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बीसीसीआई के मठाधीशों की कुर्सियों के भविष्य पर बढ़ता खतरा




बीसीसीआई में सौरभ गांगुली की अध्यक्षता में नई कमेटी पदभार ग्रहण करने जा रही है। इससे इतना तो तय है

कि बीसीसीआई के कार्यशैली में कुछ न कुछ गुणात्मक बदलाव होंगे। लेकिन असली सवाल तो बोर्ड पर कुंडली

मारकर बैठे लोगों को हटाने का है। सीके खन्ना और अमिताभ चौधरी लगातार तिकड़म कर और कानूनी निर्देशों

को धता बताते हुए इस क्रिकेट की राजनीति से अलग होना नहीं चाहते।

खन्ना की मजबूरी स्पष्ट नहीं है लेकिन झारखंड के पूर्व आइपीएस अमिताभ चौधरी इस कुर्सी से क्यों चिपके

रहना चाहते हैं, यह जगजाहिर बात है। लेकिन अब सौरभ के आने का फैसला होने के तुरंत बाद बोर्ड के अंदर भी

बदलाव के तेवर दिख गये हैं। इन मठाधीशों को हटाने में पूरी तरह नाकाम रही सीओए ने पहली बार आईसीसी

से स्पष्ट तौर पर कह दिया है कि वह आईसीसी के हाल के फैसलों को स्वीकार नहीं करने जा रही है।

अमिताभ चौधरी जैसे क्यों चिपके रहना चाहते हैं, यह सर्वविदित सत्य है

प्रशासकों की समिति ने आईसीसी से कहा है कि हाल ही में दुबई में हुई आईसीसी बोर्ड की बैठक में लिये गए

फैसलों को बीसीसीआई नहीं मानेगा क्योंकि अमिताभ चौधरी भारत के अधिकृत प्रतिनिधि नहीं थे।

चौधरी को सीओए ने आईसीसी की बैठक में भाग लेने से रोका था लेकिन उन्होंने शशांक मनोहर की अध्यक्षता

वाली आईसीसी के न्यौते पर नीतिगत फैसलों के लिये मतदान में भाग लिया।

आईसीसी बोर्ड ने अगले आठ साल के चक्र के लिये दो टी20 विश्व कप और 50 ओवरों के दो विश्व कप के

अलावा अतिरिक्त वैश्विक टूनार्मेंट (50 ओवरों के प्रारूप में छह देशों का टूनार्मेंट) को मंजूरी दी थी।

सदस्यों ने हर तीन साल में वनडे विश्व कप कराने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।

सीओए ने तल्ख लहजे में आईसीसी के मुख्य कार्यकारी मनु साहनी को लिखे पत्र में कहा है कि सीओए

आईसीसी की बैठक में अमिताभ चौधरी को बीसीसीआई का अधिकृत प्रतिनिधिनहीं मानता।

बीसीसीआई उनके द्वारा बीसीसीआई की ओर से लिये गए किसी फैसले को नहीं मानता और ना ही आईसीसी

के किसी फैसले को मानने के लिये बाध्य है।

याद रहे कि जब तक सट्टेबाजी का मामला प्रमाणित नहीं हुआ था कुछ इसी तरीके से बीसीसीआई पर

एन श्रीनिवासन का कब्जा हो चुका था। अजीब विडंबना है कि देश के नामी गिरामी क्रिकेटर भी सब कुछ

जानते समझते हुए सिर्फ निजी लाभ के लिए चुप्पी साधे हुए थे।

बीसीसीआई का अध्यक्ष बनने से सौरभ गांगुली को सात करोड़ का घाटा

अब सौरभ गांगुली के आने के बाद कमसे कम पूर्व खिलाड़ियों के मन में बैठा भय दूर होगा,

इसकी उम्मीद की जा सकती है। यह उम्मीद इसलिए भी की जा सकती है क्योंकि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड

के अध्यक्ष का पदभार गांगुली ने सिर्फ नौ महीनों के लिए संभाला है।

लेकिन इस पदभार को ग्रहण करने की वजह से उन्हें सात करोड़ का झटका लगा है।

इससे स्पष्ट है कि वह न तो खुद और न ही दूसरों के इस क्रिकेट महासंघ को आर्थिक कमाई का जरिया बनने

की छूट प्रदान करने जा रहे हैं। दुनिया के सबसे धनी क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (बीसीसीआई) का अध्यक्ष बनते ही

बंगाल के राजकुमार कहे जाने वाले टीम इंडिया के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली को सात करोड़ का झटका लगने वाला है।

एक रिपोर्ट से इस बात का खुलासा हुआ है। बताया गया है कि गांगुली फिलहाल क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ

बंगाल के अध्यक्ष भी हैं। इसके अलावा वह विभिन्न क्रिकेट मैचों में कमेंट्री भी करते हैं।

क्रिकेट से जुड़े टीवी शो में एक्सपोर्ट की भूमिका भी निभाते हैं।

आईपीएल में दिल्ली कैपिटल्स की टीम के साथ बतौर मेंटर काम कर रहे थे लेकिन बीसीसीआई के अध्यक्ष

पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद इन सभी कार्यों को अलविदा कहना होगा।

झारखंड के घपले का सच भी बाहर आयेगा जब बदलाव होगा

इसके लिए उन्हें मीडिया कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने होंगे। सभी विज्ञापनों के लिए मौजूदा सभी वाणिज्यिक करारों को

खत्म करना होगा। वह कमेंट्री भी नहीं कर पाएंगे और आईपीएल में दिल्ली कैपिटल्स की टीम के मेंटर के

तौर पर भी काम नहीं कर सकेंगे। इन तमाम कार्यों को छोड़ने की वजह से उन्हें सात करोड़ रुपये का नुकसान होगा।

ऐसे में यह माना जा सकता है कि बीसीसीआई के मठाधीशों के भविष्य पर सौरभ गांगुली के आने के खतरा

मंडरा रहा है। वैसे अगर मामला आगे बढ़ा तो अमिताभ चौधरी ने झारखंड में और खास तौर पर

जेएससीए के क्रिकेट स्टेडियम के निर्माण में क्या कुछ गुल खिलाया है, उसका भी खुलासा हो जाएगा।

अगर ऐसा होता है तो अमिताभ चौधरी के साथ साथ इस बहती गंगा में हाथ धोने वाले दूसरे कौन कौन से

चेहरे हैं, उनका भी खुलासा होना तय है। वर्तमान में अमिताभ चौधरी और उनके गुट ने इस पूरे गोरखधंधे को

सात तालों के अंदर कैद कर रखा हुआ है।

अब परिस्थितियां बदली हैं तो सात तालों में कैद भ्रष्टाचार के जिन्न भी बाहर आ सकते हैं।



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