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प्राचीन चिकित्सा पद्धति में कोरोना से लड़ने के तरीकों की तलाश

  • कोविड 19 से लड़ने के हथियार की तलाश

  • चीन ने बार बार किया है इसके फायदे का दावा

  • भारत में यह विधि काफी समय से प्रचलित भी रही है

  • आर्युवेद के रास्ते भी स्थायी उपचार ढूंढ़ रहे हैं वैज्ञानिक

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः प्राचीन चिकित्सा पद्धति द्वारा सुझाये गये उपायों के रास्ते भी कोविड 19 से

लड़ने का हथियार तलाशा जा रहा है। वुहान शहर में इस वायरस का प्रकोप होने के बाद

चीन ने अपनी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को भी आजमाया था। जिसके बारे में चीन का

कहना है कि इससे उसे लाभ मिला है। लेकिन वहां अनेक लोग ऐसे भी हैं, जो चीन के इस

दावे को पूरी तरह गलत बताते हैं। लेकिन चीन की इन कोशिशों के बीच ही कोरोना

संक्रमण के रोगियों की दशा और लक्षणों के आधार पर भारत में भी आर्युर्वेद में इसके

ईलाज का स्थायी रास्ता तलाशने का काम तेज हो चुका है। कुछ स्थानों पर इसके बेहतर

परिणाम भी निकले हैं, ऐसा दावा किया गया है।

वुहान शहर को आज 73 दिनों के बाद लॉक डाउन से मुक्त किये जाने के बाद वहां से यह

सूचनाएं बाहर आ रही हैं कि पीड़ितों को पारंपरिक जड़ी-बूटियों से तैयार काढ़ा भी नियमित

तौर पर पीने को दिया गया था। इससे लाभ होने का दावा किया गया है। इसके पीछे की

सोच यही है कि इन पारंपरिक जड़ी-बूटियों से शरीर की आंतरिक प्रतिरोध शक्तियों का

कई तरीके से विकास हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि कोरोना वायरस का संक्रमण इन

प्रतिरोधक शक्तियों की वजह से आगे नहीं बढ़ पाया। जहां संक्रमण हुआ था वहां दवा दिये

जाने की वजह से विषाणु अपनी मारक क्षमता खो बैठे। लेकिन इसी चीन में इस सोच का

विरोध करने वाले भी मौजूद हैं, जिनका मानना है कि इस काढ़ा से कुछ नहीं हुआ है सिर्फ

दवा से ही लोग ठीक हुए हैं। लेकिन इन आलोचनाओं के बाद भी चीन की सरकार अपनी

पारंपरिक चिकित्सा पद्धति से कोरोना जैसी बीमारी को ठीक करने के अनुसंधान को आगे

बढ़ा रही है।

प्राचीन चिकित्सा पद्धति पर वैज्ञानिक जगत को संदेह

इसी किस्म की पारंपरिक जड़ी-बूटी के इस्तेमाल में भारत का भी नाम आता है। यहां

प्राचीन काल से आर्युर्वेद के ईलाज की पद्धति एक स्थापित चिकित्सा पद्धति है। भारत में

इसी तरह यूनानी सहित कई अन्य प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियां कम ही सही लेकिन

हमेशा से इस्तेमाल में रही हैं। अब भारत के केरल राज्य में भी सबसे अधिक इस पर काम

हो रहा है। केरल की सरकार संक्रमण से बचाव के लिए आर्युर्वेदिक और होम्योपैथिक

चिकित्सा पर भी काम कर रही है। खुद मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने कहा है कि शीघ्र ही

सरकारी स्तर पर इस फैसले की घोषणा भी कर दी जाएगी। केरल में कुछ खास किस्म के

कोरोना संक्रमण पर यह पद्धति आजमान की सोच पर काम हो रहा है। इस आर्युर्वैदिक

पद्धति में आर्युवेद, सिद्धा, यूनानी और नेचुरोपैथी शामिल है। वर्तमान मं आर्युर्वेद से

कोरोना के मरीजों के ईलाज पर प्रतिबंध है। इसलिए सिर्फ प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने तथा

अन्य अंगों पर पड़ने वाले प्रभावों को समाप्त करने के लिए ही आर्युर्वैदिक चिकित्सा का

इस्तेमाल हो रहा है।

प्रसिद्ध जैक मा फाउंडेशन ने तैयार की है रिपोर्ट

उधर चीन से मिली सूचनाओं के मुताबिक जैक मा फाउंडेशन ने इस बारे में एक रिपोर्ट

तैयार की है। इसमें प्रचलित चीनी प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों से हुए लाभ का उल्लेख

किया गया है। रिपोर्ट में मरीजों का किस तरीके से ईलाज हुआ और उन्हें क्या फायदा हुआ,

इसका विवरण दर्ज है। कई किस्म की एलोपैथिक दवाइयों के इस्तेमाल से शरीर के अंदर

होने वाले अन्य परिणामों का भी उल्लेख किया गया है। जिनके कुपरिणाम भी पारंपरिक

चिकित्सा पद्धति से कम किये जा सके हैं। खासकर कोई मान्यता प्राप्त दवा नहीं होने से

कई दवाइयों के मिश्रण से भी कोरोना के मरीजों का ईलाज किया जा रहा है। इससे मरीज

के शरीर पर दवाइयों का खराब असर भी दिख रहा है। चीनी के सरकार की तरफ से इसी

वजह से एलोपैथिक चिकित्सा के साथ साथ पारंपरिक दवाइयों से साइड एफेक्ट को

समाप्त करने की पहल की बार बार सिफारिश की जी रही है।

वैसे अब तक पूरी दुनिया में इस वायरस को मारने के लिए कोई सर्वमान्य दवा नहीं बनने

की वजह से हर संभव ईलाज के तौर तरीकों पर काम चल रहा है। आर्युर्वैद और होम्योपैथी

की अधिकांश दवाइयों का कोई साइड एफेक्ट नहीं होने की वजह से भारत में भी उन्हें घरेलू

चिकित्सा के दौरान इस्तेमाल किया जाता रहा है। अब घरेलू नुस्खों को आजमाकर

कोरोना वायरस नहीं तो शरीर के अंदर की व्यवस्था को और मजबूत बनाने की बात हो रही

है। वैसे भी हाल के दिनों में यह प्राकृतिक चिकित्सा काफी लोकप्रिय हुई है। अकेले केरल में

ही अनेक विदेशी पर्यटक अब इसी ईलाज के लिए वहां आने लगे हैं।


 

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