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वशिष्ठ सिंह को मौत के बाद श्रद्धांजलि तो खूब मिली लेकिन एंबुलेंस नहीं







  • कोई नेता और अधिकारी नहीं पहुंचा संवेदना व्यक्त करने
  • अस्पताल में मृत्यु प्रमाणपत्र देकर अपना पल्ला झाड़ लिया
  • काफी समय से मानसिक तौर पर बीमार था यह गणितज्ञ
प्रतिनिधि

पटनाः वशिष्ठ सिंह का नाम आज सोशल मीडिया में खूब चर्चा में है। दरअसल काफी

दिनों तक मानसिक बीमारी में रहने और अंतिम समय में अस्पताल के बेड पर होने के

बाद अंततः उनकी मौत से लोगों को फिर से उनकी याद आयी है। उनकी मौत के बाद के

घटनाक्रम वेदनादायक हैं।

फिर से एक बार हो, बिहार में बहार हो, फिर से एक बार नीतीशे कुमार हो। लिखने वाले ने

क्या लिखा था और गाने वाले ने क्या गाया था। लेकिन नीतीश कुमार के बाहरे वाले

बिहार में बिहार की विभूति गुमनामी में दम तोड़ने के बाद उनके शव को ले जाने के लिए

एंबुलेंस तक उनके परिजनों को नहीं मिल पाती है।

महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का पटना में निधन हो गया। वह लंबे समय से

सिजोफ्रेनिया नामक बीमारी से जूझ रहे थे। इलाज के लिए उन्हें पीएमसीएच अस्पताल

में भर्ती कराया गया था।

लेकिन कभी आइंस्टीन की थ्योरी को चुनौती देने वाले वशिष्ठ बाबू की मौत के बाद पटना

के पीएमसीएच की बड़ी लापरवाही सामने आई है। वशिष्ठ नारायण सिंह के निधन के

बाद अस्पताल प्रबंधन द्वारा उनके परिजनों को शव ले जाने के लिए एंबुलेंस तक नहीं दी

गई। भारत के होनहार विभूति के छोटे भाई ब्लड बैंक के बाहर शव के साथ खड़े रहे। और

तो और निधन के बाद पीएमसीएच प्रशासन द्वारा केवल डेथ सर्टिफिकेट

(मृत्यु प्रमाणपत्र) देकर पल्ला झाड़ लिया गया।

इस दौरान जब वशिष्ठ नारायण सिंह के छोटे भाई से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि

हम अपने पैसे से अपने भाई का शव गांव ले जाएंगे। उन्होंने कहा कि मेरे भाई के निधन

की खबर के बाद से न तो कोई अधिकारी आया है और न ही कोई राजनेता।

वशिष्ठ सिंह पर पीएमसीएच ने भी अपना पल्ला झाड़ा

वशिष्ठ नारायण सिंह के छोटे भाई ने कैमरे के सामने रोते हुए कहा कि अंधे के सामने

रोना, अपने दिल का खोना। बता दें कि वशिष्ठ बाबू के निधन पर शोक-संवेदनाओं का

तांता लगा हुआ है। मुख्यकमंत्री नीतीश कुमार से लेकर सांसद गिरिराज और पूर्व

मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी सभी ने इस महान विभूति को मौखिक श्रद्धांजलि तो दी

लेकिन किसी ने भी अस्पताल जाकर उनके और परिजनों की सुध लेना जरूरी नहीं

समझा। वैसे तो हिंदुस्तान में जिंदगी की कीमत बहुत ही सस्ती है। यह जिंदगी और भी

सस्ती हो जाती है जब आदमी गरीब होता है। थोड़ी और सस्ती हो जाती है जब आदमी

गरीब होने के साथ ही गांव में रहता है और तब तो लगभग मुफ़्त ही हो जाती है जब वह

गांव का गरीब होने के साथ ही राजधानी से दूर किसी वीरान कस्बे में जीवन गुजार रहा

हो। जब जीवन ही मुफ़्त का हो तो इसकी सुध लेने की भला किसी को जरूरत ही क्या?

चाहे फिर उसने देश को कोई अमूल्य योगदान ही क्यों न दिया हो।



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