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फॉसिल्स पर शोध से पता चला प्राचीन शार्क पचास फीट लंबा होता था

  • नये अध्ययन से इसकी जानकारी मिली

  • गर्भावस्था में ही अपने सहदरों को खा लेते थे

  • जन्म के वक्त ही आकार करीब छह फीट होता था

  • दांतों और रीढ़ के आकार से विशालकाय होने का पता चला

राष्ट्रीय खबर

रांचीः फॉसिल्स पर वैज्ञानिक लगातार शोध कर रहे हैं। विभिन्न स्थानों से मिल रहे

प्राचीन और विलुप्त हो चुके जीवों के बारे में इस किस्म के शोध से नई नई जानकारियां

मिल रही हैं। इसी क्रम में पहली बार शार्कों के बारे में भी अजीब जानकारी मिली है। यह

पाया गया है कि अब विलुप्त हो चुके एक प्रजाति के शार्क आकार में करीब पचास फीट

लंबे होते थे और उनका वजन करीब एक लाख पौंड से भी अधिक होता था। वह पैदा होते

वक्त ही छह फीट के हुआ करते थे। अति प्राचीन काल के समुद्र में इस प्रजाति का शायद

राज हुआ करता था। जो अवशेष मिले हैं, उससे यह भी जानकारी मिली है कि उनके पंख,

जिन्हें फिन कहते हैं, वे भी काफी मजबूत हुआ करते थे। ब्रिटेन के स्वांसी विश्वविद्यालय

के शोधकर्ता जैक कूपर कहते हैं कि इस प्रजाति का शार्क शायद समुद्र में कहीं भी चला

जाता था और जो मन होता था, उसका शिकार कर लेता था। शायद गर्भ में होने के दौरान

ही उनमें मांस भक्षण के गुण विकसित हो जाते थे। प्राचीन काल के फॉसिल्स पर हुए

अनुसंधान से अब तक ऐसे ही नतीजे सामने आये हैं, जो उस प्राचीन काल के शायद सबसे

आक्रामक समुद्री जीव के इन गुणों का खुलासा कर रहे हैं। वैसे गर्भ में ही मांसाहार का

अभ्यास वर्तमान में मौजूद कई समुद्री शार्कों में अब भी पाया जाता है। इसी विशेषता की

वजह से ऐसे शार्क पैदा होते ही शिकार करने में जुट जाया करते हैं। शोध के आधार पर

वैज्ञानिक मानते हैं कि शायद यही वह प्रजाति हैं, जिसके बच्चे पैदा होते वक्त आकार में

सबसे बड़े और भारी हुआ करते थे। इस बार में कल यानी रविवार को प्रकाशित एक

वैज्ञानिक शोध प्रबंध में जानकारी दी गयी है।

फॉसिल्स पर शोध के आंकड़ों का विश्लेषण जारी है

इस दिशा में शोध करने वाले शिकागो के डीपॉल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक केनशू

शिमाडा कहते हैं कि अब तक आंकड़ों और जानकारी से यह कहा जा सकता है कि

मेगालोडोंस प्रजाति के शार्क के बच्चे ही आकार में सबसे बड़े होते थे। दरअसल शार्क की

यह प्रजाति काफी पहले ही पृथ्वी के समुद्रों से विलुप्त हो गयी थी। लिहाजा उनके बारे में

अब तक ज्यादा कुछ जानकारी नहीं मिल पायी थी। खोज के दौरान विभिन्न स्थानों से

मिल रहे फॉसिल्स के आधार पर अब वैज्ञानिकों का ध्यान प्राचीन पृथ्वी के इस जीव पर

गया है और नई नई जानकारियां सामने आ रही हैं। अब तक का अध्ययन यही बताता है

कि पृथ्वी पर मौजूद रहने वाला यह प्राणी शायद तीन मिलियन वर्ष पहले ही पूरी तरह

विलुप्त हो चुका था। जो कुछ अनुमान लगाया गया है वह उनके दांत के आकार और रीढ़

की लंबाई के आधार पर है। यह स्थापित वैज्ञानिक सत्य है कि जितना बड़े दांत होंगे, प्राणी

का आकार भी उतना ही बड़ा होगा। बेल्जियम के पत्थरों के बीच से वर्ष 1860 में मिले

फॉसिल्स से यह माना गया है कि शार्क की उम्र कम थी लेकिन वह आकार में करीब तीस

फीट लंबा था। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इस प्रजाति के शार्क करीब एक सौ वर्षों तक

जीवित रहा करते थे। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि माता के गर्भ में होने के दौरान ही वहां

मौजूद अन्य कमजोर बच्चों और अपनी ही प्रजाति के अन्य अंडों को भी वे अपना शिकार

बना लेते थे। इसी वजह से गर्भ से बाहर आने के तुरंत बाद शिकार में जुट जाना उनके

प्राकृतिक अभ्यास में शामिल होता था।

जो जितना खायेगा उतना बड़ा होगा यही नियम था उस काल का

हमबोल्ट विश्वविद्यालय के शोधकर्ता एलिसन ब्रॉनसन कहते हैं कि खुद को आकार में

बड़ा करने का गुण उन्हें पता था। जो जितना ज्यादा पौष्टिक भोजन करेगा, वह उतनी

तेजी से विकसित होगा, यह इस प्रजाति के शार्क में प्राकृतिक तौर पर मौजूद होता था।

खुद को बड़ा करने की चाहत की वजह से भी वे आक्रामक शिकारी होते थे। वैसे उनके

सबसे करीबी जिंदा रिश्तेदारों में व्हाइट शार्क को माना गया है क्योंकि दोनों की शारीरिक

संरचना में काफी कुछ समानताएं हैं। लेकिन जल के जीवन में मौजूद विविधताओँ की

वजह से वैज्ञानिक मानते हैं कि अभी इसमें और शोध करने की जरूरत है। वर्तमान में भी

एक ही स्थान पर रहने वाले एक ही प्रजाति की मछलियों का शारीरिक विकास भी अलग

अलग होता है। इसलिए इस पर अभी यकीनी तौर पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा

सकता है। वे मानते हैं कि माता के गर्भ में जिस इलाके में ऐसे गर्भस्थ शिशु शार्क तैरा

करते थे, वह भी आकार में काफी बड़ा होता होगा क्योंकि मादा के गर्भ के अंडों का आकार

भी किसी बड़े गेंद के आकार का होता था। लेकिन वे पृथ्वी से गायब क्यों हो गये, इस बारे

में अब तक कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकल पाया है।

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