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अमेजन की कुछ मछलियों के पास बचाव के लिए बुलेट प्रूफ जैकेट

  • वहां की सबसे खतरनाक मछली है पिरान्हा
  • अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए नये विकल्प की तलाश
  • इसे बुलेट प्रूफ जैकेट के जैसा मजबूत आंका गया है
  • अमेरिकी वायुसेना के वैज्ञानिक अनुसंधान का नया नतीजा
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः अमेजन की कुछ मछलियों के पास अपने बचाव के लिए प्राकृतिक आवरण हैं।

अमेजन नदी की इन मछलियों को सबसे अधिक खतरा वहां की खतरनाक पिरान्हा मछलियों से ही होता है।

यह पिरान्हा मछलियां अमेजन नदी की सबसे खतरनाक प्राणियों में से एक है।

विशाल झूंड में रहने वाली यह मछलियां अचानक ही किसी पर भी हमला कर मिनटों में उसे चट कर जाती हैं।

इसी वजह से प्राकृतिक तौर पर कुछ मछलियों ने उनसे बचाव के तरीके विकसित किये हैं।

इस बाहरी आवरण की वजह से अब पिरान्हा उनपर हमला नहीं करती।

अगर हमला हुआ भी तो इस प्रजाति को बच निकलने का पर्याप्त मौका मिलता है

क्योंकि पिरान्हा के नुकीले दांत उन्हें ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं।

अमेरिकी वायुसेना के वैज्ञानिक अनुसंधान को इससे क्यों जोड़ा गया, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है।

लेकिन यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वैकल्पिक युद्ध के तौर तरीके तलाशने के क्रम में

अमेरिकी सेना अलग अलग तरीके से यह काम कर रही है।

कुछ इसी तरह रुसी सेना ने भी अपने लिए डॉल्फिनों को प्रशिक्षित किया है।

अनेक देशों के पास अब सैन्य अभियान के लिए प्रशिक्षित कुत्ते पहले से ही हैं।

कुछ ने तो गुरिल्ला और बंदरों को भी जंगली इलाकों में छापामारी युद्ध के लिए तैयार किया है।

खैर जिन मछलियों को इस शोध के तहत पहचाना गया है, उन्हें अरापिमा गिगास कहा जाता है।

इस मछली के आवरण की बनावट पर अब शोध किया जा रहा है।

औपचारिक तौर पर यह भर बताया गया है कि दरअशस एयरोस्पेस डिजाइन में सुधार करने

तथा भावी अंतरिक्ष अभियानों के लिए मजबूत पोशाक तैयार करने के लिए यह शोध किया जा रहा है।

अमेजन नदी में इन मछलियों को पिरान्हा से बचाव मिलता है

जिन मछलियों के पास ऐसे बुलेट प्रूफ जैकेट जैसे आवरण हैं, वे बड़ी आराम से अमेजन के उन इलाकों में भी

आते-जाते रहते हैं, जहां पिरान्हा की भरमार है।

शोध में पता चला है कि मछलियों के बाहरी शरीर पर बने छिलके कुछ ऐसे हैं, जिनपर पिरान्हा मछली की दांतों का

असर तुरंत नहीं हो पाता है।

इस अरापिमा गिगास प्रजाति की मछली तो मीठे पानी की अन्यतम विशाल मछलियों में गिना जाता है।

कुछ लोगों का मानना है कि पिरान्हा से बचाव के साधन मौजूद होने की वजह से ही

वे अधिक समय तक जीवित रह पाती हैं तथा इस दौरान उनका आकार लगातार बढ़ता जाता है।

अमेजन की मछलियों पर होने वाले इस शोध में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ता भी थे।

इनमें विश्वविद्यालय के सॉन डियागो और बार्कले दोनों केंद्रों के वैज्ञानिक शामिल थे।

इनलोगों ने मछलियों की बाहरी बनावट और पानी में उनके तौर तरीकों का गहन अध्ययन किया है।

वहां के पानी में यह मछली करीब दस फीट लंबी हो जाती है।

आकार बढ़ने की वजह से यह करीब दो सौ किलोग्राम तक की वजन प्राप्त कर लेती हैं।

इस मछली की दूसरी विशेषता यह भी है कि यह पानी के बाहर भी करीब चौबीस घंटे तक जीवित रह सकती है

और हवा में भी सांस लेती है।

इन मछलियों का ठिकाना भी ब्राजिल, गुआना और पेरु के इलाके में हैं,

जहां पानी में सबसे भयानक खतरा पिरान्हा मछलियों का ही होता है।

प्राचीन पृथ्वी में भी कुछ प्राणियों के पास था कड़ा आवरण

कुछ इस तरीके से झूंड में हमला करती है पिरान्हा मछलियां

शोध से जुड़े वैज्ञानिक मानते हैं कि प्राचीन पृथ्वी में डायनासोर जैसे कुछ प्राणियों के पास भी इसी किस्म का सख्त

आवरण होता था। इसी आवरण की वजह से वे किसी भी अप्रत्याशित हमले से बच जाते थे।

लेकिन मछलियों में यह आवरण खास तौर पर अलग है क्योंकि पानी के अंदर इस कठोर आवरण के बाद भी

मछली बड़ी आसानी से तैरती रहती है।

इसलिए भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए इसी बनावट की नकल करना इंसान के लिए ज्यादा फायदेमंद होगा।

मछलियों का यह बाहरी खोल काफी हल्का होने के बाद भी इतना मजबूत है,

इसका वैज्ञानिक गहन विश्लेषण कर रहे हैं।

ताकि इसी के आधार पर नये किस्म का हल्का लेकिन अत्यंत मजबूत जैकेट तैयार किया जा सके।

जिस तरीके से यह आवरण मछली की गतिविधियों के लिए कोई रूकावट नहीं बनता,

वही बनावट इंसान के लिए भी अत्यधिक फायदेमंद साबित हो सकता है।

वैज्ञानिक इस आवरण की बनावट के साथ साथ उसकी संरचना को भी समझ रहे हैं।

इसे समझने के बाद इसी तर्ज पर इंसानी जैकेट बनाने के लिए आवश्यक तत्वों और पदार्थों का निर्माण कर

नये किस्म के जैकेटों के निर्माण का प्रयोग प्रारंभ किया जाएगा।

अमेजन की नदियों में पाया गया है कि पिरान्हा के हमले से इस मछली के बाहरी खोल पर चोट के निशान

तो बनते हैं पर इस नुकीले दांत से न तो आवरण टूटता है और न ही अंदर तक कोई चोट पहुंचती है।

प्रारंभिक शोध में इस आवरण में खास तौर पर बने कोलाजोन और प्रोटिन के स्तर पाये गये हैं।

इन्ही पदार्थों का अब रासायनिक विश्लेषण का काम चल रहा है।

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