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गुबरैला कीड़ा की मजबूती देखकर वैज्ञानिक हैरान




  • दक्षिणी कैलिफोर्निया के रेगिस्तानी इलाकों का कीड़ा

  • शरीर पर 39 हजार गुणा अधिक दबाव झेल लेता है

  • सुक्ष्म तंतुओँ का जालों के गुच्छा से बनता है आवरण

  • अगली पीढ़ी के हवाई जहाज और भवन बनाने में मदद

राष्ट्रीय खबर

रांचीः गुबरैला कीड़ा की खास प्रजाति इतनी मजबूत क्यों हैं, यह देखना कई नये तथ्यों की

जानकारी दे गया है। इस मजबूती का पता चलने के बाद अब उसके शरीर के बाहरी

आवरण की इस विशेषता का खास तौर पर अध्ययन किया जा रहा है। गुबरैले की इस

विशेषता का पता तब चला जब एक गाड़ी उसके ऊपर से गुजर जाने के बाद भी वह जिंदा

रहा। इसे देखकर ही वैज्ञानिक हैरान हुए। फिर उसके शरीर के बाहरी आवरण की जांच से

इस राज का पता चल पाया। इस शोध के प्रारंभिक चरण से ही इसके साथ जुड़े पुरदे

विश्वविद्यालय के सिविल इंजीनियर पाब्लो झावाट्टेरियारी ने इस बारे में कहा कि नतीजे

तो यही दर्शा रहे हैं कि इस कीड़े का बाहरी आवरण उम्मीद से बहुत अधिक सख्त और

मजबूत है। दरअसल एक टोयटा कैमरी जैसी बड़ी गाड़ी के इस कीड़ा के ऊपर से गुजर जाने

के बाद भी उसके जीवित और सकुशल होने की जानकारी मिलने के बाद उसके आवरण की

जांच की गयी थी।

जिस गुबरैला की जांच की गयी थी वह एक ईंच लंबा प्राणी है। यह अमेरिका के दक्षिण

कैलिफोर्निया के जंगलों में सामान्य तौर पर पाया जाता है। गाड़ी से दबने के बाद भी जब

वह बच गया तो उसके आवरण की जांच की गयी थी। जांच और कंप्यूटर मॉडल से उसकी

संरचना तैयार करने के बाद यह पाया गया कि यह अपने वजन का 39 हजार गुणा अधिक

दबाव झेल सकता है। उससे अधिक के दबाव में उसके शरीर का खोल टूट जाता है।

गुबरैला कीड़ा का खोल 39 हजार गुणा दबाव झेलता है

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के डेविड किसालूस ने इस बारे में कहा कि दरअसल इस

गुबरैले का बाहरी आवरण दोनों तरफ से अतिरिक्त कवच वाला है। जब कोई दबाव इस पर

पड़ता है तो यह बाहरी कवच ही उसकी रक्षा करता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह कीड़ा

इसलिए भी अजीब है क्योंकि उसके शरीर के अंदर की बनावट से बाहर भी एक और

बनावट या ढांचा उसके खोल के तौर पर काम करता है। जब कोई दबाव उस पर पड़ता है तो

गुबरैले की स्वाभाविक प्रतिक्रिया ही बाहरी खोल को सक्रिय कर खुद को बचा लेने की होती

है।  इसका पता चलने के बाद अब इस गुबरैले के बाहरी आवरण की संरचना की जांच हो

रही है। बाहरी दबाव पड़ते ही यह कीड़ा इसी बाहरी आवरण के कवच के अंदर खुद को

छिपा  लेता है और बचा रहता है। इसकी शारीरिक संरचना के पता चलने के बाद शोध दल

ने कृत्रिम तरीके से इस बाहरी आवरण को बनाने का काम किया था। इसकी संरचना ही

कुछ ऐसी है कि जैसे जैसे दबाव बढ़ता जाता है यह उतना ही मजबूत होता जाता है। इसे भी

समझने की कोशिश में यह पाया गया कि दरअसल यह एक लचीला आवरण है और ऊपर

के दबाव पड़ने के बाद सिकुड़ता चला जाता है। जैसे जैसे यह सिकुड़ता है, उसकी मजबूती

और बढ़ती चली जाती है। अब वैज्ञानिक भविष्य में इसी गुबरैले के बाहरी कवच के जैसा

पदार्थ बनाना चाहता है। यह पदार्थ अगर सफलतापूर्वक बन गया तो हवाई जहाज से लेकर

बहुमंजिली इमारतों में उसका प्रयोग बहुत अधिक मजबूती देगा। आधुनिक विज्ञान को

इसके पहले भी अपने विकास में प्रकृति में पाये जाने वाले पदार्थों और जीवों के आधार पर

काफी कुछ नया बनाने का रास्ता दिखा है।

इसकी संरचना की नकल से मजबूत उपकरण बन सकेंगे

इससे पहले अमेजन नदी में पायी जाने वाली एक खास प्रजाति की मछली के खोल से

बुलेट प्रूफ जैकेट की संरचना तैयार करने का काम पहले से ही चल रहा है।

अब इस गुबरैला कीड़ा के बाहरी खोल के जैसा भी ढांचा का पदार्थ अगर बन गया तो वह

निश्चित तौर पर बनने वाले हर सामान को वर्तमान के मुकाबले कई हजार गुणा अधिक

मजबूती प्रदान कर सकेगा। जहां अथवा जिन यंत्रों में जोरदार झटका से नुकसान होता है,

उन्हें भी ऐसा खोल के ढकने से उनकी बेहतर सुरक्षा हो पायेगी क्योंकि यह अत्यंत मजबूत

होने के बाद भी बहुत अधिक भारी नही है। ऐसे में शोधकर्ता अब इसी बाहरी आवरण के

अंदर मौजूद हर कुछ का पता लगा रहे हैं ताकि उसी आधार पर ऐसा ही पदार्थ तैयार किया

जा सके जो अत्यंत मजबूत हो और झटका झेल सके। उच्च क्षमता वाले माइक्रोस्कोप से

भी इस खोल की जांच की गयी है और यह पाया गया है कि यह ढांचा किसी जाल की तरह

है तो दबाव पड़न पर आपस में जुड़ता और सिकुड़ता चला जाता है। शोधकर्ताओं न इसे थ्री

डी तकनीक पर प्रिंट भी किया है। सुक्ष्म तंतु के बने जालों का यह समूह हर झटको को

अपनी संरचना की वजह से विफल कर देता है।

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