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आल्प्स पर्वत पर शैवाल की वजह से बर्फ हुआ गुलाबी

  • खरबूजे के रंग का हो चुका सारा बर्फखंड

  • हवाई जहाज से भी नजर आ रहा है यह

  • जितनी मात्रा बढ़ेगी बर्फ उतनी पिघलेगी

  • खतरे की लाल झंडी है सुंदर सा ग्लेशियर

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः आल्प्स पर्वत पर पड़ी बर्फ की चादरें अचानक ही गुलाबी हो गयी हैं। वैसे इससे

पहले अंटार्कटिका के इलाके में ग्लेशियर के हरा हो जाने की भी सूचना मिली थी। भारत में

भी महाराष्ट्र का लुनार झील का रंग भी अचानक से गुलाबी हो गया था। लेकिन आल्प्स

पर्वत के ग्लेशियर पर दिख रहे इस गुलाबी रंग को वैज्ञानिक और पर्यावरणविद खतरे की

लाल झंडी मान रहे हैं। उनके मुताबिक अब पृथ्वी यह संकेत देने लगी है कि वह और

प्रदूषण झेलने के काबिल नहीं रही। इससे कई किस्म के अप्रत्याशित बदलाव भी अब बिना

किसी पूर्व सूचना के ही प्रारंभ हो सकते हैं। एक बार यदि यह प्रक्रिया प्रारंभ हो गयी तो उसे

फिर से रोक पाना या पूर्व स्थिति में ले जाना इंसान के बश की बात नहीं होगी। इसलिए

आल्प्स पर्वत के घटनाक्रमों पर लगातार नजर रखी जा रही है और वहां गुलाबी हो चुके

बर्फखंडों की गहन जांच भी हो रही है। यूरोप के इलाके में सैलानियों के लिए पर्यटन का

सबसे प्रमुख स्थल यही आल्प्स पर्वत ही है। वहां अचानक से बर्फ के ऊपर गुलाबी रंग की

चादर सी बिछ गयी है। इसे देखकर लोग हैरान हुए थे लेकिन तुरंत ही पर्यावरण विशेषज्ञों

ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह एक सामान्य मौसमी प्रक्रिया है। इसके जरिए यह समझा

जा सकता है कि वहां के ग्लेशियर के पिघलने की गति सामान्य से तेज हो चुकी है। अभी

तो कोरोना लॉक डाउन की वजह से इस पूरे आल्प्स पर्वत श्रृंखला पर सैलानियों की भीड़

नहीं के बराबर है।

आल्प्स पर्वत पर अभी सैलानियों की भीड़ नहीं

अन्यथा सामान्य परिस्थितियों में यहां सालों भर आने वालों का तांता लगा रहता है।

ग्लेशियर पर गुलाबी रंग दिखने की सूचना पाते ही मामले की छानबीन करने पहुंचे

विशेषज्ञों ने पाया है कि यह दरअसल एक किस्म की एल्गी है। इसके रंग परिवर्तन का अर्थ

वहां की बर्फ का तेजी से पिघलने की प्रक्रिया का और तेज होना है। ग्लेशियर में बर्फ घटने

की स्थिति में यह एल्गी तेजी से फैलती जा रही है। इस वजह से पूरा इलाका ही अब गुलाबी

नजर आने लगा है। आल्प्स पर्वत के करीब से हवाई जहाज से गुजरने वाले भी इस दृश्य

को देख पा रहे हैं। लेकिन यह दरअसल खतरे का संकेत ही है, जिसे लेक वैज्ञानिक चिंतित

हैं।

इस प्रजाति के एल्गी के बढ़ने की वजह से ग्लेशियर के पिघलने की गति और तेज होती

जाती है। बर्फ से ही पोषण ग्रहण करने वाला यह पौधा तेजी से बर्फ के पिघलाता भी चला

जाता है। इस बारे में आंकड़ों का हवाला देते हुए इटली के नेशनल रिसर्च काउंसिल के

वैज्ञानिक डी माउरो ने कहा कि इस साल ठंड में कम ठंड पड़ी है और बसंत ऋतु में मौसम

में गर्म हवा के झोंके अधिक आये हैं। लेकिन उन्हें उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यह

संतुलन प्रकृति के द्वारा खुद ही बना लिया जा सकेगा। अगर ऐसा नहीं हो पाया तो उसे

पृथ्वी के लिए बहुत बड़े खतरे का संकेत मान लिया जाना चाहिए। खरबूजे के रंग यानी

गुलाबी रंग के बर्फ को देखकर भले ही अच्छा लगता हो लेकिन यह ग्लेशियर के पिघलने

की गति को तेज करने लायक मौसम पैदा करता है।

उत्तरी इटली के प्रेसना ग्लेशियर की एल्गी जांच रहे हैं वैज्ञानिक

उत्तरी इटली के प्रेसना ग्लेशियर पर इटली के वैज्ञानिक इस स्थिति का अध्ययन कर रहे

हैं। वैज्ञानिक इस बात को लेकर चिंतित है कि यह क्रम धीरे धीरे तेज होता जा रहा है और

इससे आल्प्स पर्वत श्रृंखला पर बर्फ की कमी को महसूस किया जा सकता है। इस वर्ष यहां

कम बर्फवारी के आंकड़े मौजूद हैं। साथ ही तापमान अधिक होने का रिकार्ड भी शोध दल के

पास उपलब्ध है। इसलिए जैसे जैसे यह एल्गी आल्प्स पर बढ़ेगी वैसे वैसे बर्फ के पिघलने

की गति और तेज होती चली जाएगी। याद रहे कि कुछ दिन पहले ही अंटार्कटिका में

ग्लेशियर का रंग हरा होने की वजह से वैज्ञानिकों ने शोध कर बताया था कि वहां नये

किस्म के जीवन का उदय हो रहा है। दूसरी तरफ भारत में लोनार झील में पानी का रंग

रातों रात गुलाबी हो गया था। उसके कारणों की व्याख्या अब तक नहीं हो पायी है।

उल्कापिंड गिरने से बनी इस झील को देखने हर साल हजारों पर्यटक भी यहां आते हैं


 

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