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कृषि के साथ साथ पशुपालन को भी बढ़ावा देना जरूरी




कृषि के साथ साथ सरकार को अब पशुपालन पर भी ध्यान देना चाहिए।

यह अच्छी सूचना है कि सरकार ने किसानों की आय बढ़ाने के लिए

गायों में नस्ल सुधार और शत प्रतिशत कृत्रिम गर्भाधान का लक्ष्य तय किया है।

इस लक्ष्य को वर्ष 2025 तक पूरा करना है।

इससे निश्चित तौर पर ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था सुधरेगी।

दरअसल भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की असली संरचना ही इन दोनों पर आधारित है।

इसलिए कृषि के साथ साथ पशुपालन को भी बढ़ावा देने की जरूरत है।

जब यह दोनों विधाएं गांवों में बेहतर तरीके से काम करने लगती हैं

तो किसान परिवारों के लिए आय से अन्य एवं नियमित स्रोत भी खुल जाते हैं।

वर्तमान में पशु उद्योग का बाजार भी तेजी से फैलता जा रहा है।

कृषि के साथ साथ पशुपालन कर संयुक्त उद्योग जैसा

और कुछ नहीं तो कमसे कम दूध और घी जैसे दुग्ध उत्पाद भी बाजार में अच्छे दाम पर बिकने लगे हैं।

गुजरात की एक संस्था ने आमूल ब्रांड के माध्यम से तमाम अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडों को जो चुनौती दी है, वह भारतीय प्राचीन आर्थिक ढांचे को ही स्पष्ट करती है।

यह याद रखा जाना चाहिए कि प्राचीन भारत की परंपराओं में लोगों को दान में पशु भी दिये जाते हैं।

किस्से कहानियों में हमने इन तथ्यों को सिर्फ रोचक जानकारी के तौर पर पढ़ा भर है।

लेकिन वर्तमान शिक्षा पद्धति से कभी भी इस तरफ हमारा ध्यान आकृष्ट ही नहीं किया

कि दरअसल यह पशुधन ही दान में क्यों दिये जाते थे।

इस बात को समझ लेना चाहिए कि बरसात पर आधारित कृषि की व्यवस्था के

बीच शेष समय में पशुपालन रोजगार का एक बड़ा साधन बनता है।

प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था इसी पर आधारित थी

इसलिए प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था भी इतनी समृद्ध थी।

अब केंद्रीय पशुपालन , डेयरी और मत्स्य पालन मंत्री गिरिराज सिंह और राज्य मंत्री संजीव बालियान ने कहा है

कि सरकार इन लक्ष्यों को कठिन परिश्रम और लोगों के सहयोग से हासिल करेगी।

उन्होंने कहा कि औसत गाय में दूध उत्पादकता कम है जिसे कृत्रिम गर्भाधान,

भ्रण प्रत्यारोपन और उत्कृष्ट नस्ल के सांढ की मदद से बढ़ाया जा सकता है।

देश में वर्ष 2012 में हुए पशु गणना के अनुसार 19 करोड़ 90 लाख गाय हैं।

देश में करीब 14.5 करोड़ किसान है जिनमें से करीब आठ से दस करोड़ किसान पशुपालन से जुड़े हैं।

अमेरिका की एक कम्पनी के माध्यम से सेक्स साटेड सिमेंन (एसएसएस) कार्यक्रम शुरु किया गया है जिससे केवल बछिया ही पैदा होगी।

इसके एक डोज वीर्य की कीमत करीब 1200 रुपये है जिसे 500 रुपयें करने को लेकर बातचीत चल रही है। इसकी सफलता 30 से 40 प्रतिशत है।

एसएसएस तकनीक पर देश में भी काम चल रहा है और उम्मीद है कि अगले छह माह में यह तकनीक विकसित कर ली जायेगी।

इसके बाद वीर्य का एक डोज 200 रुपये में मिलने लगेगा।

देश के लिए यह प्रयास वरदान साबित होगा

बाद में इस कार्यक्रम को निजी सार्वजनिक भागीदारी से चलाया जायेगा।

देश में 30 भ्रूण प्रत्यारोपण केन्द्र हैं जिनमें से 11 कार्य कर रहे हैं।

ये सभी केन्द्र इसी वर्ष से पूरी तरह कार्य करने लगेंगे ।

उन्होंने कहा कि पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान और मुंहपक खुरपक तथा ब्रूसलोस बीमारी से मुक्ति से

देश में सालाना 12 से 15 लाख करोड़ रुपये की आय बढ़ सकेगी।

रोगमुक्त करने का अभियान जल्दी ही शुरु किया जायेगा।

मंत्री द्वय ने यह गंभीर बात भी कही है कि देश में सालाना चावल और गेहूं के कुल मूल्य से अधिक कीमत के दूध का उत्पादन होता है ।

उन्होंने कहा कि कृत्रिम गर्भाधान कराने के लिए देश में करीब 90 000 ‘ मैत्री ’ कार्यकर्ताओं और 5000 सांढ़ों की आश्यकता है।

केंद्र सरकार की योजना भी इसके विकास की है

कृत्रिम गर्भाधान कराने के लिए अभी तक 56000 कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया गया है

और अधिक संख्या में ऐसे कार्यकर्ता तैयार करने के लिए पशु विज्ञान कालेजों ,

विश्वविद्यालयों और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थानों में प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरु किया जायेगा ।

सरकार हर गांव में कम से कम एक मैत्री कार्यकर्ता तैयार करना चाह रही है ।

देश में करीब सात लाख गांव हैं ।

छोटे छोटे दो तीन गांवों में एक मैत्री कार्यकर्ता यह काम कर सकते हैं ।

दोनों मंत्रियों ने बताया कि देश से सालाना 27000 से 29000 करोड़ रुपये का मांस निर्यात होता है

जिसे वे बढ़ाना चाहते हैं। म्यंमार , वियतनाम और चीन आदि को मांस का निर्यात किया जाता है।

पशुओं के रोग मुक्त होने पर मांस के निर्यात में भारी वृद्धि हो सकती है।

इसलिए खाली समय में जब गांव के किसान के पास कोई काम नहीं होता है

तो उसे पशुपालन के माध्यम से रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है।

यह दैनिक और निरंतर कमाई का जरिया है।

इसे हम जितना विकसित करेंगे, भारत के गांवों की आर्थिक स्थिति उतनी मजबूत होगी।

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