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गिरगिट जैसा रंग बदलने वाला नकली चमड़ा बना डाला




  • प्रारंभिक प्रयोग हो गया है पूरी तरह सफल
  • गर्मी में लाल और ठंड में नीला हो जाता है नकली चमड़ा
  • कैम्ब्रिज के वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में बनाया नकली चमड़ा
  • जांच के क्रम में बीच में यह बिना किसी रंग का भी नजर आता है
प्रतिनिधि

नयीदिल्लीः गिरगिट की कहावत को भारतीय लोक परंपरा में प्रसिद्ध है।

हम आज भी अक्सर ही किसी की उपेक्षा से दुखी होने पर यह कह देते हैं कि गिरगिट की तरह रंग बदल लिया है।

तो भाई साहब अब तैयार हो जाइये। वाकई आने वाले दिनों में आप गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले चमड़ों को देखने वाले हैं।

वैज्ञानिकों ने इसे सफल कर दिखाया है। यह कृत्रिम चमड़ा वाकई गिरगिट के जैसा रोशनी में रंग बदल सकता है।

वैसे इसके शोध से जुड़े वैज्ञानिक यह मन रहे हैं कि इसका कोई सामान्य उपयोग नहीं होने जा रहा है।

इसलिए हो सकता है कि इस नकली चमड़ी का इस्तेमाल खास तौर पर

सेना के लिए हो अथवा बहुत बड़े बड़े बहुआयामी डिसप्ले के लिए उनका इस्तेमाल किया जाए।

कैम्ब्रिज के वैज्ञानिकों ने इसे बनाने के बारे में भी जानकारी दी है।

विज्ञान अनुसंधान की कई जरूरी सूचनाएं

इसमें बताया गया है कि सोना के अत्यंत सुक्ष्म कणों को पॉलिमर की खोल के अंदर भरा गया है।

उन्हें दबाव की स्थिति में पानी के छोटे बुलबुलों के बीच रख दिया गया है।

यह काम तेल के भीतर किया गया है ताकि पानी के बुलबुलों के बीच वे स्थिर रह सके।

इसके तैयार होने के बाद जब यह पूरा ढांचा किसी रोशनी अथवा गरमी के संपर्क में आता है

तो सारा ऐसे कण आपस में चिपक जाते हैं।

इससे ढांचे का रंग बदलने लगता है। एडवांस्ड ऑप्टिकल मैटेरियल्स की पत्रिका में

इस बारे में विस्तार से जानकारी दी गयी है।

वैसे जिस विधि से इसे तैयार किया गया है, वह सुनने में जितना आसान है,

वह तैयार करने के मामले में उतना ही कठिन है।

गिरगिट के अलावा कई अन्य प्राणियों में भी यह गुण

हम जानते हैं कि गिरगिट और कुछ खास प्रजाति की मछलियों में यह गुण पहले से विद्यमान है।

यहां तक कि समुद्र का प्राणी ऑक्टोपस भी रंग बदल लेता है।

अब इसी विधि का अनुसरण करते हुए वैज्ञानिकों ने यह नकली चमड़ी तैयार की है।

इसके काम करने के बारे में वैज्ञानिकों ने बताया है कि दरअसल जिन सुक्ष्म जल कणों के भीतर सारा कुछ समाया होता है, उन्हीं जल कणों की रोशनी अथवा गर्मी के प्रभाव की वजह से यह रंग बदलता रहता है।

प्रयोग में यह पाया गया है कि 32 डिग्री सेल्सियस के ऊपर जाते ही इसके अंदर प्रतिक्रिया होने लगती है।

जेनेटिक विज्ञान की कुछ रोचक सूचनाएं

दूसरी तरफ जब यह फिर से ठंडा होने लगता है तो आपस में चिपके हुए नैनो पार्टिकल्स फिर से एक दूसरे से दूर हो जाते हैं।

इस वजह से ऊपर से इस चमड़े का रंग फिर से बदलने लगता है।

यानी नैनो पार्टिकल्स के करीब आने और दूर जाने की विधि पर यह रंग बदलने का काम चलता रहता है।

इस शोध से जुड़े कैम्ब्रिज के वैज्ञानिक एंड्र्यू सालमन ने कहा कि प्रयोग में कई अवसरों पर अजीब अजीब रंग भी तैयार हुए हैं।

अभी कई और पर्त लगेंगे तब रंग बिरंगा चमड़ा बनेगा




इसलिए जरूरत के मुताबिक रंग तैयार करने की विधि को स्थिर करने का काम चल रहा है।

अभी जब ये सारे नैनो पार्टिकल्स एक दूसरे के दूर हो जाते हैं तो इसका रंग लाल हो जाता है और जब एक दूसरे से चिपके होते हैं तो वे नीला रंग तैयार कर देते हैं।

कई मौके पर यह लगभग बिना रंग का भी हो जाता है।

चूंकि भी यह सिर्फ एक लेयर का प्रयोग है इसलिए इसमें रंग भी एक ही बदलता है।

लेकिन कई लेयरों में इसे तैयार कर एक साथ जोड़ देने के बाद यह विविध रंग तैयार करने वाला साबित होगा।

तब यह असली चमड़े के जैसा कई स्तरों का भी हो जाएगा।

वैज्ञानिक प्रारंभिक प्रयोग के सफल होने के बाद इसी विधि को और परिष्कृत बनाने का काम कर रहे हैं।

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