अमेरिकी वैज्ञानिकों ने खोजा मोतियाबिंद का नया ईलाज

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  • अब आई ड्रॉप से घुल जाएगी मोतियाबिंद की झिल्ली

  • इंसानों पर क्लीनिकल ट्रायल अभी  बाकी

  • प्राकृतिक स्टेरॉयड आधारित है यह दवा

  • खरगोश और कुत्तों पर हो चुका सफल प्रयोग

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः अमेरिकी वैज्ञानिकों ने आंख के ईलाज के क्षेत्र में बड़ी तरक्की हासिल की है।

इनलोगों ने एक ऐसा आई ड्रॉप बनाया है, जो आंख के अंदर मोतियाबिंद की परत को खुद ही घुला देगी।

वर्तमान में इंसान के अधिकांश आंख इसी मोतियाबिंद की बीमारी से ग्रस्त होते हैं।

कई किस्म की शल्यक्रिया से इस मोतियाबिंद की पर्त को आंख के अंदर से हटाने के बाद ही इंसान फिर से सही तरीके से देख पाता है।

वरना मोतियाबिंद होने की वजह से इंसान की दृष्टिशक्ति क्षीण हो जाती है।

यह एक उम्रजनित बीमारी भी है।

इसलिए अब इस दवा के होने से अनेक लोगों को घर बैठे ही मोतियाबिंद की बीमारी से छुटकारा मिल सकता है।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की एक टीम ने निरंतर अनुसंधान के बाद इस आई ड्रॉप को तैयार करने का दावा किया है।

इंसानों पर इसका परीक्षण होना अभी बाकी

वैसे इसके तैयार होने के बाद भी अभी तक इंसानी आंखों पर इसका परीक्षण नहीं किया जा सका है।

इस नई खोज के क्लीनिकल ट्रायल यानी चिकित्सीय परीक्षण की तैयारियां चल रही हैं।

इन परीक्षणों की रिपोर्ट के आधार पर ही दवा को आगे इंसानों के लिए विकसित करने का काम जोर पकड़ सकता है।

वर्तमान में दुनिया के करोड़ों लोग मोतियाबिंद से हर साल परेशान होते हैं।

वर्तमान में इसके लिए शल्य चिकित्सा करानी पड़ती है।

इनमें से कुछ शल्यक्रिया महंगी और कष्टदायक भी होती हैं।

वैज्ञानिकों ने दुनिया की इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए अपनी शोध को आगे बढ़ाया था।

मोतियाबिंद होने के बाद आंख की पुतली के सामने एक पर्दा पड़ जाता है।

इसकी वजह से इंसान सही तरीके से देख नहीं पाता है।

कई  बार यह मोतियाबिंद कठिन परिस्थिति भी पैदा कर देता है।

दरअसल एक खास किस्म के प्रोटिन के आंख की पुतली के आगे जमा होने की वजह से यह झिल्ली बनती है, जिसे हम मोतियाबिंद कहते हैं।

ऑपरेशन के जरिए इसी प्रोटिन की परत को हटा देने पर इंसान की नजर साफ हो जाती है।

सामने से सफेद नजर आने वाली यह झिल्ली कई बार काला भी नजर आती है।

लेकिन दरअसल वैज्ञानिक परीक्षण में यह पाया गया है कि दरअसल प्रोटिन की यह पर्त हल्के दुधिया नीला अथवा भूरे रंग का होता है।

मोतियाबिंद की एक खास बात यह भी है कि यह एक आंख में होने पर दूसरे को प्रभावित नहीं करती

लेकिन एक आंख से मोतियाबिंद हटाने के बाद फिर से दूसरे आंख में हो सकती है।

इनमें से अधिकांश उम्रजनित बीमारी के लक्षण हैं।

अमेरिकी राष्ट्रीय नेत्र संस्थान ने दी है रिपोर्ट

अमेरिका के राष्ट्रीय नेत्र इंस्टिट्यूट ने यह रिपोर्ट दी है

वैसे अब तक वैज्ञानिक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाये हैं कि

आखिर मोतियाबिंद होने की मुख्य वजह क्या है।

अमेरिका की अपनी रिपोर्ट कहती है कि वहां के पचास फीसद लोग इससे पीड़ित होते हैं।

दूसरी तरफ फ्रेड हॉलो फाउंडेशन की रिपोर्ट बताती है कि

दुनिया के अनेक ऐसे देश और इलाके हैं, जहां के लोग आर्थिक तंगी की वजह से

यह सुरक्षित और आसान सा ऑपरेशन तक नहीं करा पाते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के करीब सवा तीन करोड़ लोग

सिर्फ आर्थिक साधन नहीं होने की वजह से मोतियाबिंद के अंधेपन के शिकार हैं।

इनमें से नब्बे प्रतिशत से अधिक लोग विकासशील देशों के नागरिक हैं।

अमेरिकी वैज्ञानिकों को चीन के बच्चों से मिली जानकारी

इसी बात को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने तेल आधारित एक आई ड्रॉप तैयार किया  है।

यह पहले से मौजूद एक स्टेरोयाड पर आधारित है, जिसे लैनोस्टेरयल नाम से जाना जाता है।

दरअल चीन के दो बच्चों के  बारे में वैज्ञानिक रिपोर्ट मिलने के बाद इसका पता चला था।

दोनों बच्चों की आंखों में जन्म से ही मोतियाबिंद था।

जांच होने पर इसके वंशानुगत पाया गया जबकि दोनों के माता पिता को ऐसी कोई परेशानी नहीं थी।

गहन जांच में इस बात का पता चला कि दरअसल बच्चों के माता पिता में लैनोस्टेरयल मौजूद थे,

जिसकी वजह से उन्हें मोतियाबिंद नहीं हुआ था

जबकि जन्म के वक्त बच्चों में यह स्टेरॉयड गुण विकसित नहीं हो पाया।

इससे वे मोतियाबिंद के शिकार हो गये।

इस तथ्य के आधार पर शोध के आगे बढ़ाते हुए इस आई ड्रॉप को तैयार किया गया है।

प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों ने इसका तीन स्तर पर परीक्षण कर लिया है।

पहले में यह पाया गया कि यह आई ड्रॉप पहले से मौजूद मोतियाबिंद को छोटा कर देता है।

खऱगोश पर हुए प्रयोग में यह दवा मोतियाबिंद साफ करने में पूरी तरह कामयाब साबित हुई है।

13 में से 11 खरगोश मोतियाबिंद से पूरी तरह मुक्त हो गये।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने कुत्तों की आंखों से भी मोतियाबिंद हटाने में सफलता पायी है।

इस शोध की खोज खबर रखने वाले अन्य वैज्ञानिक भी मान रहे हैं कि

क्लीनिकल ट्रायल में सफल होने पर यह दवा एक क्रांतिकारी खोज साबित होगी।

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