ठ है।

लिहाजा काम के जैसे जैसे परिणाम निकलेंगे, वैक्सिन बनाने का यह काम और तेज होता

चला जाएगा क्योंकि भारत के पास इसके जानकार वैज्ञानिक और आधुनिक संसाधन

पहले से मौजूद हैं। इसके लिए भारत को बाहर से कुछ हासिल करने की आवश्यकता नहीं

है। वैश्विक महामारी के लिए वैक्सिन तैयार करने के अनेक सिद्धांत सामने आये हैं लेकिन

व्यवहारिक पक्षों की समीक्षा करने के बाद ही चंद सिद्धांतों पर वास्तव में काम प्रारंभ किया

जा सकता है।

अमेरिका और चीन ने ट्रायल सफल होने का किया है दावा

इस बीच अमेरिका और चीन ने अपनी अपनी वैक्सिन के प्रथम क्लीनिकल ट्रायल के

सफल होने का दावा किया है। अमेरिका की कंपनी मार्डेना की सफलता के रिपोर्ट सामने

आने के तुरंत बाद चीन की कंपनी कानसिनो बॉयोलॉजिक्स ने भी ऐसा ही दावा किया है।

दोनों ही कंपनियां अब क्लीनिकल ट्रायल के दूसरे दौर में हैं। इस दूसरे ट्रायल के बाद दवा

का अधिक बड़े पैमाने पर तीसरा और अंतिम क्लीनिकल ट्रायल होना है। इस बीच

संकलित आंकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में कोरोना वैक्सिन तैयार करने के लिए एक सौ

से अधिक शोध केंद्र काम कर रहे हैं। सभी की अपनी अपनी तकनीक है।

इस बीच ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने अपने यहां चल रहे वैक्सिन के प्रयोग के अब तक

के निष्कर्षों का आधार पर यह संकेत दिया है कि उन्हें इससे पचास फीसदी सफलता

मिलने की उम्मीद है। शोध से जुड़े वरिष्ठ वैज्ञानिक मानते हैं कि दस हजार स्वयंसेवकों

के साथ इस अनुसंधान को आगे बढ़ाने के लिए ब्रिटेन में इस रोग के और फैलने की प्रतीक्षा

की जा रही है। लेकिन अब तक जो कुछ नतीजे आये हैं, उससे ऐसा लगता है कि उनका यह

प्रयोग 50 प्रतिशत ही सफल हो पायेगा।


 

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