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उल्कापिंडों से पृथ्वी का क्या कुछ बदला है, इस पर नये नये तथ्य

  • एक सौ मिलियन वर्ष पुराना गड्डा उल्कापिंड से बना

  • सोना खनन से जुड़े लोगों को पहली जानकारी मिली

  • उस खाई की चौड़ाई करीब पांच किलोमीटर

  • पृथ्वी के बदलन में इनकी भी भूमिका

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः उल्कापिंडों से पृथ्वी के क्रमिक विकास और जीवन की उत्पत्ति का कोई राज

जुड़ा है, यह पहले से प्रमाणित है। यह भी पता है कि प्राचीन पृथ्वी पर राज करने वाले

डायनासोर की प्रजाति भी किसी बड़े उल्कापिंड के गिरने से लगी आग में जलकर खत्म हो

गयी थी।

वीडियो में देखिये कैसे खत्म हुई थी डायनासोर की प्रजाति

इसके बाद पृथ्वी का युग बदला था और नये सिरे से जीवन का क्रमिक विकास हुआ था।

इस पर निरंतर शोध जारी है। इसी शोध के तहत अब पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में एक ऐसा

विशाल गड्डा मिला है, जो दरअसल किसी उल्कापिंड के गिरने की वजह से ही बना था।

अब उसके पता चलने के बाद उसके अंदर और आस पास के इलाकों पर शोध जारी है।

इसके माध्यम से यह पता लगाया जाना है कि उल्कापिंडों से या उनके गिरने के समय

क्या कुछ हुआ था और जो उल्कापिंड यह गड्डा बनाने वाला था, वह पृथ्वी में क्या कुछ

बदल गया है।

सोने की खोज के तहत नये उल्कापिंड का पता चला

पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में जिस नये गड्ढे का पता चला है उसका व्यास करीब पांच

किलोमीटर है। इससे समझा जा सकता है कि जो उल्कापिंड वहां आकर गिरा था वह

आकार में बड़ा था। वरना इतना बड़ा गड्डा नहीं हो सकता था। दरअसल सोने की खोज में

खनन करने वाली एक कंपनी को इस क्रेटर (उल्कापिंड से बने गड्डे) का सबसे पहले पता

चला था। सोना खनन से जुड़े विशेषज्ञों को जब इसकी भनक लगी तो उनलोगों ने अन्य

विशेषज्ञ वैज्ञानिकों को इसकी जानकारी दी। बाद में विशेषज्ञों के दल ने वहां पहुंचकर

अन्य शोध के नमूने एकत्रित किये। आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों की मदद से वहां से

मिले साक्ष्यों के आधार पर यह अनुमान लगाया गया कि यह दरअसल 100 मिलियन वर्ष

पहले गिरने वाला उल्कापिंड था, जिससे यह खाई जैसी आकार की रचना हुई थी। इसका

पूरा पता लगाने के लिए वैज्ञानिकों ने इलेक्ट्रो मैग्नेटिक सर्वेक्षण का काम किया। जहां यह

गड्डा पाया गया है वह सोने की खदानों के लिए प्रसिद्ध ओरा बांडा शहर के उत्तर पश्चिमी

इलाके मंड है। इस खोज के बाद यह बताया जा रहा है कि विश्व प्रसिद्ध किंबरली के वोल्फ

क्रिक क्रेटर के मुकाबले यह पांच गुणा बड़ा है। कुछ वैज्ञानिक मान रहे हैं कि यह दुनिया में

अब तक खोजा जा सका ऐसे गड्डों में से सबसे बड़ा है। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक डॉ

जेसन मेयर्स ने कहा कि इसकी खोज बिल्कुल अप्रत्याशित तरीके से हुई है।

उल्कापिंडों से क्या कुछ बदलता है, इस पर शोध जारी है

इसलिए अभी इस पर और आंकड़े जुटाने पड़ेंगे। वहां जो कुछ साक्ष्य अब भी मौजूद हैं,

उसके जरिए बाद में यह पता चल पायेगा कि इस उल्कापिंड से पृथ्वी में क्या कुछ बदला है

अथवा इस उल्कापिंड के साथ ही कुछ अतिरिक्त भी इस पृथ्वी पर आया है। वैसे भी यह

पहले से ही माना गया है कि आम तौर पर सोना पृथ्वी के बाहर से ही आया है। वरना सोने

की संरचना के लायक पृथ्वी में कोई स्थिति ही नहीं है। इस सोच की वजह से सोना खदानों

के आस पास भी वैज्ञानिक उल्कापिंडों की तलाश का काम करते रहते हैं।

इन गड्डों में से अनेक तो भर कर सपाट हो चुके है

कोरोना संकट के बीच लोनार का पानी ही गुलाबी होने से स्थानीय निवासी हैरानइस उल्कापिंड के ऊपर लाखों वर्षों में बहुत कुछ भर गया है। इसलिए यह लगभग सपाट

इलाका बन चुका था। लेकिन आधुनिक यंत्रों की मदद से इस पूरी खाई की संरचना को

तैयार करने में वैज्ञानिकों को सफलता मिली है। इस खोज के बाद दुनिया भर के वैज्ञानिक

उल्कापिंड गिरने के अन्य स्थानों की जांच भी करना चाहते हैं। उनका अनुमान है कि लंबे

समय तक इन गड्डों पर बहुत कुछ बदलाव हो चुका है। इसलिए सपाट स्थिति में पहुंच

चुके ऐसे गड्डों को देखकर तो नहीं पहचाना जा सकता है। दुनिया में बहुत कम ऐसे

उल्कापिंड गिरने से सृजित गड्डे हैं, जो सपाट नहीं हुए हैं। उनमें से बहुत अब बड़ी झील के

आकार में हैं। ठीक ऐसा ही गड्डा महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल लोनार झील भी है।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि प्राचीन काल में हो सकता है कि अनुमान से कहीं अधिक

उल्कापिंड पृथ्वी पर आ गिरे हों। लेकिन लगातार पृथ्वी के मौसम और अन्य कारणों से

सामान्य आंखों से ओझल हो चुके हैं। अधिकांश पर अब या तो जंगल है अथवा वे पानी के

झील में तब्दील हो चुके हैं। यंत्रों की मदद से ही ऐसे गड्डों की संरचना का पता लगाया जा

सकता है।


 

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