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आर्कटिक के बर्फ में विशाल गड्डा नजर आया




प्राचीन काल के बर्फ में दबे हैं वायरस भी
आकार में बहुत लंबी दरार पहले नजर आयी
समुद्री जलस्तर का ऊंचा उठना तो इससे तय है
प्रदूषण और मौसम के बदलाव के बड़े खतरे दिखने लगे
राष्ट्रीय खबर

रांचीः आर्कटिक के सबसे प्राचीन और मोटा समझे जाने वाले बर्फ में भी गड्ढा हो गया है। बढ़ते प्रदूषण और मौसम के बदलाव के बड़े खतरे अब साफ साफ नजर आने लगे हैं। वैज्ञानिकों की चिंता आर्कटिक को लेकर हैं। वहां से अंतिम बर्फ खंड के भीतर ही एक बहुत बड़ा गड्ढा हो गया है।




इसके एक साथ कई खतरे हो सकते हैं और संभावित खतरों से निपटा कैसे जाए, इस बारे में उच्च स्तर पर विचार विमर्श चल रहा है। दरअसल जिस इलाके में यह बड़ा सा गड्ढा नजर आया है, वह पहले आर्किटक इलाके का सबसे स्थायी बर्फखंड माना गया था। लेकिन अब इसमें भी खाई बन जाने के बाद पूरे इलाके के भविष्य पर संकट मंडराता नजर आ रहा है।

अगस्त माह में इस स्थान पर अधिक बर्फ पिघलने की सूचना दर्ज की गयी थी। वैसे पूर्व के वैज्ञानिक आंकड़े और सैटेलाइट चित्र बताते हैं कि यहां पहले भी बर्फ पिघलने की घटनाएं होती रही है। लेकिन इससे पहले कभी भी पूरा बर्फ पिघल जाए, ऐसा कोई रिकार्ड मौजूद नहीं है।

आर्कटिक के इस पर्त से हट जाने के बाद पृथ्वी पर बिछा हुआ अति प्राचीन बर्फ का चादर, जो करीब बारह हजार वर्ष पुराना है, वह भी हवा के संपर्क में आ जाएगा।

वैज्ञानिकों की चिंता इस बात को लेकर भी है कि बर्फ की इस गहराई में अनेक किस्म के वायरस भी सुप्तावस्था में पड़े हुए हैं। हवा और सूर्य की रोशनी के संपर्क में आने से वे भी जीवित हो उठेंगे।

इन वायरसों के आचरण और मारक क्षमता का कभी आकलन भी नहीं किया जा सका है। इससे कोरोना संकट के बीच यह नई परेशानी खड़ी होती नजर आ रही है।

आर्कटिक के सैटेलाइट चित्रों से मिलान किया गया है

सैटेलाइट चित्रों के रिकार्ड बताते हैं कि वर्ष 1988 और वर्ष 2004 में भी इस स्थान पर छोटे गड्ढे बने थे। लेकिन वे कभी भी इतनी गहरी खाई जैसी शक्ल में नजर नहीं आये थे। अब खाई बन जाने से अंदर दबा बर्फ भी पिघलने की स्थिति में आ गया है।

दरअसल यहां बर्फ की चादर इतनी मोटी है कि सामान्य अवस्था में इनके पिघलने की कल्पना तक नही की गयी थी। अब इस विषय पर शोध करने वाले यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो (मिसिसागुआ) के शोधकर्ताओं के मुताबिक ऐसी स्थिति इससे पहले कभी नहीं देखी गयी थी।

इस इलाके में समुद्री बर्फ की मोटाई भई औसतन चार मीटर की होती है। वे करीब पांच वर्षों तक एक ही स्थान पर मजबूती के साथ जमे रहते हैं।




खास तौर पर एलिसमेरे द्वीप के उत्तरी छोर पर इसे देखा गया है। अब उत्तरी क्षेत्र में गर्मी अधिक पड़ने की वजह से वह बर्फ भी पिघल रही है, जिसकी कल्पना ही नहीं की गयी थी। इसकी वजह से अति प्राचीन काल से यहां पड़कर नीचे दबे हुए बर्फ भी पिघलकर पानी में तब्दील होने लगी है।

इसके पानी बनने की वजह से उसमें मौजूद प्राचीन वायरस भी बाहर निकलने लगे हैं। गत जुलाई माह में ही किये गये एक सर्वेक्षण में यह पाया गया था कि वहां के सबसे प्राचीन बर्फ का इलाका भी आधा से अधिक गलकर पानी हो गया है।

अब इस चादर के और पतला होने की वजह से उसके फिसलकर समुद्र में जा गिरने का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। यह पहले से पता है कि विशाल बर्फखंड अगर फिसलकर समुद्र में जा गिरे तो समुद्री जलस्तर का अचानक से ऊपर उठना तय है।

सारा बर्फ समुद्र में गया तो क्या होगा सभी को पता है

वैसी स्थिति में समुद्र के किनारे बसे अनेक इलाके रातों रात पानी में डूब जाएंगे। ऐसा पहले भी प्राचीन काल में हो चुकी है। वैज्ञानिक मान रहे हैं कि अगर आगे इस स्थिति में सुधार भी हुआ तब भी खतरा बना हुआ है क्योंकि बर्फ के पिघलने की गति तेज होती जा रही है।

इसकी वजह से इस सदी के अंत तक गर्मी के मौसम में सारा बर्फ ही पिघलकर समुद्र में चला जाएगा। वैसी स्थिति में यहां के माहौल में जीवित रहने वाले प्राणी भी प्राकृतिक मौत मारे जाएंगे। इनमें पोलर बियर जैसे प्राणी भी हैं, जो इसी इलाके में जिंदा रह सकते हैं।

इस खतरे का पता चलने के बाद वैज्ञानिकों ने पुराने सैटेलाइट चित्रों से यह पता लगाया है कि मई 2020 में वहां एक दरार सा नजर आया था। जो बाद में गायब हो गया था।

लेकिन अब के घटनाक्रम से यही समझा जा रहा है कि ऊपर से बर्फ से ढक जाने के बाद भी यही दरार अंदर ही अंदर पानी को पिघलाता रहा। अब गर्मी अधिक होने की वजह से यह विशाल गड्ढे के तौर पर साफ साफ नजर आ रहा है।

उस दरार के बारे में बताया गया है कि तब यह यह दरार करीब एक सौ किलोमीटर लंबा और 30 किलोमीटर चौड़ा था। यूनिवर्सिटी ऑफ मानिटोबा (कनाडा) के शोधकर्ता डेविड बैब के मुताबिक इस बार का गड्ढा यह साबित कर देता है कि बढ़ते प्रदूषण और मौसम के बदलाव के माहौल में पूरी पृथ्वी पर खतरा मंडराने लगा है।



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