बैक्टेरिया ही साफ करेगा पानी के बैक्टेरिया को

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  • वाशिंगटन  वैज्ञानिकों ने नया तरीका ईजाद किया

  • जीवाणु की झिल्ली रोकती है अन्य जीवाणु को

  • ग्राफाइन की परत पहुंचाती है संयंत्र को गर्मी

  • पानी के अन्य बैक्टेरिया भी इसमें मर जाते हैं

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः बैक्टेरिया की मदद से पानी साफ करने की नई तकनीक कुछ ऐसी है, जिसे कांटा से कांटा निकालना कहते हैं।

वैज्ञानिकों ने इसी पद्धति से पानी साफ करने की नई तकनीक का विकास कर लिया है।

इस विधि में पानी में मौजूद बैक्टेरिया को साफ करने की जिम्मेदारी भी बैक्टेरिया पर ही सौंप दी गयी है।

दरअसल इस यंत्र में बैक्टेरिया की एक झिल्ली लगायी गयी है।

यह झिल्ली ही पानी साफ करने का काम करेगी।

इसके लिए इस नये जल शोधन यंत्र में ग्राफाइन ऑक्साइड का भी प्रयोग किया गया है।

उल्लेखनीय है कि पूरी दुनिया मे पीने के साफ पानी की जबरदस्त किल्लत होती जा रही है।

अनेक इलाकों में अब भी साफ पीने का पानी नहीं होने की वजह से हर साल करोड़ों लोग बीमार पड़ते हैं

और कई बार उचित एवं समय पर ईलाज नहीं होने की वजह के काल कवलित भी होते हैं।

वर्तमान आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के हर दस में से एक व्यक्ति को पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।

साथ ही इस बात की चेतावनी दे दी गयी है कि वर्ष 2025 तक दुनिया की आधी आबादी के लिए साफ पीने के पानी की किल्लत होने वाली है।

इन्हीं तथ्यों की वजह से वाशिंगटन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में काम करने की ठान ली थी।

लगातार प्रयोग और अनुसंधान के बाद उन्होंने इसकी तकनीक विकसित कर ली है।

बैक्टेरिया की पतली झिल्ली ही रोकेगी विषाणुओं को

इस यंत्र में बैक्टेरिया की अत्यंत पतली झिल्ली ही पानी में मौजूद बैक्टेरिया को आगे जाने से रोक लेती है।

इसके अलावा पानी में मौजूद अन्य हानिकारक पदार्थ भी ग्राफाइन की वजह से संशोधित हो जाते हैं।

इससे इंसान के पानी से बीमार पड़ने का खतरा न्यूनतम हो जाता है।

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का मानना है कि इस किस्म के जल शोधन संयंत्र का व्यापारिक उत्पादन होने पर अनेक विकासशील एवं गरीब देशों को इसका फायदा हो सकता है।

इन देशों में पीने का साफ पानी का घोर अभाव है। जिस कारण हर साल करोड़ों लोग बीमार पड़ते हैं।

वैज्ञानिकों ने पहले भी सोने की झिल्ली पर आधारित जल शोधक बनाये हैं लेकिन वे आम इंसान के लिहाज से काफी महंगे हैं।

इसलिए सस्ता उपाय तलाशते हुए वैज्ञानिकों ने इस विधि का आविष्कार किया है।

इस संयंत्र की संरचना के बारे में बताया गया है कि इसमें ग्लूकोनबैक्टर हानसेई बैक्टरिया का प्रयोग हुआ है।

यह बैक्टेरिया दरअसल एक मीठा पदार्थ है। पानी में यह अपने आप ही नैनो फाइबर तैयार कर लेता है।

ग्राफाइन ऑक्साइड की मौजूदगी से यह झिल्ली स्थायी स्वरुप में कायम रह जाती है।

संयंत्र के व्यापारिक उत्पादन से गरीब देशों को फायदा

इसमें एक खास किस्म का घोल डाला गया है जो पानी में मौजूद ग्लूकोनबैक्टर को समाप्त करने की क्षमता रखता है।

इस पूरी प्रक्रिया में ग्राफाइन के ऑक्सीजन अलग हो जाते हैं।

सूरज की रोशनी में अत्यंत तेज गति से काम करते हुए यह संयंत्र पानी साफ करने लगता है।

संयंत्र में मौजूद ग्राफाइन ही सूरज की रोशनी को सोखकर उसे झिल्ली के गर्म होने के काम में लगाता है।

इससे पानी में मौजूद ई कोलि बैक्टेरिया भी समाप्त हो जाते हैं।

यह सारी प्रक्रिया तीन मिनट में ही पानी में मौजूद बैक्टेरिया को समाप्त कर देती है।

वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि अंदर का तापमान सत्तर डिग्री तक पहुंचते ही ई कोली बैक्टेरिया की संरचना भी टूट जाती है।

इससे बैक्टेरिया स्वतः मर जाता है।

व्यापारिक तौर पर अधिक शीघ्रता से पानी साफ करने के लिए इसमें दो झिल्ली लगायी जा सकती है। इससे पानी साफ होने की गति और तेज हो जाएगी।

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