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हिमालय के नीचे के ढांचा के खतरे को समझना होगा




  • चमोली हादसे के बाद पुरानी बातों को दोहराना का फायदा नहीं

  • हिमालय के नीचे टकराते हैं दो टेक्टोनिक प्लेट

  • यहां की जमीन बहुत ही कमजोर स्थिति में

  • चीन की तरफ पहले ही हो चुका है हादसा

राष्ट्रीय खबर

सबसे पहले वीडियो देखकर समझ लीजिए क्या है माजरा

रांचीः हिमालय के नीचे की जमीन दूसरे इलाकों जैसी मजबूत नहीं है। ऊपर से यहां दो

टेक्टोनिक प्लेटों का संगम स्थल है। यहां एक तरफ भारतीय टेक्टोनिक प्लेट यूरेशियाई

टेक्टोनिक प्लेट के नीचे सरकती जा रही है तो दूसरे तरफ अन्य टेक्टोनिक प्लेटों के बीच

होने वाली रगड़ का प्रभाव सबसे अधिक इसी इलाके पर ऊपर की तरफ नजर आता है

क्योंकि यह कमजोर नींव का इलाका हैसमुद्र की गहराई में जब ऐसे उथल पुथल होते हैं

तो अधिकांश मामलों की जानकारी सिर्फ वैज्ञानिकों को होती है। लेकिन जब जमीन की

सतह के ऊपर कोई बड़ा हादसा घटित हो जाता है तो लोग इस पर फिर से बहस करने

लगते हैं। अब चमोली हादसे के बाद फिर से टिहरी डैम के अलावा भी अन्य डैमों का

निर्माण सहित इस कमजोर जमीन पर डाला जा रहा बोझ चर्चा के केंद्र में है।


कुछ और महत्वपूर्ण पुराने समाचार यहां पढ़ लें


वैज्ञानिक नंदादेवी ग्लेशियर के विस्फोट के संबंध में पूर्व में दी गयी जानकारी से इत्तेफाक

नहीं रखते हैं। उनके मुताबिक जमीन की मजबूत और खुरदरी सतह तथा बर्फ की मोटी

चट्टान के बीच शायद दरारों की वजह से पानी अधिक चला गया था। वैसे भी दो दिन की

बारिश और बर्फवारी के बाद वहां तेज धूल खिली हुई थी। बर्फ की पर्त के निचली सतह से

जब पानी का प्रवाह अधिक हो गया तो पथरीली जमीन और बर्फ के बीच का संपर्क टूटा।

इसी वजह से विशाल ग्लेशियर खंड फिसलकर नीचे आ गिरे। लेकिन इसके लिए भी

इंसानों तक पैदा किये गये प्रदूषण की महत्वपूर्ण भूमिका है। वरना आम तौर पर बर्फ का

जमना और पिघलकर पानी बनने की हिमालय के निकलने वाली तमाम नदियों का

आधार है। ऊपर अगर यह संतुलन बिगड़ता है तो नीचे तक उसका कुप्रभाव पड़ना एक

स्वाभाविक बात है।

हिमालय के नीचे की जमीन की जानकारी तो पहले से है

वैसे वैज्ञानिकों ने इस संदर्भ में यह याद दिलाया है कि इससे पूर्व चीन भी ऐसी परेशानियां

झेल चुका है। प्रदूषण के मामले में सबसे बुरा रिकार्ड चीन का ही है। वहां भी वर्ष 2016 के

जुलाई महीने में ऐसा ही हादसा हुआ था। तिब्बत के अरु पर्वतमाला के अनेक इलाकों पर

जमा बर्फ फिसलकर नीचे आ गिरा था। वहां के हादसे में करीब तीन वर्ग मील का इलाका

ही बर्फ से पूरी तरह ढक गया था। उस हादसे में नौ लोग मारे गये थे जबकि सैकड़ो मवेशी

इस ग्लेशियर के टूटने से बने मलवे में दब गये थे। उस घटना के कुछ महीनों बाद फिर से

उसी स्थान पर ऐसी ही घटना की पुनरावृत्ति हुई थी। पहली घटना के बाद से ही वहां के

तथ्यों की जांच कर रहे वैज्ञानिकों ने दोनों घटनाओँ का वैज्ञानिक विश्लेषण किया। वह

इस नतीजे पर पहुंचे कि मौसम के बदलाव की वजह से ऐसा हो रहा है। आम तौर पर

ग्लेशियरों का बर्फ सालभर धीरे धीरे पिघलता रहता है। जैसे जैसे गर्मी बढ़ती है, बर्फ

पिघलने की गति भी तेज होती है। इससे नीचे के इलाकों तक पानी का प्रवाह होता है।

भारत और चीन दोनों देशों के कृषि का आधार यही ग्लेशियर से बना जल ही है। लेकिन

विकास के नाम पर दोनों तरफ पहाड़ के ऊपरी हिस्सों में भी कई डैम बना दिये गये हैं। जब

किसी वजह से एक अथवा दो बड़े ग्लेशियर अचानक नीचे आते हैं तो इन डैमों पर उसका

असर पड़ता है। अब जो इलाके उस डैम के नीचे होंगे, डैम के टूटने अथवा अधिक जल

प्रवाह से उनका तबाह होना भी सामान्य विज्ञान है।

इलाके की भौगोलिक स्थिति का बदलना और भी खतरनाक

उत्तराखंड के चमोली में ग्लेशियर टूटने से 150 के मरने की आशंकाजिस बात की तरफ आम तौर पर लोगों और खासकर सरकारों का ध्यान नहीं जाता, वह

इन इलाकों में ग्लेशियरों के इस तरीके से गिरने की वजह से इलाके की भौगोलिक स्थिति

में होने वाले बदलाव का है। नीचे के डैमों के आकार बदल जाते हैं। लिहाजा उनमें भूक्षरण

अधिक होता है। आम तौर पर इन्हें अधिक गंभीरता से नहीं लिया जाता लेकिन हिमालय

के इलाके में यह छोटी छोटी बातें भी बड़ी तबाही लाती हैं। चीन के पहले ग्लेशियर विस्फोट

के आंकड़ों के मुताबिक वहां पहाड़ों पर से करीब सत्तर लाख घन मीटर बर्फ नीचे आ गिरा

था। ऐसे में जो डैम इस पानी का भंडारण करते हैं, उनकी स्थिति क्या हुई होगी, उसे आम

आदमी भी समझ सकता है।

हिमालय के नीचे की स्थिति को भारत की तरफ से चमोली हादसे के बाद गंभीरता से

लिया जाना चाहिए। इसकी चेतावनी तो वैज्ञानिक काफी पहले से ही दे चुके हैं। इसके बाद

भी अत्यंत संवेदनशील समझे जाने वाले हिमालय के इलाकों में शहरीकरण और विकास

के नाम पर अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है। जबकि वैज्ञानिक समझ यह है कि इस इलाके

को बिना किसी छेड़छाड़ के अब छोड दिया जाना चाहिए। इससे जो ग्लेशियर कम हो गये

हैं, उसकी भी भरपाई हो सकती है और मानव जनित हादसों को भी कम किया जा सकता

है और किसी और बड़े हादसे के साथ साथ हिमालय को बचाना होगा।


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