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कृत्रिम हड्डी भी बन गयी अब प्रयोगशालाओं में

  • एक चिप भी लगा है इस अस्थि में

  • खुद ही अपना विकास भी कर सकेगा

  • सारे कृत्रिम अंग भी बनेंगे इस तकनीक से

  • चिकित्सा जगत में क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः कृत्रिम हड्डी बनने लगी है। वैज्ञानिकों ने इस जटिल संरचना को भी अपने

तरीके से अपनाने में सफलता पायी है। इस किस्म की कृत्रिम अस्थियों को तैयार करने की

तकनीक विकसित होने की वजह से अब चिकित्सा जगत में बहुत कुछ बदलने जा रहा है।

इसके पहले से ही घुटना प्रत्यारोपण जैसी तकनीक पूरी दुनिया में प्रचलित है और उससे

अनेक लोगों को लाभ भी हुआ है। इस तकनीक के आधार पर मानव अंगों का विकास कर

पाना भी अपेक्षाकृत आसान होने की उम्मीद जतायी गयी है। शेफिल्ड विश्वविद्यालय के

इंजीनियरों ने यह कमाल कर दिखाया है। इस बारे में अब तक जो जानकारियां सामने

आयी हैं, उसके मुताबिक एक छोटे आकार के चिप के साथ तैयार यह कृत्रिम हड्डी मानव

अस्थियों के टिशू भी तैयार कर पायेगी। प्रयोगशाला में यह काम कर पाना संभव होने की

वजह से किसी भी हड्डी को अब इस नये विकल्प से आसानी से बदल जाना संभव होगा

और शरीर के अंदर भी अस्थि से संबंधित टिशू का विकास किया जा सकेगा। यह बताया

गया है कि शेफिल्ड के इस अनुसंधान के साथ स्पेन के रामोन लूल विश्वविद्यालय के

वैज्ञानिक भी जुड़े हुए थे। इस बारे में प्रकाशित आलेख में वैज्ञानिकों ने उस विधि की

जटिल वैज्ञानिक जानकारी दी है, जिसके आधार पर यह काम कर पाना संभव हुआ है।

लिहाजा अब किसी भी क्षतिग्रस्त हड्डी को भी बदल देना संभव होगा।

कृत्रिम हड्डी का चिप खुद ही हड्डी के टिश्यू बना सकता है

मजेदार बात यह है कि कृत्रिम हड्डी में जो चिप लगाया गया है, उसमें जीवित कोषों का

इस्तेमाल किया गया है। इसी वजह से वे अपने आप ही अस्थियों के रेशे तैयार कर सकते

हैं। इस बारे में यह भी दावा किया गया है कि इस विधि से हड्डियों को तैयार किये जाने की

वजह से पहले जो क्लीनिकल ट्रायल की आवश्यकता होती थी, वह भी समाप्त हो जाएगी।

आम तौर पर क्लीनिकल ट्रायल में जानवरों का जो इस्तेमाल अब तक होता आया है, वह

भी काफी हद तक समाप्त हो जाएगा। वैज्ञानिकों ने बताया है कि इस हड्डी में जो चिप

लगा है, उसे जरूरत के हिसाब से अन्य कोषों से भी तैयार किया जा सकता है। हड्डी के

बदले इंसान की शरीर के अन्य आंतरिक अंगों के लिए आवश्यतानुसार ऐसे चिप बना पाना

संभव होगा, जो खुद ही शेष हिस्से का निर्माण करने के लिए टिशूज बनाते चले जाएंगे।

इसी वजह से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि इस शोध के और विकसित होने की

स्थिति में पूरी चिकित्सा जगत की प्रक्रिया और तकनीक ही बदल जाएगी। साथ ही नई

दवाइयों का परीक्षण भी अपेक्षाकृत आसान हो जाएगा।

शोध से जुड़े वैज्ञानिक इस कृत्रिम हड्डी को शरीर के अन्य अंगों के साथ जोड़ने और पूरी

सक्रियता देकर पूरी स्थिति को ही बदल देना चाहते हैं। इसमें सफलता मिलने की स्थिति

में जानवरों पर क्लीनिकल ट्रायल की आवश्यकता भी शायद समाप्त हो जाएगी।

थ्री डी पर तैयार हड्डी दिखने में भी असली जैसी ही

परीक्षण में जो तैयार किया गया है वह त्रि आयामी है और वह देखने में भी असली हड्डी के

जैसा ही है। इसे बनाने में पॉलिमराइज्ड फेज इमलसन का इस्तेमाल किया गया है, जिसे

वैज्ञानिक परिभाषा में पॉलीहाईप करते हैं। इसे दूध के जैसी स्थिति में रसायन के होने के

बाद बनाया गया है। यह एक वैसी पर्त है, जिनमें दूध और पानी दोनों हैं पर दोनों एक दूसरे

से घुले मिले होते हैं। इसमें एक खास किस्म का तेल अल्ट्रावॉयोलेच किरणों के नीचे से

गुजारते हुए प्लास्टिक का वह पदार्थ तैयार किया जाता है जो ठोस अवस्था को प्राप्त

करता है। इसकी विशेषता यह है कि वह नये कोष भी बनाने में सक्षम होता है क्योंकि

उसमें यह काम करने का चिप लगा हुआ है। इसकी संरचना कुछ ऐसी है कि इसके अंदर

लाखों छोटे छोटे छेद बने हुए हैं, जो आपस में किसी भी तरल की वजह से संपर्क में रहते हैं।

इसी पद्धति से थ्री डी बोन टिशू बनाये जा सके हैं। इस विधि के सफळ होने के बाद

प्रयोगशाला में ही कृत्रिम मानव अंग विकसित कर उनपर दवा का परीक्षण करना संभव

होगा और उसे लगातार वैज्ञानिक देख समझ भी पायेंगे। इसी वजह से ऐसा माना जा रहा

है कि कृत्रिम हड्डी का यह परीक्षण पूरे चिकित्सा जगत को बदलने वाला साबित होने जा

रहा है।

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