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अमित शाह को अधिक चिंता अब लालू प्रसाद की रणनीति से होगी




  • बिस्तर पर पड़े पड़े भी शिकार करना चाहते हैं राजद सुप्रीमो

  • बिहार की राजनीति पलटी तो बहुत कुछ बदल जाएगा

  • कई कारणों से पिछड़ों के सबसे बड़े नेता है लालू

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः अमित शाह को चुनावी शोरगुल के बीच अगर कोई चिंता सता रही होगी तो वह

लालू प्रसाद का जमानत पर जेल से बाहर आ जाना है। सामान्य राजनीतिक समझदारी तो

यही कहती है कि लालू प्रसाद अपने बाहर आने के बाद तबियत का ख्याल रखते हुए ही

सबस पहले बिहार की राजनीति में कुछ गुल खिलाना चाहेंगे। वैसे भी लालू प्रसाद की यह

विशेषता है कि उनकी राजनीतिक सक्रियता के लिए लगातार उन्हें जनता के बीच सक्रिय

भी नहीं रहना पड़ता है। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हिंदी पट्टी में

पिछड़ों के सबसे दबंग नेता के तौर पर उनका नाम आता है। दूसरी तरफ यह भी जग

जाहिर है कि अमित शाह और लालू प्रसाद के बीच राजनीतिक ही नहीं व्यक्तिगत तौर पर

भी 36 का रिश्ता है। अमित शाह को लालू की कितनी चिंता सताती है यह तो लालू प्रसाद

के जेल और अस्पताल में होने के दौरान भी स्पष्ट हो चुका है। भाजपा समर्थक

अधिकारियों और कर्मचारियों की एक टोली लगातार इस काम में लगी रहती थी कि वे यह

पता करें कि लालू प्रसाद से मिलने कौन कौन आया और लालू प्रसाद किन लोगों के संपर्क

में हैं। जाहिर है कि अब अपनी पुत्री के घर पर होने के दौरान यह जासूसी संभव नहीं होगी।

अलबत्ता यह भी तय है कि जहां लालू प्रसाद हैं, वहां सफेद पोशाक में दिल्ली पुलिस

अथवा आईबी के लोग अवश्य ही तैनात होंगे। लेकिन इन लोगों की तैनाती से लालू प्रसाद

की राजनीति के बाधित होने की कोई संभावना भी नहीं है।

अमित शाह को लालू के हर चाल को समझते रहना होगा

इस बात को समझ लें कि अपनी राजनीतिक चाल के पहले दौर में अगर लालू प्रसाद बिहार

की राजनीति में कुछ उथल पुथल करने में सफल हो जाते हैं तो यह लहर धीरे धीरे हिंदी

भाषी अन्य प्रदेशों तक फैल जाएगी। दूसरी तरफ इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि

कांग्रेस और ममता के साथ साथ अन्य भाजपा विरोधी दलों को एक दूसरे से जोड़कर

चलने में भी लालू प्रसाद और शरद पवार का कद सबसे बड़ा है। दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी

और अमित शाह भी पिछड़ा वर्ग से आने के बाद भी पिछड़ों की राजनीति में अब भी लालू

प्रसाद के जैसा समर्थन हासिल नहीं कर पाये हैं। लिहाजा अगर बिहार की राजनीति में

उलटफेर होता है तो नये सिरे से भाजपा के अमित शाह विरोधी खेमा को भी लालू प्रसाद

हवा देने से परहेज नहीं करेंगे।

अमित शाह और लालू प्रसाद के बीच की व्यक्तिगत रंजिश के बीच चारा घोटाला और

गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना का जिक्र भी प्रासंगिक है। राकेश

अस्थाना के सीबीआई डीआईजी होने के दौरान से ही लालू प्रसाद के साथ उनके रिश्ते

बिगड़े थे। लिहाजा अमित शाह के आस पास के लोगों को ठिकाने लगाने के काम भी ऐसे

अधिकारी भी लालू के निशाने पर आयेंगे, जो किसी न किसी वजह से राजद सुप्रीमो लालू

प्रसाद के आंख की किरकिरी बने बैठे हैं।

चुनावी शोरगुल के बीच भले ही लोगों का ध्यान इस ओर नहीं जा रहा हो लेकिन राजनीति

के धाकड़ खिलाड़ी लालू प्रसाद शांत पड़े रहेंगे तब भी उनकी प्राथमिकता बिहार की

राजनीति में धमाका करने की होगी। यह धमाका अगर हुआ तो उसके बाद राजनीति के

अन्य पांसे भी जल्द जल्द फेंके जाने लगेंगे।



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