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असम के एनआरसी में बहुत सुधार की गुंजाइश




असम के एनआरसी की सूची का प्रकाशन हो गया है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इसमें करीब 19 लाख लोग बाहरी करार दिये गये हैं।

इनमें से करीब चार लाख लोगों के बारे में दावा है कि उनलोगों ने एनआरसी में नाम दर्ज कराने के लिए

आवेदन ही नहीं दिया था।

लेकिन इसे कोई अंतिम फैसला कतई नहीं माना जा सकता।

खुद असम के एनआरसी के बारे में सबसे कद्दावर मंत्री हेमंत विश्वशर्मा भी सूची के प्रकाशित होने के बाद

असंतोष व्यक्त कर चुके हैं।

करीब 16 सौ करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी जो सूची हमारे सामने आयी है उसमें कमसे कम दो नाम ऐसे हैं,

जिनपर सीधे सीधे बहस की गुंजाइश है।

पहला नाम भारत की तरफ से कारगिल की लड़ाई में भाग लेने वाले कैप्टन सनाउल्लाह का है।

कैप्टन सनाउल्लाह को बांग्लादेशी करार देते हुए हिरासत में तब लिया गया था जबकि सेना से रिटायर होने के बाद वह असम पुलिस की सेवा में थे।

दूसरा नाम वहां के एक लोकप्रिय पूर्व विधायक का है।

असम के एनआरकी की खामी बताने के लिए दो नाम ही काफी

सिर्फ इन दो नामों के उल्लेख से ही स्पष्ट है कि असम की एनआरसी में अभी और संशोधन करने की जरूरत है।

वैसे इस नागरिकता की जांच हो रही है, वह एक अच्छी बात है क्योंकि यह बात समझ में आती है कि

असम ही नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड में भी सीमावर्ती इलाकों में आबादी के असंतुलन में

बांग्लादेश से आये लोगों का बड़ा योगदान है।

सामान्य बात-चीत से ही बात समझ में आ जाती है कि यह लोग जो स्थानीय निवासी होने का प्रमाणपत्र लिये घूम रहे हैं,

वे दरअसल बांग्लादेश ही हैं क्योंकि वह अब भी स्थानीय भाषा और परंपराओं को अच्छी तरह से समझ भी नहीं पाये हैं।

इससे इलाकों में कई किस्म के नये तनाव भी पैदा हो रहे हैं।

इसलिए अगर पूरे देश में एनआरसी होती है तो यह एक अच्छी बात होगी।

लेकिन सवाल खर्च का भी है।

एक राज्य में अशुद्ध एनआरसी सूची को तैयार करने में जब 16 सौ करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं

तो यह पूरे देश के लिए होगा तो जनता पर नये सिरे से एक और अतिरिक्त आर्थिक बोझ लद जायेगा।

असम की स्थिति पर लौटें तो यह भी स्पष्ट हो चुका है कि अनेक जनजाति समुदाय के लोगों को

इस सूची से बाहर कर दिया गया है। इसे असम के एक नहीं कई मंत्रियों ने भी स्वीकारा है।

इसलिए अब नये सिरे से इसकी समीक्षा करने तथा सूची से बाहर छूट गये लोगों को अपना नाम दर्ज कराने के लिए कानूनी सहायता प्रदान करने की भी बात हो रही है।

आर्थिक मंदी के दौर में हम नये खर्च का बोझ नहीं उठा सकते

कानूनी सहायता के मद में फिर से अतिरिक्त आर्थिक खर्च होना तय है।

इस बात की गंभीरता को इसलिए अभी समझा जाना चाहिए क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था अत्यंत बीमार अवस्था की तरफ बढ़ रही है।

फिलहाल सरकार के पास इससे निपटने की कोई बेहतर योजना भी नहीं है।

अगर कोई योजना है भी तो उसके बारे में अब तक देश को जानकारी नहीं दी गयी है।

जिस तरीके से सत्ता और विपक्ष के सारे लोग इसकी खामियों की तरफ इशारा कर रहे हैं,

उससे कमसे कम इतना तो स्पष्ट है कि वर्तमान पद्धति में ढेर सारी खामियां रही हैं, जिन्हें सुधारा जाना चाहिए।

लेकिन इसकी अच्छी बात यह भी है कि इस प्रथम कोशिश में कमसे कम इतना तो पता चल ही गया है कि

इस काम को बेहतर तरीके से और सुव्यवस्थित तरीके से कैसे किया जा सकता है।

असम के अलावा उत्तर पूर्व के अन्य राज्यों में भी बांग्लादेश के नागरिकों के अलावा रोहिंग्या समुदाय के लोगों की भी घुसपैठ हुई है।

ऐसे में खास तौर पर रोहिंग्या समुदाय की पहचान की कोशिश बांग्लादेश की सीमा के अलावा भी

केरल तक में होना चाहिए क्योंकि वहां भी चुपके से जा बसने वाले रोहिंग्या समुदाय के लोग पकड़े गये हैं।

म्यांमार की भीषण स्थिति के बीच जो लोग जान बचाकर भागे हैं, उन्हें वापस कैसे भेजा जाए,

इस पर बात होनी चाहिए क्योंकि अवैध तरीके से जान बचाकर आने वालों के साथ साथ

वे अदृश्य चेहरे भी देश की जनता की भीड़ में शामिल हो रहे हैं,

जिनका मकसद देश की एकता और अखंडता को तोड़ना है।

देश में आतंकवादी गतिविधियों में शामिल विदेशियों की भी पहचान जरूरी

अनेक अवसरों पर इस तरीके के आतंकवादी संगठनों के लोगों की भी पहचान हो चुकी है,

जो नाम बदलकर विभिन्न इलाकों में आते हुए आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं।

पटना रेलवे स्टेशन के पास तक से ऐसे लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है।

इसलिए असम की तरह अन्य राज्यों में भी निश्चित तौर पर नागरिकता की पहचान का काम होना चाहिए।

लेकिन यह ध्यान रहे कि यह भी कमाई और भयादोहन का नया जरिया न बनकर रह जाए।

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