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डायनासोर जलकर मर गये लेकिन नई वनस्पति पैदा हुई

  • भूगर्भीय शोध से क्रमिक विकास की नई जानकारी मिली

  • भीषण आग के बाद फिर से बर्फ से ढक गयी थी धरती

  • तापमान धीरे धीरे सुधरा तो जीवन नये सिरे से उभरा

  • मिट्टी और पानी के बदलाव से भी बदले वनस्पति

राष्ट्रीय खबर

रांचीः डायनासोर अपने समय के सबसे भयानक और विशालकाय प्राणी थे। इनकी कितनी

प्रजातियां थी, उस बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि डायनासोर की

नई नई प्रजातियों का लगातार पता चलता जा रहा है। जिस उल्कापिंड के गिरने की वजह

से पूरी पृथ्वी मे लगी आग से डायनासोर जलकर राख हो गये थे, उसी उल्कापिंड के टक्कर

से पृथ्वी में वनस्पति का आकार प्रकार भी बदल गया था।

इस वीडियो में समझिये आखिर क्या हुआ था

पहली बार शोध में इस बात की जानकारी मिली है। नये शोध में इसके तहत दक्षिण

अफ्रीका के वनों में इसके साक्ष्य भी मिले हैं। जिस उल्कापिंड से पृथ्वी पर राज करने वाले

डायनासोर समाप्त हो गये थे, वह उल्कापिंड करीब 66 मिलियन वर्ष पूर्व धरती से आ

टकराया था। अब देखा जा रहा है कि उस उल्कापिंड की टक्कर के बाद पृथ्वी का बहुत कुछ

बदल गया था। उल्कापिंड की टक्कर से लगी आग जब बूझ गयी तो पृथ्वी का तापमान

अचानक से नीचे गिरने लगा। इस वजह से फिर से पृथ्वी बर्फ से ढक गयी थी। वहां से सूर्य

की किरणों से बादल के बनने और बादलों के बारिश बनकर फिर वापस आने से जीवन के

क्रमिक विकास की गाड़ी दूसरे तरीके से आगे बढ़ी। दक्षिण अफ्रीका के वर्षा वनों का

अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने पाया है कि इस दौर में बदलाव की नई शुरुआत हुई। इस

वजह से धरती पर पहले से मौजूद अनेक पेड़ पौधों की प्रजातियां समाप्त हो गयी थी और

उनके बदले दूसरी प्रजातियां का क्रमिक विकास हुआ था। पृथ्वी पर जीवन के विकास के

निरंतर क्रम में इस घटना को एक महत्वपूर्ण मोड़ के तौर पर आंका जा रहा है, जिसने एक

आक्रामक प्रजाति को समाप्त कर देने के बाद पृथ्वी की भौगोलिक संरचना को बदलते हुए

उसके पर्यावरण को भी नये रास्ते पर बढ़ा दिया।

डायनासोर इस दौर के सबसे प्रभावशाली प्राणी हुआ करते थे

पनामा के स्मिथसोनियन ट्रॉपिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों ने इस पर काम किया

है। इस दल के वैज्ञानिक कार्लोस जारामिल्लो कहते हैं कि एक घटना से पृथ्वी में कितना

कुछ बदल गया, उसे सोचकर ही हैरानी होती है। उनके मुताबिक अगर वह उल्कापिंड नहीं

गिरता तो निश्चित तौर पर आज पृथ्वी के जीवन और पर्यावरण दोनों की हालत कुछ और

ही होती। कार्लोस और उनकी टीम ने दक्षिण अफ्रीका सहित अन्य इलाकों से लगातार 12

वर्षों तक इसके साक्ष्य एकत्रित किये हैं। इसके तहत इस दल ने फॉसिल के तौर पर मिले

छह हजार पत्तों और पचास हजार अन्य प्राचीन अवशेषों को न सिर्फ एकत्रित किया है

बल्कि उनका वैज्ञानिक विश्लेषण भी किया है। यह सभी नमूने अत्यंत प्राचीन काल के हैं

यानी उस दौर के है जब पृथ्वी पर डायनासोरों का राज हुआ करता था। उस दौर के इन

पत्तों की धारियों के अध्ययन से पता चला है कि उस दौर की करीब 45 प्रतिशत वनस्पति

अब इस दुनिया में मौजूद ही नहीं है। शायद उल्कापिंड गिरने के दौरान लगी आग में यह

सारी प्रजातियां जलकर पूरी तरह राख हो गयी थी। इसी लिए उस वक्त के भूकंप और

अन्य उथल पुथल में जो पत्ते कहीं दबे रह गये थे, उनके उनकी प्रजाति को समझने में

वैज्ञानिकों को आसानी हुई है। यानी यह माना जा सकता है कि उस प्राचीन काल की पृथ्वी

के जंगल भी दूसरे किस्म के होते थे। और वहां की प्रजातियां उस काल के अनुकूल ही

विकसित हो रही थी। लेकिन अचानक से उल्कापिंड के आ टकराने से सब कुछ उथल

पुथल हो गया था। अब सिर्फ शोध में फॉसिल के तौर पर उस काल की पत्तियां उपलब्ध हैं

जबकि मूल प्रजातियों का अब कोई नामो निशान तक नहीं बचा है।

उल्कापिंड की वजह से वनस्पति की अनेक प्रजातियां भी खत्म

लेकिन यह भी महत्वपूर्ण प्रश्न बना था कि आखिर इस बदलाव की प्रक्रिया के बाद पृथ्वी

के जंगल क्यों बदल गये। इस बारे में कार्लोस का मानना है कि उस दौर के डायनासोर

जंगलों को अपने आकार के हिसाब से रखते थे। जब वे समाप्त हो गये तो उनके नहीं होने

की वजह से पृथ्वी के सतह तक अधिक सूर्य किरणों का पहुंचना प्रारंभ हो गया। इससे नीच

की पौधों की प्रजातियों को तेजी से विकसित होने के पर्याप्त अवसर मिले। मिट्टी में मौजूद

नाइट्रोजन की मदद से ऐसे पौधे अधिक विकसित हुए। वैसे शोध दल का अनुमान है कि

पृथ्वी पर लगी आग के बाद फिर से जंगलों के पूरी तरह तैयार होने में भी करीब छह से

सात मिलियन वर्ष का समय लगा है। यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के सीन गुलिक कहते हैं

कि इस बदलाव की एक वजह शायद धरती पर मौजूद जलीय जीवन के बदलने से भी जुड़ा

हुआ है। अनेक किस्म के पौधे जलों के अंदर भी पनपते थे क्योंकि जीवन का विकास तो

इसी पानी के एमिबा से हुआ था। इसलिए माहौल बदलने से पानी की संरचना भी बदल

गयी थी। लिहाजा पृथ्वी में जीवन का क्रमिक विकास भी इन्हीं कारणों से अलग रास्ते पर

चल पड़ा

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