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आर्कटिक का बर्फ पिघला तो जानलेवा वाइरस बाहर निकले







  • समुद्री जीवन को समाप्त कर रहा है खतरनाक विषाणु
  • घने बर्फ के अंदर काफी समय से दबे हुए थे
  • शून्य से नीचे के तापमान में निष्क्रिय थे विषाणु
  • खुले जल में आये तो प्राणियों पर हमला करने लगे
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः आर्कटिक का बर्फ पिघलना वैज्ञानिकों के लिए नई चिंता का कारक बना है।

पहली बार इस बात की जानकारी मिली है कि वहां बर्फ के नीचे अत्यंत प्राचीन काल से खतरनाक किस्म के विषाणु दबे हुए थे।

बर्फ में जमे होने की वजह से वे निष्क्रिय थे। अब फिर से बर्फ पिघलने की वजह से वह शीत निद्रा से जाग रहे हैं।

इनके जागने की वजह से आस-पास के इलाकों का समुद्री जीवन पर खतरा मंडराने लगा है।

वहां के ठंडे पानी में रहने वाले समुद्री जीवों पर इसका जानलेवा खतरा अभी से ही दिख रहा है।

आर्कटिक के इलाके में चल रहे शोध के दौरान यह आंकड़े और वैज्ञानिक साक्ष्य सामने आये हैं।

जिस नये वाइरस की पहचान हुई है, उसे फोसिन डिस्टेंपर वाइरस (पीडीवी) कहा गया है।

यह पैथाजोन श्रेणी का वायरस है जो उस इलाके की सील मछलियों को अपनी चपेट में ले चुका है।

इस प्रजाति के सील में इस किस्म की बीमारी का पता तो वर्ष 2002 से ही चल गया था।

लेकिन अब तक उसके असली कारणों का खुलासा नहीं हो पाया था।

अब पहली बार इसी वाइरस की वजह से इस प्रजाति के असंख्य मछलियों के पीड़ित होने की जानकारी सामने आयी है।

वैज्ञानिक शोध का निष्कर्ष है कि वहां बर्फ के दबे और निष्क्रिय रहे वाइरस अब पानी में आकर जीवित हो उठे हैं।

इस वजह से आर्कटिक क्षेत्र के प्रत्यक्ष और परोक्ष संपर्क में आने वाले समुद्री इलाके इस वाइरस की चपेट में आ रहे हैं।

उत्तरी प्रशांत महासागर में अभी इस वायरस का असर सबसे ज्यादा देखा जा रहा है।

जैसे जैसे वाइरस आगे बढ़ रहे हैं वैसे वैसे अधिकाधिक समुद्री जीवन इनकी चपेट में आता जा रहा है।

आर्कटिक का बर्फ पिघलकर समुद्र में पहुंच रहा है

इस बारे में विस्तार से एक जानकारी एक शोध प्रबंध में दी गयी है।

इस शोध से जुड़े वन हेल्थ इंस्टिट्यूट (यूसी डेविस स्कूल ऑफ वेटेनरी साइंस) के सहायक निदेशक ट्रेसी गोल्डस्टेइन ने इस बारे में जानकारी दी है।

उनके मुताबिक अब तक के आंकड़े यही दर्शाते हैं कि वाइरस संक्रमण वर्ष 2001 से प्रारंभ होने के बाद वर्ष 2016 तक बढ़ता ही चला गया है।

शोध निष्कर्ष में सील की कई प्रजातियों के अलावा अन्य समुद्री जीव भी इसकी चपेट में आने लगे हैं।

वैज्ञानिकों को इस बात की जानकारी मिल गयी है कि यह वाइरस एक प्राणी से दूसरे प्राणी तक फैलता जा रहा है।

कई समुद्री जीव काफी दूर तक तैरकर चले जाते हैं।

इस वजह से संक्रमण भी दूर समुद्र तक फैलता जा रहा है।

वाइरस के संक्रमण से होने वाले समुद्री जीवन के नुकसान के संबंध में शोध के क्रम में ही इन वाइरसों के स्रोत की तलाश प्रारंभ हुई थी।

इसी क्रम में लगातार आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए वैज्ञानिक इस नतीज पर पहुंचे है कि जैसे जैसे बर्फ पिघल रहा है, वैसे वैसे उसमें दबे वाइरस बाहर निकल रहे हैं।

शोध को आगे बढ़ाने के बाद ही वैज्ञानिकों को पहली बार पता चला कि ऐसे वाइरस पृथ्वी पर पहले से ही विद्यमान थे।

लेकिन घने बर्फ के अंदर दबे होने की वजह से वह निष्क्रिय पड़े हुए थे।

यहां के ठंडे पानी में आने वाले सील सबसे पहले पीड़ित हुए हैं

बर्फ पिघलने के बाद जब वे खुले जल के संपर्क में आये

तो तापमान में वृद्धि की वजह से उनमें सक्रियता आती चली गयी।

सक्रिय होने के बाद ऐसे वाइरसों ने अपने नजदीक आने वाले समुद्री जीवों को अपनी चपेट में लेना प्रारंभ किया।

समुद्र के इस इलाके में सील मछलियां सबसे अधिक थीं।

बर्फ से पिघले जल की वजह से वहां का समुद्री जल का तापमान भी काफी ठंडा होता है।

यहां ठंडे पानी में समुद्री सील आसानी से विचरण कर लेते हैं।

इस वाइरस प्रभावित पानी में आने वाले सील आसानी से इसकी चपेट में आ गये।

यहां से अन्यत्र जाने के क्रम में इन्हीं समुद्री जीवों ने अन्य इलाकों तक भी इस वाइरस को पहुंचा दिया।

इससे अब समुद्री जीवन तेजी से इस वाइरस की चपेट में आता चला जा रहा है।

वैज्ञानिकों की राय में यह एक नये किस्म के खतरा है,

जिसके बारे में पहले न तो कल्पना और न ही कोई गणना की गयी थी।



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