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अंटार्कटिका में सवा लाख साल पहले भी गल गया था बर्फ




  • इससे भारत के तीन महानगर डूब जाएंगे

  • वैज्ञानिकों ने खोजे प्राचीन तथ्य और प्रमाण

  • बर्फ की गहराई में मौजूद हैं प्राचीन धूलकण

  • तूफान जैसी स्थिति अनेक वर्षों तक रही है

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः अंटार्कटिका में बर्फ गलने की तेजी से दुनिया पर मंडराते खतरे

को लेकर वैज्ञानिक चिंतित हैं। यह तय है कि वहां बर्फ गलने से समुद्र का

जलस्तर बढ़ने से दुनिया के अनेक बड़े शहर पानी के अंदर चले जाएंगे।

इसकी आशंका वैज्ञानिकों ने काफी पहले ही व्यक्त कर दी है। इस क्रम में

यह भी बताया गया है कि इस प्रक्रिया के प्रारंभ होने की स्थिति में भारत

के तीन महानगर, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता इसकी चपेट में आयेंगे।

इसके अलावा भी समुद्र के तट पर बसे अनेक इलाके समुद्र में समा जाएंगे।

भारत के तीन शहरों का डूब जाना लगभग तय है

अब वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधान से यह पाया है कि ऐसी घटना कोई पहली

बार नहीं होगी। वैज्ञानिक तथ्य इस बात की तरफ इशारा कर रहे हैं कि अभी

से करीब एक लाख 29 हजार वर्ष पहले भी ऐसी घटना घटित हो चुकी है।

ऑस्ट्रेलिया के बॉयोडाइवर्सिटी एंड हेरिटेज साइंस एंड क्लाइमेट संस्था के

अलावा कई अन्य संगठनों ने मिलकर इसके आंकड़ों को एकत्रित किया है।

इनमें कीलि विश्वविद्यालय, यूएनएसडब्ल्यू, और आर्क डेक्रा जैसे संगठन हैं।

इनलोगों ने तापमान के लगातार बढ़ने के खतरों पर अनेक आयामों को

आंकड़े एकत्रित करने के बाद उनका विश्लेषण किया है। वर्तमान में यह बात

जगजाहिर है कि पृथ्वी का तापमान बढ़ने की वजह से पृथ्वी के विभिन्न

इलाकों में जमे बर्फखंड और ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इनमें भारत का

हिमालय का इलाका भी है। अंटार्कटिका के बर्फ के पिघलने की गति बहुत तेज

होते जाने की वजह से वहां से ढेर सारा बर्फ अब पानी बनकर समुद्र में पहुंच

रहा है। समुद्र के अंदर से भी खास उपकरणों से यह देखा जा चुका है कि जो

विशाल हिमखंड ऊपर से नजर आ रहे हैं, वे भी अंदर से तेजी से खोखला होते

जा रहे हैं। इस कारण कभी भी ऐसे विशाल बर्फखंडों के टूटकर समुद्र में पूरी

तरह समा जाने की घटना प्रारंभ हो सकती है।

अंटार्कटिका का बर्फ पिघलने से बढ़ेगा समुद्री जलस्तर

वैज्ञानिक अनुमान के मुताबिक इतना सारा बर्फ अगर पिघलकर पानी बन

गया तो यह सारा पानी अंततः समुद्र में ही जाएगा। इससे समुद्र का जल

स्तर जब ऊपर उठेगा तो समुद्र के किनारे बसे इलाके समुद्र के भीतर चले

जाएंगे। इसी क्रम में यह तथ्य सामने आया है कि अंटार्कटिका में ऐसी

घटना पहले भी घटित हो चुकी है।

अंटार्कटिका में मौजूद साक्ष्यों के आधार पर वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे

हैं कि वहां एक लाख 29 हजार वर्ष पहले भी बर्फ पिघलने की घटना घट चुकी

है। इस कारण वैज्ञानिकों का अनुमान है कि उस दौरान शायद अंटार्कटिका

का तापमान और भी ज्यादा गर्म हो गया था। उस वक्त समुद्र भी वर्तमान

खतरे की सीमा से दो डिग्री ज्यादा गर्म होने के भी साक्ष्य वैज्ञानिकों को मिले

हैं। बर्फ पिघलने की घटना की पुष्टि पश्चिमी अंटार्कटिका के इलाके में होने के

बारे में वैज्ञानिक किसी ठोस नतीजे पर पहुंचे हैं। अनुमान है कि उस दौरान

समुद्र का जलस्तर भी करीब तीन मीटर अचानक ही ऊंचा उठ गया था। इससे

पृथ्वी के अनेक इलाके समुद्र के अंदर चले गये थे। आज भी समुद्र की गहराई

में इसके प्रमाण यदा कदा मिलते रहते हैं।

बर्फ की गहराई में मौजूद है प्राचीन घटना के साक्ष्य

इस बात को विज्ञान सम्मत तरीके से जांचने के लिए वैज्ञानिकों ने गहराई के

बर्फ की खुदाई भी की थी। काफी गहराई में और काफी समय से जमी हुई

अवस्था में जो बर्फ होती है, उसे ब्लू आइस के नाम से जाना जाता है। ड्रील की

मदद से इसके अंदर के नमूनों का विश्लेषण किया गया। इसी विश्लेषण से

यह बात सामने आयी है कि वहां भी ऐसे धूलकण मौजूद हैं तो काटाविक विंड

कहलाते हैं। अत्यंत तेज गति की आंधी के दौरान ऐसे धूलकणों की रचना

होना और उनका विशाल बर्फ के नीचे दबा होना इस बात के प्रमाण हैं कि इस

इलाके में बर्फ गलने के बाद धूल की आंधी चल रही थी। जिसकी वजह से

धूलकण यहां पड़े हुए हैं। काफी तेज गति से हवा चलने के दौरान बर्फ का

ऊपरी छोर भी उड़ने लगता है। इसके भी वैज्ञानिक प्रमाण वहां मिले हैं।

बर्फ के विशाल पहाड़ों की तलहटी पर हुए शोध से भी वैज्ञानिकों ने अपने इस

अनुमान की पुष्टि की है। जिसके आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है कि

बर्फ पिघलने की यह घटना एक लाख 29 हजार वर्ष से लेक कुछ और पहले

तक की होती सकती है। शायद उस दौरान यह प्रक्रिया लगातार काफी वर्षों

तक चलती रही थी।

वहां आंधी चली थी तो वर्षों तक चलती ही रही थी

प्राचीन बर्फ खंडों में मौजूद सुक्ष्म जीवन का भी वैज्ञानिकों ने परीक्षण किया

है। इसके आधार पर वे इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि वहां मौजूद सुक्ष्म जीवन में

भी मिथेन की खपत करने वाले बैक्टेरिया मौजूद हैं। शायद बर्फ के अंदर

मौजूद मिथेन की वजह से भी अब बर्फ पिघलने की गति तेज हो रही है। वैसे

बाहर में भी प्रदूषण तथा अन्य कारणों से पृथ्वी का तापमान बढ़ने की

जानकारी पहले से ही सभी की जानकारी में है।

वैज्ञानिक मानते हैं कि इस इलाके का तापमान अगर और दो डिग्री ज्यादा

हुआ तो जो बर्फ पिघलकर समुद्र में जायेगा उससे समुद्र के जलस्तर में 3.8

मीटर तक की बढ़ोत्तरी हो सकती है। दुनिया के सभी समुद्रों का जलस्तर

अगर उतना ऊंचा उठ गया तो समुद्र के पानी का विस्तार जमीन पर कितनी

दूरी तक होगा, इसे समझ पाना कठिन नहीं है



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