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प्राचीन काल के गुबरैले कीड़ा के सुरक्षित फॉसिल से अतिरिक्त सूचना मिली

  • कीट पतंगों की रोशनी फैलाने पर नई जानकारी मिली

  • म्यांमार के जंगलों में मिला था यह फॉसिल

  • पारदर्शी गोंद के बीच पूरी तरह सुरक्षित था

  • पेट के नीचे अलग से ग्रंथी पायी गयी थी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः प्राचीन काल के एक गुबरैले कीड़ा की संरचना का अध्ययन करते हुए वैज्ञानिकों ने

कुछ अजीब सा पाया था। इसी वजह से जब उसकी गहराई से जांच हुई तो यह पता चला

कि कई किस्म के कीट पतंग आखिर रात के अंधेरे में रोशनी कैसे पैदा करते हैं। हम अपने

यहां के खेत खलिहानों अथवा जंगलों जुगनुओं को इसी तरह की रोशनी बिखेरते हुए देख

रोमांचित होते हैं। कई किस्म की मछलियों के पास भी इस किस्म की क्षमता होती है। इस

रोशनी का एक नही कई किस्म का प्रयोग भी होता है, जो प्रकृति द्वारा निर्धारित है। यानी

हर कीड़ा को यह गुण प्राप्त नहीं हैं और जिन्हें यह गुण हासिल हैं, उनके लिए भी यह

रोशनी खास काम करने के लिए इस्तेमाल होती है।

अति प्राचीन एक गुबरैले कीड़ा के अध्ययन से इसके बारे में पता चला है। अनुमान है कि

जिस गुबरैले की फॉसिल पायी गयी है, वह करीब 99 लाख वर्ष पुराना है। इस दौर में भी

अगर किसी प्राणी में यह गुण मौजूद था तो यह निश्चित तौर पर क्रमिक विकास की दिशा

में एक महत्वपूर्ण तथ्य है।

पड़ोसी देश म्यांमार के जंगलों में खुदाई करते हुए चीन के वैज्ञानिकों ने इसे खोज निकाला

है। यह चमकीले और पारदर्शी गोंद के बीच होने की वजह से इतना पुराना होने के बाद भी

पूरी तरह सुरक्षित था। बीजिंग के नानजिंग इंस्टिट्यूट ऑफ जिओलॉजी एंड

पैलिओनटोलॉजी के वैज्ञानिक चेनयांग काई ने इसके बारे में जानकारी दी है। इस

जानकारी को अब रॉयल सोसायटी जर्नल में भी प्रकाशित किया गया है। जिस गुबरैले पर

यह शोध हुआ है उसके वैज्ञानिक तौर पर क्रेटोफेंगानोड्स कहा जाता है। उत्तरी म्यांमार में

पायी गयी इस फॉसिल के अध्ययन के दौरान यह संकेत मिले हैं कि प्राचीन काल में इन

इलाकों में इस प्रजाति की बहुतायत रही थी।

प्राचीन काल के  कीट पर जब शोध हुआ तो अंग नजर आये

जब उसका नजदीक से अध्ययन किया गया तो यह पाया गया कि उसके सर से 12 एंटैना

जैसे अंश निकले हुए हैं। लेकिन उसकी पेट के नीचे का अंग वैज्ञानिकों को कुछ अजीब सा

लगा। जब शोध हुआ तो पता चला कि पेट के नीचे के इसी भाग से यह गुबरैला रोशनी पैदा

किया करता था। आज भी अनेक प्रजातियां और खास तौर पर हमे नजर आने वाली जुगनू

भी रोशनी बिखेरते हुए नजर आते हैं। रोशनी फैलाने की यह क्षमता दरअसल बचाव की

एक प्राकृतिक तकनीक है। अपने से बड़े कीटों अथवा जानवरों से खुद को भोजन बनने से

बचाने के लिए इस रोशनी का इस्तेमाल होता है। दूसरी तरफ इसी रोशनी से अपनी

वंशवृद्धि के क्रम को भी आगे बढ़ाने में मदद मिलती है क्योंकि रोशनी को देखकर ही उनकी

प्रजाति का विपरीत लिंगी कीट उनकी तरफ आकर्षित होता है। आज के दौर के कीट,

जिन्हें फायर फ्लाई कहा जाता है बहुतायत में हैं। वे भी अपने शरीर के अंदर एक

रासायनिक प्रक्रिया के जरिए यह रोशनी पैदा करते हैं। दरअसल यह पाया गया है कि

शरीर में मौजूद एक एंजाइम का जब ऑक्सीजन के साथ संपर्क होता है तो यह रोशनी पैदा

होती है।

इस रोशनी का दोहरा प्रयोग कर सकते हैं कीट पतंग

रोशनी देखकर बड़े आकार के कीट पतंग उससे दूर हट जाते हैं जबकि अपनी ही प्रजाति के

लोग रोशनी की पहचान कर पाने की प्राकृतिक क्षमता रखते हैं। यानी यह रोशनी दो तरफा

काम कर सकती है। इस शोध से जुड़े एक अन्य शोधकर्ता एरिक टिहलका यूनिवर्सिटी

ऑफ ब्रिस्टल के स्कूल ऑफ अर्थ साइंस से जुड़े हुए हैं। वह कहते हैं कि इस पर अभी और

शोध करने की जरूरत है ताकि उस दौर में क्रमिक विकास में रोशनी फैलाने वाले इन जीवों

का अलग अलग विकास कैसे हुआ, इसका पता लगाया जा सके। यह चूंकि डायनासोर

काल की घटना है इसलिए प्राचीन पृथ्वी में जीवन के क्रमिक विकास को बेहतर तरीके से

समझने के लिए इस पर अधिक अध्ययन की आवश्यकता है

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