भारत और पाकिस्तान से ज्यादा खुश है अमेरिका

भारत और पाकिस्तान से ज्यादा खुश है अमेरिका
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भारत और पाकिस्तान की सीमा पर पहले जब कभी तनाव उत्पन्न होता था तो अमेरिका ज्यादा खुश होता था।

उसका यह खुश होना स्वाभाविक था। क्योंकि इस सीमा पर हथियारों की खपत बढ़ जाती थी।

उसके धंधा चल निकलता था।

पाकिस्तान को दान में दिये गये हथियारों के बदले भारत नकदी डॉलर देकर हथियार खरीदा करता था।

शायद यह पहला मौका है जबकि उसे युद्ध की स्थिति में अपना पहले का लगाया पैसा पूरा डूब जाने का खतरा नजर आया था।

सैन्य संतुलन के अलावा भी आर्थिक मोर्चे पर पाकिस्तान वास्तविक अर्थों में टिक पाने की स्थिति में नहीं है।

युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है, इस बात को मानने के बाद भी यह चर्चा प्रासंगिक है कि सैद्धांतिक तौर पर बात करें

तो निर्णायक परमाणु युद्ध होने के बाद भी भीषण तबाही के बाद भी भारत तो कुछ न कुछ बचा रहेगा।

दूसरी तरफ पाकिस्तान का नामों निशां नहीं बचेगा।

इस बात को सभी बड़े देश अच्छी तरह जानते हैं।

दोनों के पास परमाणु हथियार हैं और एक ने पहल की तो दूसरा भी इसके इस्तेमाल से परहेज तो नहीं करेगा।

वैसी स्थिति में समूचे दक्षिण पूर्व एशिया में जो तबाही मचेगी।

उसका कुप्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ना तय है।

लेकिन यह अमेरिकी चिंता का विषय नहीं है।

पहले भी कई बार यह कहा जा चुका है कि दरअसल अमेरिका को एक देश मानने से बेहतर है कि उसे एक कारोबारी समूह के भौगोलिक पहचान के तौर पर आंका जाए।

हथियारों की बिक्री से उसका धंधा चमकता है लेकिन इस बार भारत का अत्यंत ही आक्रामक रुख उसके कारोबारी हित को पूरी तरह डूबा देने की धमकी देता हुआ नजर आया।

ऐसे में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा भारतीय विंग कमांडर अभिनंदन को रिहा करने की घोषणा के पहले ही

अमेरिकी राष्ट्रपति ने सार्वजनिक तौर पर भारत और पाकिस्तान से अच्छी खबर मिलने की बात कह दी थी।

इसलिए यह स्वीकार कर लिया जाना चाहिए कि भारतीय वायु सेना अधिकारी को रिहा करने में किसी न किसी रुप में अमेरिकी प्रभाव का भी असर रहा।

अब यह समझने की कोशिश करें कि आखिर अमेरिका को इससे फायदा क्या हुआ।

दुनिया के हथियारों के सबसे बड़े सौदागर को अपने हथियारों की चिंता सताने लगी थी।

पाकिस्तान अगर तबाह हुआ तो उसका पैसा तो डूबेगा ही इस युद्ध में उसके हथियारों की खामी भी शायद बाहर आ जाती।

जिस अमेरिकी विमान पर इतना अधिक प्रचार किया गया था वह मिग विमान के हमले में ध्वस्त हो गया।

अगर इसी तरीके से कुछ और विमान गिरा दिये जाते तो उसकी सारी खामियों के बारे में पूरी दुनिया को पता चल जाता।

अमेरिकी मिसाइल आमराम के भी लक्ष्यभ्रष्ट होने का एक प्रमाण दुनिया के सामने भारतीय सेना ने रख दिया है।

ऐसे में विमान और मिसाइल की कबाड़ से ही उसकी संरचना को समझना दूसरे देश के विशेषज्ञों के लिए कठिन काम नहीं था।

वैसे में अगर अमेरिकी हथियारों की सारी खामी बाहर आ जाती तो दुनिया में उसके हथियार के कारोबार को धक्का पहुंच सकता था।

अमेरिकी सोच सिर्फ तनाव कायम रख अपने हथियारों की बिक्री चालू रखने की है।

वह कतई नहीं चाहता कि उसकी तकनीक दुनिया जान जाए और उससे बेहतर हथियार बाजार में दूसरे देशों द्वारा तैयार कर लिया जाए।

रुस के क्लासनिकोव राइफल ने अकेले ही अमेरिकी सैन्य राइफलों की बिक्री को बहुत चोट पहुंचाया है।

दूसरी तरफ दुश्मनों से घिरे इजराइल ने भी अपने हथियार न सिर्फ विकसित किये हैं बल्कि उसने भी हथियारों का कारोबार करना प्रारंभ कर दिया है।

ऐसे में अत्यंत महंगे विमान और मिसाइल की प्रणाली जान लेने के बाद दूसरे के लिए उससे बेहतर चीज बना लेना कोई कठिन काम नहीं था।

इसलिए यह पहला अवसर है जबकि अमेरिकी भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम होने की स्थिति से प्रसन्न है।

खुद डोनाल्ड ट्रंप भी इसके प्रमाण है।

कमोबेशी यही स्थिति चीन की भी है।

जिसका ढेर सारा पैसा पाकिस्तान में फंसा हुआ है जबकि प्रखर राष्ट्र प्रेम के उभार की स्थिति में चीन को भारत के बाजार से हाथ धोने का नुकसान उठाना पड़ सकता है।

वर्तमान में पाकिस्तान के साथ खड़े होने की उसकी अलग मजबूरी है लेकिन युद्ध की स्थिति में अगर भारत का बाजार उसके लिए बंद हो गया

तो उसकी डांवाडोल अर्थव्यवस्था और भी बिगड़ जाएगी।

लेकिन इनके बीच भारत के अंदर बनते चुनावी माहौल को हम नहीं भूल सकते।

इसमें प्रसिद्ध शायद राहत इंदौरी का वह शेर याद आ रहा है।

उन्होंने बहुत पहले लिखा था-

सरहदों पर बहुत तनाव है क्या ? कुछ पता तो करो चुनाव है क्या ?
खौफ़ बिखरा है दोनों सम्तों में , तीसरी सम्त का दबाव है क्या?

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