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अंटार्कटिका के सैटेलाइट चित्रों को देखकर वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी

  • एक और विशाल ग्लेशियर टूटने की तरफ अग्रसर

  • पाइन आइसलैंड को लेकर जतायी है चिंता

  • समुद्री जलस्तर करीब आधा मीटर बढ़ेगा

  • इसके गलने से पूरी दुनिया प्रभावित होगी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः अंटार्कटिका के सैटेलाइट चित्र फिर से आसन्न खतरे का संकेत दे रहे हैं। इसके

आधार पर वैज्ञानिकों ने यह चेतावनी दी है कि एक बहुत बड़ा ग्लेशियर और उसकी रक्षा

करने वाला आधार तेजी से गल रहा है। इसके पूरी तरह गल जाने के पहले ही यह सरकता

हुआ समुद्र में आ गिरेगा। इससे कई किस्म की परेशानियां पैदा हो सकती है। इसके बारे में

बताया गया है कि जो आइस शैल्फ यानी ग्लेशियरों का रक्षा कवच भी खतरे में हैं, वह

पाइन द्वीप का है। यह आइस शेल्फ दरअसल किसी बोतल को बंद रखने में इस्तेमाल

होने वाले कॉर्क के जैसा है। जैसे ही यह हटेगा सारा ग्लेशियर अपने आप ही नीचे की तरफ

सरकता जाएगा। नीचे सरकने के दौरान उसकी गति भी तेज हो जाएगी। लिहाजा जब यह

समुद्र में जाकर गिरेगा तो बहुत बड़ी सूनामी की लहर पैदा होगी। सिर्फ सूनामी का खतरा

इसमें नहीं है। इससे समुद्री जलस्तर के बढ़ने के अलावा पर्यावरण संतुलन के बहुत तेजी

से बिगड़ने का खतरा वैज्ञानिकों को अधिक परेशान कर रहा है। अंटार्कटिका पर नजर

रखने वाले सैटेलाइट से मिले चित्रों के अध्ययन और विश्लेषण के बाद यह चेतावनी दी

गयी है। वर्ष 2017 से ही इसके पिघलने की गति औसत से अधिक होने का आंकड़ा दर्ज

किया गया था। अब जैसे जैसे समय बीत रहा है, यह गति और तेज होती जा रही है। इसी

वजह से वहां बड़े बड़े ग्लेशियर के टुकड़े अक्सर ही टूटकर समुद्र में गिरते नजर आ रहे हैं।

वैज्ञानिक मानते हैं कि प्रदूषण की वजह से बने पर्यावरण असंतुलन की वजह से ही ऐसा हो

रहा है। दूसरी तरफ यहां की स्थिति के बिगड़ने की वजह से पूरी पृथ्वी के मौसम का चक्र

भी प्रभावित हो रहा है। समुद्री पानी का तापमान बढ़ने से कई किस्म की परेशानियां पैदा

हो रही हैं।

अंटार्कटिका के सैटेलाइट चित्र ही इस इलाके का खतरा बता रहे हैं

इस पाइन आइलैंड के आइस शैल्फ और ग्लेशियर के बारे में पहले से ही इस बात की

जानकारी है कि यह करीब बीस किलोमीटर तक सरक चुका है। यह सिर्फ तीन वर्षों में हुआ

है। एक यूरोपिय सैटेलाइट हर छह दिन के अंतराल में वहां की तस्वीर लेता रहता है,

जिसके आधार पर वैज्ञानिक स्थिति का आकलन करते रहते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ

वाशिंगटन के विशेषज्ञ इयान जोगिन ने कहा कि देखकर ही साफ हो जाता है कि इसकी

गति खतरनाक ढंग से बढ़ रही है। शायद मूल बर्फ का बीस प्रतिशत से अधिक हिस्सा गल

चुका है। सिर्फ तीन बर्षों में इतना बर्फ गल जाना खतरे की बात है। इस विशाल इलाके में

अब तक तीन बड़े टुकड़े साफ साफ नजर आ रहे हैं। जो टुकड़े टूटे हुए दिख रहे हैं, वे 36

किलोमीटर चौडे और 8 किलोमीटर से अधिक लंबे हैं। इनके भीतर भी अनेक छोटे छोटे

टुकड़े बन गये हैं। जो बर्फ पूरी तरह एक रहता था, उसमें भी जगह जगह पर गड्डे नजर

आने लगे हैं। यही स्थिति अगर कायम रही तो अगले कुछ वर्षों में यह पूरा बर्फीला इलाका

ही पिघलने की वजह से सरकता हुआ तेजी से समुद्र में जा गिरेगा। यह पूरा इलाका अपने

आप में किसी छोटे देश के भौगोलिक आकार से बड़ा है। इसी वजह से 12 प्रतिशत तेज

गति से उसका सरकना बड़े खतरे के संकेत है। अंटार्कटिका के पश्चिमी छोर पर स्थित यह

इलाका अगर टूट गया तो आस पास के दूसरे इलाके भी इसके प्रभाव में आयेगे। ऐसा भी हो

सकता है कि इसके झटके की वजह से आस पास के दूसरे ग्लेशियर भी टूटकर समुद्र में

आने लगे। वैसी स्थिति में तबाही आने से कोई रोक नहीं पायेगा।

समुद्री जल स्तर कमसे कम आधा मीटर ऊपर उठ जाएगा

ऐसा माना जा रहा है कि यह गड़बड़ी सिर्फ अधिक प्रदूषण की वजह से ही है। जिस कारण

कार्बन उत्सर्जन को कम करने की लगातार अपील वैज्ञानिकों द्वारा की जा रही है। अकेले

पाइंस लैंड का यह इलाका अगर समुद्र में आ गिरा तो समुद्री जलस्तर में करीब आधा

मीटर की बढ़ोत्तरी हो जाएगी क्योंकि इसमें करीब 180 ट्रिलियन टन बर्फ एकत्रित है।

समुद्री जलस्तर के इतना बढ़ने का अर्थ है कि पृथ्वी के अनेक इलाके समुद्री जलस्तर की

चपेट में आयेंगे। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया की वैज्ञानिक इसाबेला वेलीकोग्ना कहती

है कि इसी वजह से पाइन आइसलैंड और थवाइट्स वैज्ञानिकों की चिंता का विषय बना

हुआ है क्योंकि इससे पूरी पृथ्वी का प्रभावित होना तय है। कोई भी समझ सकता है कि

अगर समुद्री जलस्तर अचानक आधा मीटर बढ़ जाए तो पूरी पृथ्वी के उन इलाकों का क्या

होगा, जो समुद्री तट पर बसे हैं।

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