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कोरोना संकट के फायदों को भी समझ लीजिए

कोरोना संकट के फायदों की बात करने से ही अनेक लोगों क भौंहे तन जाएंगी कि आखिर

यह कहना क्या चाहता है। हर तरफ से जहां नुकसान ही नुकसान नजर आता हो वहां

फायदे की कौन सी बात हो सकती है। अलबत्ता हर आम और खास को यह जानकारी हो

चुकी है कि कोरोना के दौरान लगे लॉक डाउन से हवा साफ हो गयी है, पर्यावरण सुधर गया

है और अधिक सन्नाटा देखकर अनेक जंगली जानवर भी आबादी की तरफ चले आये थे।

लेकिन इससे आम इंसान का क्या लेना देना। आम इंसान को अपने दैनंदिन युद्ध में

कोरोना काल की वजह से बहुत पिछड़ गया है। इस आर्थिक संकट के तनाव के परिणाम के

तौर पर हम आये दिन आत्महत्याओं का दौर भी देख रहे हैं। ऐसे में कोरोना संकट के

फायदों की चर्चा किसी को भी हैरान कर सकती है। लेकिन शांत मन से बदली हुई

परिस्थितियों को दिल के अंदर से महसूस करने का प्रयास कीजिए। संकट के इस दौर में

हमारी भोजन पद्धति भी बदली। जब जो चाहा वह खा लिया, वह परिस्थिति नहीं थी तो जो

उपलब्ध था, सहज था, उससे काम चलाया। यह हमारी भोजन पद्धति में आये विकार को

दूर करने वाला साबित हुआ है। अनेक घरों के बच्चे और युवा बिना होटल का पिज्जा खाये

चैन नहीं पाते थे, उनकी आदतें सुधर गयी हैं तो अब उन्हें इसी अनुशासन में आगे बढ़ने

दीजिए।

कोरोना संकट के फायदों में भोजन पद्धति का सुधार है

बांग्लादेश के अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिक डॉ विजन कुमार शील ने कोरोना

से बचाव का सबसे बड़े हथियार के तौर पर हमारी पारंपरिक भोजन पद्धति को हमारे

सामने प्रस्तुत किया है। पूरी दुनिया में वायरसों पर उनके ज्ञान का पूरी दुनिया लोहा

मानती है। उन्होंने कहा कि इस दौर में विटामिन सी का अधिकाधिक इस्तेमाल फायदेमंद

है। इसके लिए अमरुद, नींबू, आंवला जैसे फलों का उपयोग किया जा सकता है। अगर

उनकी उपलब्धता नहीं हो तो आम आदमी विटामिन सी के टैबलेट भी ले सकता है।

लेकिन कोशिश यह होनी चाहिए कि आदमी प्राकृतिक तौर पर उपलब्ध विटामिन सी का

अधिकाधिक उपयोग करें। डॉ शील ने कहा कि जब किसी को ऐसा लगे कि वह कोरोना की

चपेट में आ चुका है तो वह अदरख, लौंग और एक काली मिर्च पानी में डालकर एक काढ़ा

तैयार कर ले। यह काढ़ा काले रंग का बनता है । इसे मधु अथवा चीनी के साथ पीने और

उससे गरारा करने से भी गले में बैठा हुआ वायरस इनके प्रभाव से वहीं समाप्त हो जाता

है। इस तरह हमें अपनी पारंपरिक भोजन पद्धति और उसमें इस्तेमाल होने वाले मसालों के

फायदों की जानकारी मिली है। लेकिन कोरोना संकट के फायदों में सिर्फ भोजन ही

महत्वपूर्ण नहीं है। इससे अलग हटकर देखें तो यह अदृश्य शत्रु हमें अपनी प्राचीन

अर्थव्यवस्था की तरफ लौट जाने का साफ इशारा दे रही है। हमने पश्चिमी दुनिया का

अंधानुकरण कर अपनी इसी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह चौपट कर लिया था। यह गनीमत

थी कि हमें अपनी पुरखों से मिली बचत की अर्थव्यवस्था की सीख मिली हुई थी।

हमारी प्राचीन अर्थव्यवस्था की सीख भी बहुत काम आयी

इसी कारण इससे पहले भी जब दुनिया में आर्थिक मंदी का वैश्विक हमला हुआ था तो भारत

उससे बहुत कम प्रभावित हुआ था। वरना अमेरिका जैसे देशों के बड़े बड़े बैंक भी उस

आर्थिक मंदी को नहीं झेल पाये थे, उसका इतिहास भी कोई खास पुराना नहीं है। इसलिए

कोरोना संकट के फायदों में हमें अपनी व्यापार ढांचा को ग्रामोन्मुख बनाने की जरूरत है।

झारखंड के संदर्भ में बात करें तो इस बार झारखंड में खेती का रकबा पहले के मुकाबले

बहुत अधिक है। ऐसा कोरोना संकट के फायदों में से एक है। महानगरों से लौटे मजदूरों ने

गांव में रहते हुए बंजर पड़े रहने वाले जमीन पर भी कुछ न कुछ खेती कर दी है। इसका भी

फायदा आने वाले कुछ महीनों में आना तय है। अब रही बात उद्योग की तो यह भी साफ

हो गया कि लघु और कुटीर उद्योग के सहारे ही हम अपनी जरूरतों को बेहतर तरीके से

पूरा कर सकते हैं। इसी म़ॉडल को चीन ने अपनाया है और दुनिया के बाजार पर उसका

कब्जा होने का यह भी एक प्रमुख कारण है। चीन से व्यापारिक तौर पर दो दो हाथ करने के

लिए भी हमें अपनी प्राचीन व्यापार पद्धति पर लौट जाना पड़ेगा। ताकि हम किसी भी

उत्पादन के परिवहन लागत को भी कम कर सकें। गुणवत्ता में बेहतरी के लिए भी सारे

संसाधन पहले से मौजूद हैं। सिर्फ उन्हें गांव देहात तक पहुंचा देने की जरूरत भर है।

कोरोना संकट के फायदों को इस नजरिए से देखते हुए अगर भारतवर्ष ने अगले दस वर्षों

तक निरंतर परिश्रम किया तो तस्वीर बदलनी तय है। कोरोन काल ने भ्रष्टाचार के

नुकसान भी बता दिये हैं। अब उसे दूर करना भी सामाजिक जिम्मेदारी बन चुकी है।


 

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