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महाराष्ट्र से गठबंधन की राजनीति को लगता झटका







महाराष्ट्र से गठबंधन की राजनीति को झटका लगना तय है।

वहां से जो राजनीतिक संकेत निकलकर बाहर जा रहे हैं, उसके मुताबिक अब

गठबंधन के लिए पूर्व की शर्तों का कड़ाई से पालन और उसका लिखित

दस्तावेज शायद आने वाले दिनों में अनिवार्य हो जाएगा।

महाराष्ट्र से सरकार गठन के वैसे पेंच सामने आ चुके हैं, जिनके बारे में राजग

गठबंधन में पहले कल्पना भी नहीं की गयी थी।

स्थिति कुछ ऐसी है कि शिवसेना और भाजपा के 25 साल पुराने रिश्ते में दरार

भी पड़ सकती है।

यह भारतीय राजनीति के बदलाव का एक पड़ाव है।

दरअसल देश की राजनीति में जिस तरीके से क्षेत्रीय मुद्दे प्रभावी हो रहे हैं,

उसी अनुपात में क्षेत्रीय दलों की ताकत भी बढ़ती जा रही है।

वैसे यह शाश्वत सत्य है कि जब किसी राजनीतिक सत्ता की ताकत बढ़ती है

तो उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी बढ़ती जाती है।

महाराष्ट्र से पूरे देश को यही संकेत मिल रहा है।

महाराष्ट्र से यह संकेत पूरे देश की राजनीति पर जा रहा है

इसका सीधा असर अभी झारखंड की राजनीति में देखने को मिल रहा

है। यहां दोनों परस्परविरोधी खेमा इसी गठबंधन की राजनीति की गांठ

सुलझाने में व्यस्त हैं।

और यह गांठ हैं कि यह सुलझने के बदले और उलझती चली जा रही है।

भाजपा विरोधी गठबंधन की बात करें तो इसमें से पहले ही झारखंड विकास

मोर्चा के अध्यक्ष खुद को अलग कर चुके हैं।

बदली हुई परिस्थितियों में अचानक ही इस दल के नेता बाबूलाल मरांडी

किसी धूमकेतु की तरह झारखंड की राजनीति में चमकने लगे हैं।

झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री के तौर पर उन्हें आज भी याद किया जा रहा है,

यह अपने आप में बड़ी बात है।

झारखंड विकास मोर्चा को अपने पाले में रखने की भरसक कोशिश की

जा रही है।

लेकिन जो लोग बाबूलाल मरांडी को जानते हैं, उन्हें अच्छी तरह पता है कि

एक बार किसी फैसले पर पहुंचने के बाद वह उससे नहीं डिगते।

इस खेमा में असली संघर्ष झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस के बीच है।

दोनों के बीच अनेक सीटों पर तनातनी है।

महाराष्ट्र से जो कुछ निकलकर सामने आया है, उसका बेहतर निष्कर्ष

यह है कि बाद में झगड़ा करने के पहले ही वे अपने विवादों को चुनाव

में जाने के पहले ही निपटा लेना चाहते हैं।

यह भी महाराष्ट्र से मिले संकेतों का ही नतीजा है कि राजनीतिक दल अब

चुनावी लाभ के साथ साथ भावी परिणामों की चिंता पहले से करने लगे हैं।

दूसरे खेमा में भारतीय जनता पार्टी और ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन

के बीच सीटों की खींचतान है।

झारखंड में भी दिख रहा है इस खतरे का असर

भाजपा इस मुद्दे पर महाराष्ट्र से मिले झटके से उबर नहीं पायी है,

लिहाजा वह सरकार चलाने के लिए दोबारा से आजसू पर तो कतई

निर्भर नहीं रहना चाहती।

अंदरखाने से यह संकेत मिल चुके हैं कि भाजपा ने आजसू के कम सीट देकर

अपने बल पर बहुमत हासिल करने की रणनीति पर काम करना प्रारंभ कर

दिया है।

इससे गठबंधन की गाड़ी को भले ही झटका लगे लेकिन भारतीय राजनीति को

एक बदलाव की तरफ ले जाना भी अच्छी बात है।

जिस तरीके से महाराष्ट्र से विवाद के राष्ट्रीय निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं, उससे

गठबंधन की राजनीति पहले के मुकाबले और परिपक्व होगी, ऐसी उम्मीद की

जा सकती है।

ऐसा माना जा सकता है कि आने वाले दिनों में हर दल गठबंधन में चुनाव

लड़ने के पहले ही इस किस्म की चर्चाओं के माध्यम से अपनी तालमेल की

शर्तों को पहले से स्पष्ट कर लेगा ताकि सत्ता हासिल होने के दौरान महाराष्ट्र

जैसी कोई विकट परिस्थिति दोबारा उत्पन्न नहीं हो।

झारखंड के बाद भी कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।

इनमें से पश्चिम बंगाल की लड़ाई सीधे तौर पर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस

और भारतीय जनता पार्टी के बीच है।

लेकिन इसका तीसरा कोण मजबूत बनता नजर आ रहा है, जहां कभी एक

दूसरे के प्रवल विरोधी रहे माकपा और कांग्रेस एक साथ मिलकर चुनाव

लड़ने जा रहे हैं।

इन दोनों दलों ने लोकसभा में भी ऐसी कोशिश की थी, जो विफल रही थी। अब

पहले से हुई तैयारियों का क्या कुछ नतीजा निकलता है अथवा महाराष्ट्र से

मिली सीख का वहां के नेता क्या कुछ लाभ उठाते हैं, यह देखने के लिए चुनाव

परिणामों की घोषणा तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

उत्तर प्रदेश मे विफल रहा है यह गठबंधन

गठबंधन की राजनीति की बात करें तो उत्तर प्रदेश में यह प्रयोग लोकसभा में

भी विफल साबित हुआ है जबकि बसपा और सपा के एकसाथ चुनाव लड़ने के

बाद भी दोनों के वोट बैंक एक दूसरे की झोली में नहीं गये हैं।

बिहार में नीतीश कुमार को भाजपा से ज्यादा कुछ उम्मीद नहीं है।

उड़ीसा में बिजू जनता दल पहले से ही भाजपा के खिलाफ एकमात्र मजबूत

क्षेत्रीय दल है।

अब दक्षिण भारत की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का प्रभुत्व स्थापित है।

लिहाजा यह देखना रोचक होगा कि महाराष्ट्र से मिली सबक का पूरे देश मे

गठबंधन की राजनीति पर क्या कुछ प्रभाव पड़ता है।



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