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गरीबों पर सरकार का ध्यान अच्छी बात और सरकार का हित भी

गरीबों पर खुद मुख्यमंत्री का सक्रिय होना इस झारखंड राज्य के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि

है। आम तौर पर इससे पहले भी सक्रियता होती थी। बाबूलाल मरांडी हो अथवा अर्जुन मुंडा

इनदोनों ने भी काफी बेहतर काम किये हैं। लेकिन सरकार के मुखिया का इतना सक्रिय

होना शायद राज्य की सुस्त पड़ी अफसरशाही को भी बेचैन कर रहा है। सोशल मीडिया के

माध्यम से अपनी दिनचर्या की जानकारी देने वाले हेमंत सोरेन इस मामले में अब तक

अब्बल नंबरों से पास हो रहे हैं। उन्होंने सरकार के काम करने का तरीका बदलने का जो

नुस्खा आजमाया है, उसे राज्य के चंद प्रशासनिक अधिकारी ही पकड़ पा रहे हैं। ऐसे में

माना जा सकता है कि गरीबों को राहत पहुंचाने के मामले में खुद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन

अपने अफसरों से आगे चल रहे हैं। इसका लाभ भी हो रहा है। अनेक इलाकों से अब सीधे

मुख्यमंत्री तक वैसी सूचनाएं भी पहुंच रही हैं, जिनकी पहले कल्पना तक नहीं की जाती

थी। लोग अपने अथवा दूसरों के माध्यम से अपनी शिकायतें पहुंचा रहे हैं और उनमें से

प्राथमिकता के आधार पर अनेक मामलों का त्वरित निष्पादन होने की सूचना भी

सार्वजनिक है रही है। राज्य के कई जिलों में गरीबों को कंबल, स्वास्थ्य सेवा, राशन अथवा

अन्य सामान्य जरूरत की सरकारी सेवा उपलब्ध कराने में हेमंत सोरेन का यह नया

प्रयोग कारगर साबित हो रहा है। यह अलग बात है कि हेमंत सोरेन की इस त्वरित कार्रवाई

के बीच भी अनेक लोग अप्रासंगिक और गैर जरूरी मुद्दों को डालने की बीमारी से परहेज

नहीं कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर त्वरित निर्देश से जनता का भरोसा बढ़ता है

सोशल मीडिया खासकर ट्विटर पर सक्रिय हेमंत सोरेन अपनी मुख्य बातों पर फोकस कर

सकें, इसके लिए जरूरी है कि आम लोग भी उनकी ट्विट पर गैर जरूरी मुद्दों को दर्ज ना

करें। बार बार इस किस्म की हरकत से जहां से निर्देश भेजा जा रहा है, वहां तक निर्देश

पहुंचने में विलंब के अलावा भटकाव भी पैदा होता है। इस बात को तो उनलोगों को

समझना चाहिए जो हेमंत सोरेन के ट्विट पर हसुंआ के बियाह में खुरपी के गीत गाने लगे

हैं। यह और भी अच्छी बात है कि सामान्य प्रशासनिक स्तर पर फाइलों के निष्पादन की

प्रक्रिया में भी हेमंत सोरन ने राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया है। आम तौर पर

पिछली सरकार में जिन अधिकारियों को निरंकुश मान लिया गया है, उनपर लगाम बांधने

में वह कामयाब रहे हैं। बड़ी बात तो यह है कि अब राज्य की अफसरशाही अपने मुख्यमंत्री

को टेकन फॉर ग्रांटेड यानी जो मैं कहूंगा वही करेगा जैसा लल्लू मानने से बच रहे हैं। बिना

किसी शोर के अपने काम करने के तरीकों के बीच हेमंत सोरेन सीधे जनता से जुड़ रहे हैं,

यह बिल्कुल नई बात है। तय है कि इस प्रत्यक्ष संपर्क का लाभ भी हेमंत सोरेन और उनकी

सरकार को मिलेगा। गरीबों पर ध्यान देने के ख्याल से हेमंत सोरेन को भी अब दिल्ली

सरकार की कुछ सेवाओं का अनुसरण कर लेना चाहिए। दिल्ली के मुकाबले झारखंड का

इलाका बड़ा है।

गरीबों पर ध्यान देने का काम क्रमवार होना चाहिए

इसलिए गरीबों पर ध्यान देने के लिए सभी जिलों का एक एक पंचायत पर इन्हें मॉडल

बनाकर आजमाया जा सकता है। एक पंचायत में प्रक्रिया सफल होने के दौरान जो कुछ

खामियां समझ में आयेंगी, उन्हें दूर कर अगले पंचायतों में उन्हें और बेहतर कर गरीबों को

और बेहतर सरकारी सेवा प्रदान की जा सकती हैं। हेमंत को अगर निरंकुश अफसरशाही से

काम करना है तो यह तय है कि उन्हें पहले की लीक को बदलते हुए नई लकीर खींचनी

पड़ेगी। वैसे गरीबों का कल्याण अगर राज्य सरकार की शीर्ष प्राथमिकता बनी रहे तो इससे

अच्छी और कोई बात नहीं हो सकती। आम गरीब के लिए दो वक्त की रोटी, बेहतर

चिकित्सा सुविधा और बच्चों के लिए शिक्षा इन्हीं मुद्दों को दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने

भी अपनी प्राथमिकता सूची में रखा था। साथ ही बिजली और पानी मुफ्त की सीमा तय

कर उन्होंने एक बड़े वर्ग को जोड़ने का काम किया है। अब झारखंड राज्य की भौगोलिक

सीमा अधिक बड़ी होने की वजह से एक साथ सभी इलाकों में कोई काम करने से बेहतर है

कि हर जिला के एक एक पंचायत पर ऐसा प्रयास किया जाए। अलग अलग काम के लिए

अलग अलग पंचायतों का निर्धारण भी हो सकता है। इससे जिला तक काम होने का जो

एहसास पैदा होगा, वह भी सरकार का न सिर्फ काम आसान कर देगा बल्कि जागरुकता

बढ़ने की वजह से सरकार को बेहतर काम करने की समय सीमा निर्धारित करने की

आवश्यकता भी महसूस होगी। गरीबों पर ध्यान देने के लिए हेमंत सोरेन को अपने केंद्र में

गांव को ही रखना होगा। वरना शहरी इलाकों में ऐसी योजनाओं को लागू किये बिना भी

काफी सुविधाएं मौजूद हैं। जिनके पास ऐसी सुविधाएं नहीं हैं, उनतक फायदा पहुंचे यही

लक्ष्य होना चाहिए।

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