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बैंक से नहीं यह जनता के साथ धोखाधड़ी है

बैंक से पैसे लेकर दबा लेने वालों की पता होने के बाद भी अगर उनके खिलाफ भी कार्रवाई

नहीं हो तो यह सिलसिला कब जाकर समाप्त होगा। मैं यस बैंक की बात कर रहा हूं।

यह बैंक डांवाडोल हुआ तो शेयर बाजार भी धराशायी हो गयी। दोनों में पैसा आखिर

किसका गया और कौन लोग फायदे में रहे। विजय माल्या का मामला जब पहली बार

सामने आया था तभी असली गोरखधंधे की चाल समझ में आने लगी थी। अब यस बैंक ने

जो तथ्य उजागर किये हैं, उससे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि देश के औद्योगिक घरानों

का एक समूह लगातार जनता के पैसे से मौज कर रहा है और जनता तबाह हो रही है। यह

सही है कि यस बैंक के राणा कपूर को हिरासत में लिया गया है। लेकिन जो इस बैंक के

कर्जदार हैं और जिनके द्वारा पैसा नहीं लौटाने की बात सामने आयी है, उसके विदेश जाने

पर रोक क्यों नहीं लग रही है। उल्टे सरकार की तरफ से यह प्रचारित करने की भरसक

कोशिश हो रही है कि राणा कपूर को बड़ी चालाकी से वापस लाया गया है। जिन बड़े

कर्जदारों के नाम अब सामने आ चुके हैं, उन कर्जदारों की संपत्ति का आकलन कोई बड़ी

बात नहीं है। इनलोगों की नामी- बेनामी संपत्ति का आकलन कर उन्हें भी कर्ज की

अदायगी होने तक कमसे कम जब्त तो रखा जा सकता है। इनमें से कुछ पर निश्चित तौर

पर सरकार हमेशा से मेहरबान रही है। यह मेहरबानी कांग्रेस और भाजपा दोनों के

शासनकाल में देखा जा सकता है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि दरअसल

औद्योगिक विकास का जो ढांचा देश में खड़ा दिखता है वह निजी घरानों का कम और

सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का प्रयास ज्यादा है।

बैंक से नहीं हुआ है आम जनता को कोई फायदा

निजी घरानों के विकास की कथा में अगर कर्ज और कर्जमाफी की रकम को जोड़कर देखा

जाए तो यह तथ्य भी सामने आ सकता है कि ऐसे घराने सिर्फ जनता के पैसे से मौज कर

रहे हैं। जब कभी धन की कमी अथवा बैंकों को कर्ज लौटाने की बात आती है तो सरकार की

तरफ से औद्योगिक विकास के नाम पर उन्हें पैकेज उपलब्ध करा दिया जाता है। सरकार

में बैठे लोगों को भी पता है कि जिन पैसों को इतनी आसानी से बांटा जाता है, वह बैंक के

नहीं देश की जनता के पैसे हैं। यह वही जनता है जो कभी नोटबंदी के दौरान और कभी

बैकों की वित्तीय स्थिति बिगड़ने की वजह से लाइनों में लगी रहती है। इस गोरखधंधे को

अब बंद किया जाना चाहिए। इसी क्रम में बैंक के नहीं देश के शेयर बाजार को भी गहराई

से समझने की जरूरत है। जब कभी शेयर बाजार गोता लगाता है तो देश की आम जनता

के पैसे डूब जाते हैं। लेकिन यह खेल आज तक कोई भी सरकारी एजेंसी बताने से परहेज

करती है कि शेयर बाजार में भी भाव के उतार चढ़ाव का खेल बनावटी भी होता है। खासकर

अचानक जब किसी शेयर के भाव ऊपर जाने लगे तो कई अवसरों पर यह स्पष्ट पता चला

है कि शेयर बाजार के इस नकली चाल के पीछे कुछ खास चेहरे हैं। इन चेहरों का

राजनीतिक कनेक्शन क्या है, यह भी आसानी से समझा जा सकता है। इसलिए जनता के

पैसे से खिलवाड़ का यह धंधा अब बंद होना चाहिए।

बैंक से नहीं कर्ज लेने वालों से भी हो पैसे की वसूली

कमसे कम कई बैकों के कर्जदार बने घूम रहे लोगों के भी विदेश जाने पर रोक के साथ

साथ घोषित तौर पर उनकी कुल संपत्ति का आकलन भी होना चाहिए। जब ऐसे लोगों की

संपत्ति का आकलन हो जाएगा तो पता चलेगा कि दरअसल यह किस धरातल पर खड़े हैं।

देश को यह सच जानने का हक है क्योंकि बार बार जनता को इसी तरीके से ठगा जा रहा

है। जिस विशाल ढांचा के बारे में जनता को बार बार बताया जाता है, उस ढांचा में जनता

का कितना और संबंधित उद्योगपति का कितना पैसा लगा है, इसका खुलासा अब समय

की मांग है। कहीं ऐसा तो नहीं कि जो ढांचा बार बार हमारे सामने एक सुनहरे सपने की

तरह पेश किया जाता है वह दरअसल बैंक से नहीं बल्कि देश की जनता से लिया गया पैसा

ही है और दरअसल यह चेहरा अत्यंत ही भद्दा और कर्ज में डूबा हुआ है। औद्योगिक घरानों

को पैकेज का लाभ बैंक से नहीं जनता से अब आकलन करने का वक्त आ चुका है। वरना

नीरव मोदी के साथ साथ अनेक लोगों के माध्यम से जो पैसा डूबा है वह आखिर किस

अंतिम छोर तक गया और जनता कैसे बार बार छली जा रही है, यह सवाल भी अब समय

की मांग है। कर्ज लेकर घमंड में चूर नजर आने इन चेहरों की असलियत क्या है, यह

जानने का वक्त आ चुका है।


 

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