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गोला थाना प्रभारी की सामुदायिक पुलिसिंग की सराहना हो

गोला के थाना प्रभारी धनंजय प्रसाद एक आम थाना प्रभारी ही हैं।

लेकिन वह  उनलोगों में से एक अवश्य हैं जो अपने छोटे छोटे प्रयासों

से समाज को बदलने में अहम भूमिका निभाते हैं। सामुदायिक

पुलिसिंग इनदिनों पूरे भारत में प्रयोग के तौर पर चलाया जा रहा है।

झारखंड के नक्सल प्रभावित इलाकों में इस किस्म की पहल के बेहतर

नतीजे भी निकले हैं। इसी वजह से जो व्यक्ति अपने प्रयास ने बड़ी

लकीर खींच दे, उसकी सराहना होनी चाहिए। जिन कार्यों की वजह से

उन्होंने खास तौर पर मेरे जैसे पत्रकार का ध्यान आकृष्ट किया है,

वह दूसरों की नजर में महत्वपूर्ण नहीं भी हो सकता है। लेकिन अपने

इलाके में पुलिस के मूल कार्यों से अलग हटकर बच्चों को पढ़ाना अपने

आप में एक बड़ी पहल है। इस पहल की कीमत सिर्फ वे बच्चे और

उनके अभिभावक समझ सकते हैं, जिनके पास बेहतर पढ़ाई का

सामर्थ्य नहीं है। क्षेत्र के लोग भी इस योगदान को महत्वपूर्ण मानते हैं।

यह समझ लेना चाहिए कि भारतीय समाज का बहुमत पढ़ा लिखा

हो अथवा अनपढ़ लेकिन क्या कुछ बेहतर है, उसकी पहचान इस

समाज को है। क्षेत्र के लोगों ने भी माना है कि थाना प्रभारी धनंजय

प्रसाद ने क्षेत्र के कई स्कूलों में जाकर छात्रों को विभिन्न विषयों की

शिक्षा दी। वे इस कदर छात्रों को पढ़ाते जैसे कोई पुलिस नहीं बल्कि

एक शिक्षक क्लास ले रहा हो। एसएस प्लस टू हाई स्कूल गोला में

जाकर उन्होने दस वर्ग के छात्रों को इतिहास, गणित, भूगोल और

सामाजिक विज्ञान का शिक्षा अध्ययन कराया। उसी तरह अनुसूचित

जनजाति आवासीय बालिका स्कूल गोला में भी उन्होंने छात्रों को

शिक्षा दी।

गोला में पहली छाप बच्चों को पढ़ाकर छोड़ी

अगर वह बच्चों का इस तरीके से मार्गदर्शन नहीं भी करते तो उनकी

नौकरी पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। लेकिन थाना प्रभारी के पद

पर होने के बाद भी वह व्यक्ति अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को

समझता है, यह अपने आप में बड़ी बात है। इससे जिन्हें फायदा हुआ है

वे आने वाले दिनों में किसी मुकाम पर जब पहुंचेंगे तो गोला थाना

प्रभारी के इस योगदान का असली सफलता साबित होगी। बच्चों को

बढ़ाने और शिक्षा के क्षेत्र में उनका मार्गदर्शन करने के साथ साथ

उन्होंने बिना किसी निर्देश के पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी

अच्छे कार्य किये हैं। बारिश के दिनों में उन्होंने स्कूल परिसर सहित

कई ऐसे स्थानों में उन्होने जरुरत के तहत पौधे लगाए। रकुवा के

स्कूल में छात्रों के बीच भोजन की व्यवस्था भी करायी। ठंड के दिनों में

जरुरतमंद लोगों के बीच कंबल का वितरण किया। कई जागरुकता

कार्यक्रमों में शामिल होकर धनंजय प्रसाद ने महत्वपूर्ण भूमिका

निभायी। शुक्रवार को धनंजय प्रसाद ने क्षेत्र के पतरातू गांव में एक

किसान की भूमिका निभायी। वे खेतों को जोत रहे किसानों के बीच

पहुंचकर खेत में हल चलाया, जिसकी लोगों ने काफी सराहना की।

पतरातू गांव के किसानों ने बताया कि थाना प्रभारी ने सिर्फ दिखावे में

खेत में हल नहीं चलाया बल्कि काफी देर तक खेत की जोताई की।

साथ ही उनका खेत में हल चलाने वाला सोशल मीडिया में शेयर पोस्ट

को काफी लोगों ने पंसद किया। इस संबंध में धनंजय प्रसाद ने कहा कि

ऐसे ही कभी मन करता है, तो ग्रामीणों के पास पहुंच जाता हूं। मैं पहले

अपने खेतों में हल चलाया है।

यह मिट्टी से जुड़ाव है कि हल भी चला लिया

थाना प्रभारी के लिए हल चलाना नौकरी का हिस्सा तो कतई नहीं है।

जाहिर है  कि मौका पाते ही जो हल चलाने में जुट जाए वह निश्चित

तौर पर अपनी मिट्टी से जुड़ाव महसूस करता है। आम तौर पर बेहतर

नौकरी और सुविधाओं के बीच अक्सर ही हम अपनी मिट्टी के जुड़ाव

को त्याग देते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं अपनी जमीन के जुड़ाव को

अनेक लोग याद रखना भी नहीं चाहते। इनके बीच अगर धनंजय

प्रसाद निरंतरता के साथ खुद को जमीन से जुड़ा हुआ महसूस करते

हैं तो यह उनकी सोच और मानसिकता है। समाज में ऐसी मानसिकता

को बढ़ावा मिलना चाहिए। खास तौर पर आम ग्रामीणों के बीच अपने

आदमी को तौर पर जुड़ना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। अक्सर

ही अफसर बने लोग इस जुड़ाव से निरंतर दूर होते चले जाते हैं। इस

प्रतिकूल परिस्थिति और थाना प्रभारी जैसी जिम्मेदारी के बीच भी

अगर कोई यह सारी जिम्मेदारियां निभा पा रहा है तो अंदर से निश्चित

तौर पर वह दूसरी मिट्टी का बना हुआ इंसान है। ऐसे इंसान की समाज

और राष्ट्र निर्माण में इनदिनों कमी है।  इसलिए धनंजय प्रसाद जैसे

गोला थाना प्रभारी के प्रयासों की सराहना होनी चाहिए। इससे उन्हें

कोई वीरता मेडल तो नहीं मिलेगा लेकिन उनके अंदर का इंसान

यह जानकर अवश्य प्रसन्न होगा कि उनके परिश्रम को सामाजिक

मान्यता मिल रही है। भारतीय समाज में ऐसे लोगों की अभी और

जरूरत है। हो सकता है कि एक थाना प्रभारी को देखकर कई अन्य भी

साहसी बनकर इस दिशा में पहल करें।

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