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झारखंड सहित सभी सरकार अपनी आमदनी बढ़ाने पर काम करें




झारखंड सहित सभी सरकार को जीएसटी का हिस्सा नहीं मिलने से भीषण आर्थिक संकटों

का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए अब राज्य सरकार अपने काम काज के पैसे के लिए

केंद्र के भरोसे नहीं रहे, यह कोरोना संकट की नई सीख है। दरअसल परिस्थितियां कुछ

ऐसी होंगी, उसकी उम्मीद किसी को नहीं था। पूरी दुनिया का रुख अचानक इस तरफ मुड़

गया है कि चाहकर भी राज्य सरकारों को अपने भौगोलिक क्षेत्राधिकारी में कारोबार को

गति देने में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है। नतीजा है कि सरकारी खजाने खाली हैं

और हर तरफ आर्थिक तंगी का पहले से बना हुआ माहौल सुधर नहीं पा रहा है। अब यह

सोचने का विषय है कि बजट बनाने का वक्त आ गया है। पिछले दो दशकों की तरह इस

साल भी वित्त मंत्रालय अपने प्रावधान तैयार करते समय विनिवेश से प्राप्त राजस्व का

आकलन जरूर रखेगा।

सरकार ने वर्ष 2020-21 के बजट में 2.1 लाख करोड़ रुपये के विनिवेश राजस्व का लक्ष्य

रखा था लेकिन बढ़ते खर्चों के बीच उसे अपनी हरेक परिसंपत्ति से आय पर नजरें टिकानी

होंगी। वित्त मंत्री ने अपने ‘आत्मनिर्भर’ पैकेज की घोषणा के समय कहा था कि

रणनीतिक महत्त्व वाले क्षेत्रों में भी चार से अधिक सार्वजनिक उपक्रम नहीं रहेंगे। हम

मान लेते हैं कि बैंकिंग क्षेत्र को भी रणनीतिक महत्त्व का दर्जा दिया जाएगा। इसका

मतलब है कि मौजूदा समय के सात बड़े बैंकों एवं पांच छोटे बैंकों में से कई को बेचा

जाएगा। लेकिन उसके क्रेता हैं भी या नहीं इस पर संदेह की पूरी गुंजाइश है। दरअसल

भारतीय अर्थव्यवस्था की इतनी बुरी गत इसलिए भी हुई है क्योंकि बैंकों के माध्यम से

औद्योगिक और व्यापारिक पूंजी निवेश का ढेर सारा पैसा डूब चुका है।

बुरा हाल इसलिए क्योंकि बैंकों ने जनता का पैसा डूबाया

यह कोई बैंकों को अपना पैसा नहीं था। यह तो देश की जनता का ही पैसा था, जो बट्टा

खाता में जा चुका है। लेकिन इस पैसे के डूब जाने के बाद भी उसके असली हकदारों को अब

तक यह नहीं बताया गया है कि किसके पास कितना पैसा डूबा है। यह भी राजनीति का

खेल है, जिसका खामिजया देश की जनता भुगत रही है। अब राज्यों की बात करें तो

कोरोना लॉकडाउन में जैसे ही कारोबार बंद किया गया, आर्थिक गाड़ी के पहिये कुछ इस

तरह जाम हो गये कि तमाम कोशिशों के बाद भी वे गति नहीं पकड़ पा रहे हैं। यह समझ

लेना होगा कि जनता के पास भी नकदी की तंगी हो गयी है। लिहाजा बाजार में भी नकदी

का तरल प्रवाह बहुत कम हो गया है। लगातार बंदी की वजह से जो उद्योग किसी तरह

चालू हुए हैं, वहां भी नकदी का अभाव है।

ऐसे में झारखंड सहित सभी सरकार को नये सिरे से अपने लिए आर्थिक संसाधन विकसित

करने पर ध्यान देना चाहिए। दूसरे शब्दों में अगर जीएसटी के अंशदान के हिस्से के

इंतजार में राज्य सरकारें बैठी रही तो उन्हें सिवाय नुकसान के और कुछ हाथ नहीं आने

वाला है। इस बात को भी अच्छी तरह समझ लेना होगा कि कर्ज देने के दौरान बैंकों ने

जिन संपत्तियों के आधार पर यह कर्ज दिये थे, उनका वास्तविक बाजार मूल्य अगर कर्ज

की रकम से बहुत कम हैं तो यह संपत्ति नहीं बल्कि शुद्ध तौर पर देनदारी है। एक शब्द में

कहें तो इनमें से अधिकांश बैंकों के पास पूंजी की भारी कमी है और उन पर ऋण का भारी

बोझ है। उनके लिए इस स्थिति से आजाद हो पाना खासा मुश्किल होगा, लिहाजा उनकी

ब्रिक्री के अलावा कोई चारा नहीं होगा।

झारखंड सहित सभी सरकार को केंद्र का भरोसा छोड़ना होगा

आरबीआई इस बात को अरसे से समझता रहा है और यही कारण है कि वर्ष 1994 के बाद

गठित विभिन्न समितियों की तरफ से इनकी बिक्री के बारे में दी गई अनगिनत सलाहों

को दरकिनार करते हुए उसने एक बैंक के दूसरे बैंक में विलय को ही वरीयता दी है। सच तो

यह है कि बैंकों को बेचने के अलावा कोई और विकल्प कभी रहा ही नहीं है। इसी तरह एयर

इंडिया की हालत भी कुछ ऐसी है कि उसे अपने आप को बेचकर ही अपना कर्ज चुकाना

पड़ेगा। उसके हाथ कुछ नहीं आने वाला। लेकिन इससे भी समस्या यथावत बनी रहेगी

क्योंकि यह पैसा फिर से सरकार के पास ही जाएगा। आम जनता को इनसे कुछ हासिल

होने वाला नहीं है बल्कि उनके पैसों से जो संसाधन और आधारभूत संरचनाएं खड़ी की

गयी थी, उनकी कीमत में कमी जनता का नुकसान और बढ़ा देंगी। इसलिए केंद्र के भरोसे

अथवा बजट में आंकड़ों की बाजीगरी करने से बेहतर है कि वास्तविकता के धरातल पर

राज्य सरकार अपनी आमदनी बढ़ाने की योजनाओं पर काम करे ताकि  वे आने वाले दिनों

में फिर से ऐसी विषम परिस्थितियों का सामना नहीं करें।


 



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