उल्कापिंडों उम्मीद से अधिक कठोर हैं

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  • अनुमान से अधिक कठिन होगा इन आसमानी आफतों को तोड़ पाना

  • छोटे उल्कापिंडों की मजबूती अधिक होती है

  • पृथ्वी को भी बड़े विस्फोट से बचाने की चुनौती

  • तोड़ने के बदले दूसरी तरफ धकेलने पर हो रहा काम

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः उल्कापिंड दरअसल हमारी उम्मीदों से कहीं अधिक कठोर हैं।

वैज्ञानिकों के परीक्षण से यह तथ्य धीरे धीरे सामने आ रहा है।

इसी वजह से अब पृथ्वी की तरफ आने वाले उल्कापिंडों को रोकने के लिए नई रणनीति पर काम प्रारंभ किया जा रहा है।

पहले इनमें से अधिकांश उल्कापिंडों को अंतरिक्ष में ही ध्वस्त कर देने की योजना बनायी गयी थी।

अब उनकी कठोरता का पता चलने के बाद इस रणनीति में थोड़ा बदलाव करना पड़ सकता है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि जिन पत्थरों को तोड़ने की योजना है, वे उम्मीद से अधिक कठोर हैं

लिहाजा पूर्व के अनुमान के आधार पर उन्हें अंतरिक्ष में तोड़ कर दूसरी तरफ धकेल देना

शायद संभव नहीं होगा।

उल्कापिंड के पृथ्वी पर टक्कर का काल्पनिक वीडियो यहां देखें

जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय में इस विषय पर निरंतर शोध चल रहा है।

वहां के शोधकर्ताओं ने यह नतीजा निकाला है कि पृथ्वी की तरफ आने की खतरे को टालने के लिए अंतरिक्ष में उल्कापिंडों पर हमले में अधिक शक्ति का इस्तेमाल करना पड़ सकता है।

यह इस्तेमाल भी बहुत सोच समझकर किया जाना है ताकि अंतरिक्ष में होने वाले किसी भी विस्फोट का पृथ्वी पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़े।

उल्कापिंडों से प्राप्त नमूनों के विश्लेषण के आधार पर वैज्ञानिकों ने इसका एक कंप्यूटर मॉडल भी तैयार किया है।

इस बारे में विस्तार से नई वैज्ञानिक पत्रिका में जानकारी दी गयी है।

दरअसल यहां के वैज्ञानिक उल्कापिंडों के नमूनों की निरंतर जांच

इसलिए भी कर रहे हैं ताकि उनमें मौजूद खनिज तत्वों का भी पता लगाया जा सके।

वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि बड़े उल्कापिंडों को तोड़ देना शायद आसान होगा

लेकिन लगातार अंतरिक्ष में चक्कर काटते हुए सौर मंडल के आकर्षण और विकिरण से कठोर हो चुके छोटे आकार के उल्कापिंडों को इसी विधि से तोड़ना आसान काम नहीं होगा।

ऐसे छोटे आकार के उल्कापिंडों को तोड़ने में अधिक शक्ति का इस्तेमाल करना पड़ेगा।

उल्कापिंड का कंप्यूटर मॉडल बनाकर भी टक्कर देखा

वैज्ञानिक दल ने अपने कंप्यूटर मॉडल में एक नमूना भी बनाकर इसके प्रभाव को देखने की कोशिश की है।

इस मॉडल में एक किलोमीटर व्यास के उल्कापिंड को एक पच्चीस किलोमीटर व्यास के उल्कापिंड से टकराया गया है।

छोटे उल्कापिंड की गति पांच किलोमीटर प्रति सेकंड की रखी गयी थी।

परीक्षण में यह पाया गया कि जिस बड़े उल्कापिंड पर यह छोटा उल्कापिंड जा टकराया, वह पूरी तरह ध्वस्त हो गया।

परीक्षण में वैज्ञानिकों ने यह भी पाया है कि प्रारंभिक टक्कर के तुरंत बाद कुछ टुकड़े ध्वस्त होते हैं जबकि किसी भी उल्कापिंड पर टक्कर का असली प्रभाव कुछ देर के बाद देखने को मिलता है।

प्रारंभिक झटके में इसके लाखों टुकड़े अंदर ही अंदर बन जाते हैं।

जो कई घंटों के बाद धीरे धीरे टूटकर बिखरने लगते हैं।

वैज्ञानिकों ने पाया है कि भीषण टक्कर के बाद जिस सतह पर इसका झटका पड़ता है, वह दूर तर प्रभावग्रस्त होता है।

उसपर बनने वाले छोटे दरार धीरे धीरे बढ़ने लगते हैं और समय बीतने के साथ साथ इसकी गति और तेज होती जाती है।

गुरुत्वाकर्षण की वजह से एक दूसरे से जुड़े रहने वाले कण भी कुछ समय बाद इस गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से मुक्त होने लगते हैं।

तब जाकर उल्कापिंड के विखंडित होने की असली प्रक्रिया प्रारंभ होती है।

इन तमाम परीक्षणों के आधार पर वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि

पृथ्वी की तरफ आते उल्कापिंड को अगर पूरी तरह नष्ट कर पाना कठिन हो

तो उसे तेज धक्के से किसी दूसरी दिशा में धकेला भी जा सकता है।

उसे दूसरी तरफ धकेलने के लिए कम ऊर्जा खर्च होगी

और यह काम शायद अपेक्षाकृत आसान हो जाएगा।

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