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कृत्रिम बुद्धि यानी आर्टिफिशियल इंटैलिजेंस करेगा कोरोना की जांच

  • मेडिकल टेस्ट को तेज कर सकती है यह आधुनिक विधि

  • बिना थके और बीमार पड़े काम करेगी विधि

  • एप के आंकड़ों का त्वरित विश्लेषण भी करेगा

  • प्रयोग में 80 प्रतिशत सफलता का दावा किया

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः कृत्रिम बुद्धि यानी आर्टिफिशियल इंटैलिजेंस भी अब कोविड 19 की जांच में

काम आ सकता है। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक मान रहे हैं कि इस विधि से पारंपरिक

कोरोना जांच की आवश्यकता ही समाप्त हो जाएगी। इससे जांच की गति अत्यंत तेज

होगी, जो इस वक्त दुनिया की सबसे बड़ी जरूरत है। दरअसल कोरोना की जांच में समय

लगने और उसकी रिपोर्ट में गड़बड़ी की गुंजाइश होने की वजह से ही सूचना तकनीक के

वैज्ञानिक इस विधि के बारे में पहले से ही विचार कर रहे थे। इसके पहले भी कृत्रिम बुद्धि के

इस्तेमाल से रोगों के निर्धारण के प्रयोग सफल हो चुके हैं। इसके आधार पर कई ऐसी

मशीनों और रोबोट का भी निर्माण किया जा चुका है जो समय और लागत दोनों की बचत

कर सकते हैं। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मशीनी स्तर पर काम होने की वजह से यह

बिना थके लगातार काम कर सकता है। दूसरी तरफ संक्रामक किस्म की बीमारियों में

इसके खुद के संक्रमित होने का कोई खतरा भी नहीं होता।

कृत्रिम बुद्धि से लैश मशीन सारा काम करते हैं

लंदन के किंग्स कॉलेज के अनुसंधानकर्ताओं ने मैसेच्युट्स जनरल अस्पताल और होई

नामक स्वास्थ्य विज्ञान कंपनी की मदद से यह विधि विकसित की है। इसमें दावा किया

जा रहा है कि यह आर्टिफिशियल इंटैलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धि से युक्त पद्धति अपने आप

ही कोरोना की जांच की पूरी प्रक्रिया को पूरा कर सकती है। इसके बारे में नेचर मेडिसीन

नामक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में एक शोध प्रबंध प्रकाशित किया गया है। दरअसल रोग के

पूर्व आंकड़ों के आधार पर मशीनी बुद्धि को यह विश्लेषण करना सीखाया गया है कि सामने

खड़ी व्यक्ति को कोरोना हो सकता है अथवा नहीं। या फिर मशीनी आंख से नजर आ रहे

लक्षणों से उसे कोरोना संक्रमण है अथवा नहीं, यह उसका आकलन कर सकता है। इस

कृत्रिम बुद्धि से लैश यंत्र पहले से तैयार कोविड के लक्षण बताने वाले एप की मदद से रोग

विश्लेषण किया करते हैं।

इसे तैयार करने वालों का कहना है कि इसमें पारंपरिक जांच पद्धति में अपनाये जाने वाली

प्रक्रियाओं को भी शामिल किया गया है। इसे तैयार करने का मकसद मेडिकल जांच के

लिए लगने वाली भीड़ को कम करना है। आर्टिफिशियल इंटैलिजेंस के माध्यम से सिर्फ

उनलोगों को ही जांच के लिए आगे भेजा जा सकता है, जिनमें इसके लक्षण हो अथवा

जिनकी संरनचा कोविड 19 के हमले के लायक हो। ऐसे में मेडिकल जांच पर अभी पड़ रहा

दबाव बहुत हद तक कम हो जाएगा। जिनकी वाकई जांच की जानी चाहिए, वैसे मरीजों की

संख्या भी कम होगी। साथ ही जांच के लिए लगने वाली लंबी लाइनों से भी छुटकारा मिल

जाएगा। मशीन जांच के बाद लगातार रिपोर्ट देती चली जाएगी। इस विधि को प्राथमिक

परीक्षण में सफल माना गया है। इसी वजह से अब वैज्ञानिक इसका वास्तविक यानी

क्लीनिकल ट्रायल भी प्रारंभ करने जा रहे हैं।

कोविड एप का प्रयोग कर रहे हैं 33 लाख लोग

कोविड संक्रमण की जांच में मदद करने वाले कोविड एप को दुनिया में अब तक करीब 33

लाख लोगों ने डाउनलोड किया है। इसी वजह से एप को इस कृत्रिम बुद्धि से जोड़ा गया है।

यह एप हरेक के स्वास्थ्य के बारे में नियमित रिपोर्ट देता है। इसमें सेहत की स्थिति के

साथ साथ कोरोना संबंधी कोई अन्य पहचान होने का भी पता चलता जाता है। शोध करने

वालों ने ब्रिटेन में 25 लाख लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया है। यह 25 लाख लोग

नियमित तौर पर एप का इस्तेमाल कर रहे हैं और उनकी सेहत की अद्यतन जानकारी

इसी एप के माध्यम से मिल रही है। जिनमें कोरोना के लक्षण पाये गये थे वैसे 18374

लोगों में से सिर्फ 7178 लोगों में वास्तव में कोरोना संक्रमण पाया गया है। इससे समझा

जा सकता है कि एप के इस्तेमाल से जांच कराने वालों की संख्या कितनी कम हुई है।

इसके बाद भी अस्पतालों में कोरोना की जांच कराने वालों की भीड़ को और कम करने में

यह नई एआई (आर्टिफिशियल इंटैलिजेंस) की विधि बहुत मददगार बनेगी। इसमें

आवश्यकतानुसार उन अन्य लक्षणों को भी जोड़ा जा सकता है, जो कोरोना वायरस के रुप

बदलने की वजह से अब के रोगियों में नजर आने लगे हैं। इस पूरी प्रक्रिया को एक

गणितीय मॉडल के जरिए तैयार किया गया है। शोध में यह पाया गया है कि यह विधि

करीब 80 प्रतिशत तक सही रिपोर्ट दे रही है।


 

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