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कृत्रिम अग्नाशय अब खून में शक्कर की मात्रा को चौबीसों घंटे नियंत्रित करेगा

  • आविष्कार के बाद लगातार चल रहा था ट्रायल
  • 14 साल के कम उम्र के बच्चों पर आजमाया गया
  • रात की नींद में भी चुपचाप काम करती है मशीन
  • अनुसंधान के बाद क्लीनिकल ट्रायल में सफल घोषित की गयी नई पद्धति
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः कृत्रिम अग्नाशय (पैंक्रियाज) के अब क्लीनिकल ट्रायल के बाद सफल घोषित कर

दिया गया है। इस नये किस्म के अग्नाशय को अपना काम पूरा करने में सफल पाया गया है।

यह शरीर में शक्कर की मात्रा को लगातार चौबीसों घंटे नियंत्रित कर सकता है।

टाइप वन डायबिटीज के रोगियों के लिए यह एक सुखद संकेत है।

कंप्यूटर आधारित आंकड़ों के आधार पर यह यंत्र शरीर के अंदर की इस जिम्मेदारी को

बखूबी निभा रहा है, यह परीक्षण में साबित हो चुका है।

इस विधि को पहले ही विकसित कर लिया गया था।

प्रयोगशाला में सफल होने के बाद भी अब तक उसके इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी गयी थी।

वैज्ञानिक स्तर पर उसका क्लीनिकल ट्रायल चल रहा था।

अब इस क्लीनिकल ट्रायल में भी इस विधि को सही पाये जाने के बाद इसके इस्तेमाल की छूट दी गयी है।

इस कृत्रिम अगनाशय में एक खास किस्म का सेंसर लगा हुआ है जो दरअसल शरीर के अंदर के खून का नियमित विश्लेषण करता रहता है।

जब कभी खून में शक्कर की मात्रा में बदलाव दर्ज किया जाता है

तो यहां से मिले संकेत के आधार पर यह यंत्र अपने आप ही इंस्यूलिन पंप की तरह काम करने लगता है।

इस विधि के विकसित होने के बाद उसे क्लीनिकल ट्रायल के लिए अनेक केंद्रों को उपलब्ध कराया गया था।

सभी परीक्षण केंद्रों में यह सफल और कारगर तरीके से काम करने के लायक पाया गया है।

इस बारे में न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में जानकारी दी गयी है।

पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया है कि इस पद्धति की नियंत्रण पद्धतो को वर्जिनिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने तैयार किया है।

कृत्रिम अग्नाशय की पद्धति के कई चरणों में हुआ है परीक्षण

इसके शोध से जुड़े वैज्ञानिकों ने बताया है कि दरअसल यह कृत्रिम अग्नाशय एक मधुमेह नियंत्रण पद्धति है।

यह शरीर के अंदर के पैंक्रियाज के जैसा ही काम करता है लेकिन यह कृत्रिम है।

इसमें कंप्यूटर आधारित आंकड़ों के आधार पर विश्लेषण की प्रक्रिया अपनाया गयी है।

इसी प्रक्रिया की वजह से शरीर के खून को लगातार परखा जाता है और जब जैसे जरूरत होती है शक्कर की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए इसमें लगे इंस्यूलियन पंप खुद ब खुद चालू हो जाता है।

वैज्ञानिक मान रहे हैं कि इस विधि के सफल होने के बाद अब हर रोज अंगुली की नोक से खून निकालकर सुगर की मात्रा जांचने तथा दिन में एक अथवा दो बार इंस्यूलिन का इंजेक्शन लेने के दर्द से रोगियों को मुक्ति मिल जाएगी।

परीक्षण में पाया गया है कि जिन रोगियों पर इसका परीक्षण किया गया है, उनके खून में शक्कर की मात्रा बेहतर तरीके से नियंत्रित रही है।

इससे रोगियों को स्वास्थ्य संबंधित दूसरे लाभ भी हुए हैं।

साथ ही सामान्य आचरण में भी ऐसे लोगों का व्यक्तित्व और आचरण बदला हुआ पाया गया है।

इससे यह भी साबित होता है कि शरीर में शक्कर की मात्रा नियंत्रित नहीं होने की स्थिति में रोगियों को मानसिक और शारीरिक तौर पर अप्रत्यक्ष बदलावों से भी गुजरना पड़ता है।

रिसर्च के निष्कर्षों से संतुष्ट है इससे जुड़े वैज्ञानिक

वैज्ञानिक इस मशीन की इस उपलब्धि से भी संतुष्ट हैं कि यह शक्कर की मात्रा को अत्यधिक कम होने की स्थिति में बेहतर काम करता है।

दरअसल यह वैज्ञानिक परीक्षण का निष्कर्ष है कि इस किस्म के रोगियों को सबसे अधिक खतरा नींद में होता है।

इस दौरान अचानक उनके शक्कर की मात्रा खतरनाक तरीके से कम हो जाती है।

यह कृत्रिम अग्नाशय इस खतरे से भी रोगियों को बचाता रहता है और रोगी के नींद में होने के दौरान भी अपना काम करता जाता है।

इस पद्धति के विकसित होन के बाद पांच अलग अलग केंद्रों में इसका गहन परीक्षण किया गया था।

इस केंद्रों के साथ दस अन्य रिसर्च सेंटर भी जुड़े हुए थे।

इनमें माउंट सिनाइ का आइकन स्कूल ऑफ मेडिसीन भी है।

छह महीने तक लगातार इस पर अनुसंधान और शोध किया गया है।

क्लीनिकल ट्रायल के तीसरे चरण में हुए इस गहन शोध में मशीन के काम करने तथा उसकी खूबियों और खामियों की परख हुई है।

माउंट सिनाई केंद्र के स्वास्थ्य निदेशक कारोल लेवी कहते हैं कि यह विधि दुनिया भर के टाइप वन डायबिटीज के रोगियों के लिए वरदान जैसी स्थिति है।

परीक्षण में शामिल किये गये 168 रोगियों में से सभी 14 वर्ष या उससे कम उम्र के थे।

इन सभी बच्चों को टाइप वन डायबिटीज से काफी परेशानी थी।

इनलोगों पर अलग अलग तरीके से इस विधि का लगातार परीक्षण किया गया और उसके परिणामों को दर्ज किया जाता रहा।

आंकड़े दर्ज करने के बाद मशीन का काम सुधरता जाता है

प्रारंभिक चरण में मशीन सही तरीके से काम नहीं कर पाय रही थी।

लेकिन जैसे जैसे रोगियों के शरीर के तमाम आंकड़े इसमें दर्ज होते चले गये,

मशीन के काम करने की गुणवत्ता में सुधार होता चला गया।

इससे समझा गया कि इसमें जोड़े गये कंप्यूटर आंकड़ों को विश्लेषित करने के लिए

मशीन को संबंधित मरीज के शरीर के आंकड़ों की जरूरत पड़ती है।

इन आंकड़ों के हासिल होन के बाद मशीन सही तरीके से काम करने लगती है।

मशीन के सही तरीके से काम करना प्रारंभ होने बाद बाहर से इनपर कोई रिमोट कंट्रोल भी नहीं लगाया गया।

यह पाया गया कि सभी रोगियों में शक्कर की मात्रा हमेशी ही 70 से 180 मिलीग्राम के दायरे में नियंत्रित रही।

ऐसा लगातार छह महीने तक चलता रहा। इस दौरान एचबीए वन सी के परीक्षण के रिपोर्ट भी सही रहे।

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