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मध्यप्रदेश के सियासी गणित विधायकों की चांदी

मध्यप्रदेश के सियासी हालात कुछ ऐसे हो चुके हैं कि सभी विधायकों की अचानक से चांदी

हो गयी है। भले ही इन विधायकों को कहीं और सुरक्षित हटा लिया गया है। लेकिन सच तो

यही है कि लोकतंत्र में संख्या बल की ताकत का एहसास राजनीतिक दलों को हो रहा है।

सरकार और पार्टी विधायकों को अचानक ही पूछने लगी है। अगर यह स्थिति नियमित

दिनचर्या में शामिल होती तो शायद ऐसी नौबत भी नहीं आती। बात सिर्फ मध्यप्रदेश के

सियासी हालात में कांग्रेस की नहीं है। अब तो साफ होता जा रहा है कि मध्यप्रदेश के

सियासी गणित में भाजपा के भी समीकरण उलझे हुए हैं। जिस मुख्यमंत्री अथवा किसी

मंत्री से काम कराने अथवा कोई योजना पास कराने के लिए विधायकों को गिड़गिड़ाना

पड़ता था उनके साथ अब उनकी नियमित बातचीत हो रही है। यह भी भारतीय लोकतंत्र

का दूसरा सुखद पहलु है। हां यह मान सकते हैं कि शायद इस खेल में भ्रष्टाचार भी शामिल

हो और बगावत करने वाले विधायकों को अलग से कुछ लाभ हो जाए। लेकिन पार्टी और

शीर्षस्थ नेताओं की नजर में उनकी भी कुछ अहमियत है यह फिर से समझ में आ रही है।

लेकिन मध्यप्रदेश ने फिर से साबित कर दिया है कि दरअसल देश के दोनों ही बड़े दल

राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं। दोनों ही दलों में नेतृत्व का संकट है और केंद्रीय

नेतृत्व इस संकट को स्थायी तौर पर सुलझाने का कोई इरादा भी नहीं रखता। मध्यप्रदेश

के सियासी हलचल में सबसे बड़ी बात ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होने

का है। उन्हें भले ही पार्टी में आते ही राज्यसभा का टिकट दे दिया गया हो लेकिन पार्टी के

अंदर इस फैसले से भी असंतोष बढ़ा है।

पार्टी के अंदर नेताओं और विधायकों की पूछ बढ़ी

पार्टी के अंदर श्री सिंधिया के आने के बाद भी उनके सारे समर्थक अंत तक उनके साथ खड़े

रह जाएंगे, इस पर अब सवाल उठ रहे हैं। बेंगलुरु के रिसार्ट में ठहराये गये कांग्रेस के बागी

विधायकों के मामले में ऐसे ही संकेत मिलने लगे हैं। वहां गये मध्यप्रदेश के मंत्री जीतू

पटवारी को जिस तरीके से पुलिस के द्वारा रोका गया, उससे साफ है कि कमरे में रखे गये

विधायकों पर उनके मेजबान को भी पूरा भरोसा नहीं है। महाराष्ट्र के घटनाक्रमों को याद

करें तो कुछ इसी तरीके से एनसीपी के अनेक विधायक गायब हो गये थे। बाद में कुछ लोग

देवेंद्र फडणवीस और अजीत पवार के शपथग्रहण समारोह में भी नजर आये थे। बाद में

सभी अपने अपने दड़वे में वापस लौटे। इसलिए कौन विधायक किस तरफ है इसे लेकर

पार्टी नेतृत्व का संदेह ही मध्यप्रदेश के सियासी गतिविधियों को गति प्रदान कर रहा है।

मध्यप्रदेश के सियासी गणित में यह बात साफ है कि कांग्रेस के अनेक विधायक

मुख्यमंत्री कमलनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के खफा है। दूसरी तरफ भाजपा

की तरफ से दोबारा शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनाये जाने की मांग का आंतरिक

विरोध हो रहा है। इसी वजह से गाहे बगाहे भाजपा के विधायक खुद कमलनाथ के यहां

नजर आने लगे थे। अब तो चर्चा है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को पार्टी में लाने से भी

मध्यप्रदेश भाजपा के कई नेता असंतुष्ट हैं। दरअसल यह गुटबाजी का खेल मध्यप्रदेश के

सियासी गलियारे में अलग किस्म की हलचल पैदा कर रहा है, जहां पार्टी के मुकाबले

नेताओं का निजी हित सर चढ़कर बोल रहा है। इससे पार्टी नेतृत्व को भी हर कदम फूंक

फूंककर रखने की आवश्यकता महसूस हो रही है। यह देखना रोचक होगा कि मध्यप्रदेश

की परिणति महाराष्ट्र अथवा कर्नाटक में से किसके जैसी होती है।

मध्यप्रदेश के सियासी गणित में पूर्व अनुभव का लाभ

महाराष्ट्र में अमित शाह की चाल को मराठा क्षत्रप शरद पवार से साफ कर दिया था। दूसरी

तरफ कर्नाटक में कांग्रेस की गुटबाजी का पूरा लाभ येदियुरप्पा ने उठाया है। ऐसे में

मध्यप्रदेश की लाटरी किस पार्टी को लगती है, यह देखना रोचक होगा। लेकिन इतना तो

साफ है कि पार्टियों के अंदर भी लोकतंत्र रहे और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों में से हरेक के

वोट की कीमत बराबर है, यह बात पार्टी नेतृत्व को अच्छी तरह समझ में आ रही है। हो

सकता है कि इससे पार्टियों के अंदर भी माहौल में कुछ सुधार हो और दलगत ढांचे के अंदर

अपनी अपनी जमींदारी चलाने वालों को नये सिरे से इस बात पर विचार करना पड़े कि

हरेक को साथ लेकर चलना भी सफलता के लिए जरूरी है। साथ ही बड़बोलेपन का नतीजा

खतरनाक होता है यह भी कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया का विवाद साफ कर

गया है। कमलनाथ ने श्री सिंधिया के एक बयान पर तल्ख टिप्पणी कर अपने लिए

परेशानी मोल ली थी। अब हो सकता है कि इस बड़े झटके बाद वह खुद भी अपने आचरण

में सुधार कर लें। दूसरी तरफ भाजपा के अंदर भी शिवराज सिंह चौहान यह समझ चुके

होंगे अब पहले जैसी स्थिति में मध्यप्रदेश का सियासी गणित नहीं रहा


 

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