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माना के हम यार नहीं लो तय है कि प्यार नहीं है




माना के हम यार नहीं, इस बात पर अब किसी को कोई डाउट भी नहीं है। जी हां मैं कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू की बात कर रहा हूं। मामला इतना बिगड़ा है कि कैप्टन ने साफ तौर पर कह दिया है कि वह अब कांग्रेस की टीम की तरफ से नहीं खेलेंगे।




अब इंडियन पॉलिटिक्स में भी यह आईपीएल का सीजन चल रहा है। ऐसे में अगर कोई धाकड़ खिलाड़ी ही टीम छोड़ दे तो क्या होगा। वैसे भी कांग्रेस की टीम का कप्तान दरअसल कौन है, यह स्पष्ट नहीं है।

इतना तो तय है कि सारे फैसले पर्दे के पीछे से राहुल गांधी ही ले रहे हैं लेकिन उनकी भूमिका शायद नॉन प्लेयिंग कैप्टन के जैसी है, जो खुद कोई जिम्मेदार उठाना नहीं चाहता। दूसरी तरफ मैडम यानी सोनिया गांधी अब भी अपने पुत्र से कोई राजनीतिक कमाल कर दिखाने की उम्मीद बांधे बैठी हैं।

कैप्टन का विवाद बढ़ा तो पहले से नाराज चल रहे खिलाड़ियों ने भी शोर मचाना प्रारंभ कर दिया है। कपिल सिब्बल के साथ कई अन्य नेताओं ने भी ताल से ताल मिलाते हुए जो सवाल खड़े कर दिये हैं, उससे तो साफ है कि कांग्रेस फिलहाल अधर में लटकी हुई पार्टी है।

वैसे कन्हैया और जिग्नेश के आने की वजह से भाजपा को फिर से परेशानी हो सकती है क्योंकि यह दोनों ही युवा नेता नरेंद्र मोदी सरकार के मुखर और पढ़े लिखे विरोधी हैं।

अंधभक्तों की फौज पर वे अकेले ही भारी पड़ जाते हैं। लेकिन लगता है कि कन्हैया को कांग्रेस में लाने की रणनीति के पीछे शायद बिहार में खुद को खड़ा करने की सोच भी है।

कन्हैया के सहारे क्या बिहार साधना चाहती है कांग्रेस

वरना बिहार में अभी कांग्रेस किसी काम के लायक पार्टी नहीं बची है। पंजाब के कांग्रेसी विवाद से भाजपा को इससे ज्यादा कुछ फायदा मिलेगा यह तय नहीं।

यह तो इस बात पर तय है कि कैप्टन की सलाह पर केंद्र सरकार किसान आंदोलन पर क्या फैसला लेती है।

अगर किसानों के हक में कार्रवाई नहीं हुई तो फिलहाल गाड़ी जिधर जाती हुई दिख रही है, उससे भाजपा को खास तौर पर उत्तर प्रदेश में फायदा होता हुआ तो नजर नहीं आता है।




पार्टी में जो असली चाणक्य कहे जाते थे, उनकी गाड़ी का टायर तो पश्चिम बंगाल के चुनाव में पंक्चर हो चुका है।

बात सिर्फ उतनी ही नहीं है बल्कि उत्तरप्रदेश में योगी जी से चाणक्य की पटती नहीं है। योगी जी खुद ही गर्म मिजाज के व्यक्ति हैं। ऐसे में कब कौन और कहां टकरा जाएगा, कोई नहीं कह सकता।

इसी बात पर हाल के दिनों के एक सुरीले गीत का याद आने लगी है। मेरी प्यारी बिंदू के लिए इस गीत को लिखा था कौसर मुनीर ने और उसे संगीत में ढाला था सचिन जिगर ने।

उसे सोनू निगम और परिणीति चोपड़ा ने अपना स्वर दिया था। शायराना अंदाज में यह गीत परिणीति पर भी फिल्मांकन से प्रारंभ होता है। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं
माना के हम यार नहीं लो तय है के प्यार नहीं
माना के हम यार नहीं लो तय है के प्यार नहीं
फिर भी नज़रें ना तुम मिलाना दिल का ऐतबार नहीं
माना के हम यार नहीं
रास्ते में जो मिलो तो हाथ मिलाने रुक जाना हो
साथ में कोई हो तुम्हारे दूर से ही तुम मुस्काना
लेकिन मुस्कान हो ऐसी की जिसमे इकरार नहीं
लेकिन मुस्कान हो ऐसी की जिसमे इकरार नहीं
नज़रों से ना करना तुम बयां वो जिससे इनकार नहीं

माना के हम यार नहीं..

फूल जो बंद है पन्नो में तुम उसको धुल बना देना
बात छिड़े जो मेरी कहीं तुम उसको भूल बता देना
लेकिन वो भूल हो ऐसी जिससे बेज़ार नहीं
लेकिन वो भूल हो ऐसी जिससे बेज़ार नहीं
तू जो सोये तो मेरी तरह इक पल को भी करार नहीं
माना की हम यार नहीं..

अब वहां से लौटकर झारखंड लौटते हैं तो यहां भाजपा का हाल तो कांग्रेस की तरह होता हुआ नजर आ रहा है। सार्वजनिक समारोहों में पार्टी के लोग जिस तेवर का प्रदर्शन कर रहे हैं, उससे माना जा सकता है कि कांग्रेस की अधिकांश बीमारियों को अब भाजपा ने गले लगा लिया है।

हाल के एक कार्यक्रम में जो कुछ हुआ, उसके बाद इसे लेकर संशय की कोई स्थिति नहीं है। अब देखना है कि पार्टी के पुराने नेता इस बिगड़ती हालत को संभाल भी पाते हैं अथवा इसी नई संस्कृति को यूं ही पनपने देते हैं।

इससे अलग भी चुपके चुपके पश्चिम बंगाल के खेला होबे गीत के धून भी कभी कभार सुनाई पड़ रहे हैं। अब यह खेला कौन और किसके साथ करने जा रहा है, इसका रहस्य को फिल्म के जारी होने के बाद ही पता चल पायेगा।



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