fbpx Press "Enter" to skip to content

करीब एक साल के रिसर्च के बाद वैज्ञानिकों ने पता लगाया

  • चांद पर मिला चिपचिपा पदार्थ पिघला हुआ पत्थर है

  • चीन के चंद्रयान के रोवर ने खोजा था

  • जबर्दस्त टक्कर से पत्थर ही पिघला था

  • उल्कापिंड टक्कर के बारे में नई जानकारी

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः करीब एक साल तक इस पर लगातार अनुसंधान के बाद उसके नतीजे मिले हैं।

चांद पर वहां की गहरी खाइयों में से एक में से चीन के  चंद्रमा रोवर ने एक चिपचिपे जेली

जैसे पदार्थ की खोज की थी। यह पिछले वर्ष के अगस्त माह की घटना है। तब से वैज्ञानिक

लगातार यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि दरअसल यह चिपचिपा पदार्थ आखिर

क्या है। अब जाकर उसके बारे में स्पष्ट जानकारी मिली है। चीन के एकाडेमी ऑफ साइंस

ने इसके बारे में एक विस्तारित रिपोर्ट प्रकाशित की है। इसमें अब जाकर यह बताया गया

है कि यह दरअसल वहां उल्कापिंड के गिरने से पिघले पत्थर का ही एक प्रकार है। इसे

वैज्ञानिक भाषा में इम्पैक्ट मेल्ट ब्रेसिया कहा जाता है। यानी जब कोई उल्कापिंड तेजी से

किसी सतह पर गिरता है तो उसकी जोरदार टक्कर से नीचे के सतह के पत्थर भी टूटते हैं।

इसी घर्षण के बीच पत्थर के कुछ हिस्से गरमी की वजह से पिघलकर ऐसी शक्ल

अख्तियार कर लेते हैं। चीन के वैज्ञानिकों की यह रिपोर्ट जर्नल अर्थ एंड प्लेनेटरी साइंस

लेटर्स में भी प्रकाशित की गयी है। याद रहे कि चीन के अपने चंद्रयान अभियान के तहत

चांद की उस तरफ अपना यान उतारा है, जो धरती से नजर नहीं आता है। यान को उतार

लेने के बाद उसमें भेजा गया रोवर वहां के नमूनों की जांच करता जा रहा है। इसी क्रम में

इस रोवर, जिसे यूटू 2 कहा जाता है, ने चांद की एक खाई में से यह चिपचिपा पदार्थ देखा

था। जिसके बारे में जानने की काफी उत्सुकता थी।

करीब एक साल तक इसके आंकड़ों का निरंतर विश्लेषण हुआ

करीब एक साल तक लगातार रोवर द्वारा भेजे गये आंकड़ों पर वैज्ञानिक शोध करते रहे

हैं। इस काम के पूरा होने के बाद ही उस चिपचिपा पदार्थ को इम्पैक्ट मेल्ट ब्रेसिया कहा

गया है। काफी समय तक इसी अवस्था में रहने के बाद वे हरे और चमकीले रंग के हो गये

हैं। इसी वजह से रोवर के कैमरे में वे चमकते हुए जेलीनूमा पदार्थ के तौर पर नजर आये

थे। इसके पहले अपोलो 15 और अपोलो 17 में भी कुछ ऐसे ही नमूने एकत्रित किये गये थे।

उन्हें उस वक्त सैंपर 15466 और सैंपल 70019 का नाम दिया गया था। बाद में वैज्ञानिकों

ने इन्हें ब्रेसिया माना था।

चीन के चेंज 4 चंद्रयान का रोवर चांद के विभिन्न इलाकों का दौरा करते हुए नमूनों की

जांच कर रहा है। इस रोवर में लगा कैमरा अपने नियंत्रण कक्ष को वहां की तस्वीरें भी

भेजता जा रहा है। चांद के दक्षिणी हिस्से में यह जेली जैसा पदार्थ जिस खाई से पाया गया

है उसे वॉन कारमैन क्रेटर कहा जाता है। इस रोवर यान में लगा पैनारोमिक कैमरा इंफ्रा रेड

सुविधाओं से भी लैश है । इसलिए उससे लिये गये चित्रों के आंकड़ों का विश्लेषण भी इंफ्रा

रेड इमेजिंग स्पेक्ट्रोमीटर से किया जाता है। गत वर्ष 17 अगस्त को जब इसे पहली बार

देखा गया था तो वैज्ञानिक भी चांद की कठोर धरती और अत्यंत ठंडे इलाके में ऐसा

चिपचिपा पदार्थ देखकर हैरान हो गये थे। आम तौर पर इतने कड़ाके की ठंड के बीच किसी

पदार्थ के ठोस अवस्था में नहीं होने की कल्पना तक नहीं की जा सकती है। चीन के यान में

जो पौधे और कीड़े भेजे गये थे, वे भी इस ठंड की वजह से मर गये थे। सिर्फ कपास का बीज

ही फूल देने के बाद मुरझा गया था।

तेज टक्कर से पिघल गये थे चांद के पत्थर

अब चिपचिपा पदार्थ को वहां के पत्थर का ही बदला स्वरुप माना गया है, जो प्रचंड गति से

आ टकराने वाले किसी उल्कापिंड की टक्कर की वजह से घर्षण और तेज गर्मी के बीच

ऐसी अवस्था में पहुंचा है। मूल स्वरुप में पत्थर होने की वजह से वह इसी चिपचिपा स्वरुप

में ही बना हुआ है। जो नमूना देखा गया था वह आकार में करीब बीस इंच लंबा और छह

इंच चौड़ा था। वैसे इसे देखकर उल्कापिंड की टक्कर से क्या कुछ रासायनिक प्रतिक्रिया

होती है, उसके बारे में भी वैज्ञानिकों को नई जानकारी मिली है। इसके रासायनिक

विश्लेषण के बाद यह बताया गया है कि यह पिघला हुआ पत्थऱ भी 45 प्रतिशत

प्लैजियोक्लैस, सात प्रतिशत पाइरोजेन और छह प्रतिशत ओलिवाइन से बना हुआ है। यह

सार वैसे खनिज हैं, जो चांद पर सामान्य तौर पर उपलब्ध हैं


 

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
More from HomeMore posts in Home »
More from अजब गजबMore posts in अजब गजब »
More from ताजा समाचारMore posts in ताजा समाचार »
More from प्रोद्योगिकीMore posts in प्रोद्योगिकी »
More from विज्ञानMore posts in विज्ञान »

One Comment

Leave a Reply

error: Content is protected !!