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भाजपा विरोधी खेमाबंदी का अगला बड़ा पड़ाव अब बहुत जल्द




चुनावी चकल्लस

सपा और रालोद में होगा गठबंधन का एलान
मायावती अब भी धीमी रफ्तार में चल रही हैं
कांग्रेस के पास अब भी चुनावी तैयारी कुछ नहीं

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः भाजपा विरोधी खेमाबंदी तो हर तरफ जारी है। इसके बीच ही उत्तरप्रदेश में अब यह धीरे धीरे स्पष्ट होता जा रहा है कि भाजपा विरोधी दल अब कांग्रेस की फिक्र में ठहरे हुए नहीं हैं। सभी ने अपनी अपनी तरफ से मोर्चाबंदी का काम तेज कर दिया है। इसकी खास वजह ममता बनर्जी के वे बयान हैं, जिसमें कांग्रेस के प्रति प्रतिकूल टिप्पणी की गयी है।




उसके बाद से अन्य दलों ने भी यह मान लिया है कि हर फैसले के लिए अब कांग्रेस का इंतजार नहीं करना है। लिहाजा वे अपनी अपनी गाड़ी लेकर निकल पड़े हैं। अब इतने दिनों के बाद बदलते समीकरणों के बीच समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल की संयुक्त रैली होने जा रही है।

सपा नेताओं के अनुसार विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले अखिलेश और जयंत की पहली संयुक्त रैली को लेकर अब दोनों दलों के नेता मिलकर काम कर रहे हैं। लगातार दोनों दलों की बैठक हो रही है। वहीं इस संयुक्त रैली को लेकर सपा के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम आज से मेरठ में डेरा डाल चुके हैं।

उत्तर प्रदेश के मेरठ स्थित सिवालखास विधानसभा क्षेत्र में पड़ने वाले दबथुवा में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और राष्ट्रीय लोकदल के प्रमुख जयंत चौधरी 7 दिसंबर को संयुक्त रैली करने वाले हैं। इस रैली की तैयारियां जोर-शोर से चल रही है।

वैसे दोनों दलों ने अभी तक गठबंधन का औपचारिक ऐलान नहीं किया है और खबर है कि दोनों पार्टियों के बीच आगामी विधानसभा चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे पर मंथन चल रहा है। सूत्रों ने हालांकि बताया कि सीट बंटवारे को लेकर बातचीत बिल्कुल अंतिम दौर में पहुंच चुकी है।

भाजपा विरोधी खेमाबंदी में किसान आंदोलन से ऑक्सीजन

उन्होंने बताया कि अगर आगामी एक-दो दिन में सपा-आरएलडी गठबंधन की घोषणा नहीं हो पाई तो 7 दिसंबर को दबथुआ में ही दोनों बड़े नेता गठबंधन की घोषणा कर सकते हैं। पश्चिम उत्तर प्रदेश के लिए सपा-रालोद की यह रैली काफी अहम समझी जा रही है। इस जुटने वाली भीड़ आगामी विधानसभा के रुख का आईना दिखाने वाली होगी।




ऐसे में दोनों दल जोर-शोर से तैयारियों में जुटे हैं। वहीं भाजपा नेता भी किसान आंदोलन के झटके से खुद को उबारते हुए बिल्कुल आक्रामक हो चुके हैं। पिछले विधानसभा चुनाव के परिणामों पर गौर करें तो उस चुनाव में पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल भाजपा को प्रदेश में अन्य दलों के वोट विभाजन का लाभ मिला था।

पिछले चुनावी आंकड़ों के मुताबिक भाजपा को 39.7, सपा को 21.8, बसपा को 22.2, कांग्रेस को 6.2, आरएलडी को 1.8, एसबीएसपी को 0.7, एडीएएल को 1.0, निर्दलीयों को 2.6 तथा नोटा को 0.9 प्रतिशत वोट मिले थे।

यह चुनाव परिणाम तब आया था जबकि पश्चिमी उत्तरप्रदेश में रालोद को किसानों का विरोध तथा नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से नुकसान उठाना पड़ा था। अब किसान आंदोलन के बाद से बनी परिस्थितियो के बीच बहुत कुछ बदल चुका है।

किसान आंदोलन ने बहुत सारे समीकरण बदल दिये हैं

गंग नहर के इलाकों में अनेक गांव ऐसे हैं, जहां आज भी भाजपा के नेता प्रवेश नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में अगर भाजपा विरोधी वोटों का विभाजन नहीं होता है तो यह जाहिर तौर पर भाजपा के लिए बड़ी परेशानी की बात होगी।

अब सीटों के बंटवारे के पहले समाजपार्टी के नेता अखिलेश यादव भाजपा विरोधी वोटों को समेटने की पहल कर रहे हैं। लेकिन उनकी यह पहल कितनी कामयाब होगी, यह तो सीटों के बंटवार के बाद स्पष्ट हो पायेगा।

यह भी समझने वाली बात है कि कई बार दलों में चुनावी गठबंधन होने के बाद भी दरअसल वोट का ट्रांसफर नहीं होने की वजह से अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाते हैं। बिहार के विधानसभा चुनाव में हम इसकी बानगी देख चुके हैं। ऐसे में भाजपा विरोधी खेमाबंदी अंत अंत तक कहां टिकी रहेगी, इस पर अभी कयास भर लगाये जा सकते हैं।



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