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सारे बड़े वैक्सिन अनुसंधान अब तक बिल्कुल सही दिशा में बढ़ रहे

  • दो शोध केंद्रों का दूसरे फेज का ट्रायल चालू

  • भारत में तीनों वैक्सिन के ट्रायल की तैयारी

  • हर सूचना को साझा कर रहे हैं वैज्ञानिक

  • रुस का 12 अगस्त को वैक्सिन लाने का दावा

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः सारे बड़े वैक्सिन अनुसंधान अब तक की सूचनाओं के मुताबिक बिल्कुल सही

रास्ते पर ही बढ़ रहे हैं। इनके जांचने के लिए जेनेटिक वैज्ञानिक बहुत सावधानी से अपने

परीक्षण को आगे बढ़ा रहे हैं। इस क्रम में दो शोध केंद्रों ने अपनी वैक्सिन के दूसरे दौर का

क्लीनिकल ट्रायल प्रारंभ कर दिया है। दुनिया को जिस वैक्सिन से सबसे अधिक उम्मीदें

हैं, ऑक्सफोर्ड की वैक्सिन के क्लीनिकल ट्रायल का दूसरा दौर भी अगले सप्ताह प्रारंभ

होने जा रहा है। सारे बड़े शोधों के बीच रुस ने संकेत दिया है कि वह अपनी वैक्सिन का

परीक्षण लगभग समाप्त कर चुका है। इसलिए अंतिम रिपोर्ट आने और दवा के इस्तेमाल

संबंधी मंजूरी मिलने पर वह अगले सप्ताह ही अपनी वैक्सिन बाजार में उतार सकता है।

दूसरी तरफ चीन के द्वारा अपनी वैक्सिन के सफल होने के दावों के बीच वहां फिर से

कोरोना के मरीज पाये जाने लगे हैं। इनमें से सात लोगों की मौत भी हो चुकी है।

अब तक की सूचनाओं के मुताबिक कोवाक्सिन और जाईकोव-डी के दूसरे चरण का

क्लीनिकल ट्रायल प्रारंभ हो चुका है। इनमें से कोवाक्सिन स्वदेशी तकनीक पर आधारित

कोरोना वैक्सिन है जबकि दूसरी वैक्सिन का अनुसंधान जायड्स कैडिला के साथ मिलकर

किया जा रहा है। इन दोनों में ही बेहतर परिणाम मिले हैं, ऐसा इंडियन काउंसिल फॉर

मेडिकल रिसर्च का दावा है। इस बीच दुनिया का अन्यतम सबसे ज्यादा वैक्सिन बनाने

वाली संस्था सिरम इंस्टिट्यूट ऑक्सफोर्ड के शेष दो चरणों के क्लीनिकल ट्रायल के लिए

खुद को तैयार कर चुकी है। उसे भी इन दोनों चरणों के अनुसंधान की मंजूरी मिल चुकी है।

सारे बड़े अनुसंधानों में से ऑक्सफोर्ड रिसर्च पर अधिक ध्यान

ऑक्सफोर्ड की प्रस्तावित वैक्सिन का नाम एस्ट्राजेनेका कोविड 19 है। जिसके बारे में

ऑक्सफोर्ड के वैज्ञानिकों ने पहले ही स्पष्ट कर रखा है कि यह मुनाफा कमाने का कोई

परीक्षण नहीं है। सिर्फ इंसानों की रक्षा के लिए इसे तैयार किया जा रहा है। लिहाजा इसके

सफल होने के बाद पूरी दुनिया में अत्यंत कम लागत पर इसे हर देश में तुरंत उपलब्ध करा

दिया जाएगा। ऑक्सफोर्ड की जिस वैक्सिन का दूसरे और तीसरे चरण के क्लीनिकल

ट्रायल में भारत में इस्तेमाल होना है, उसका उत्पाद भी सिरम इंस्टिट्यूट में ही किया जा

रहा है। वह एक साथ देश के 17 स्थानों पर अपना क्लीनिकल ट्रायल प्रारंभ करने की

तैयारियों को अंतिम रुप प्रदान कर रहा है। इन सारे वैक्सिन अनुसंधान पर दुनिया भर के

वैज्ञानिक एक दूसरे से नजदीकी संपर्क बनाकर चल रहे हैं। हर ऐसे अनुसंधान के वैज्ञानिक

आंकड़ों को तुरंत साझा किया जा रहा है ताकि प्रगति की जानकारी दुनिया भर के जानकार

वैज्ञानिकों को रहे। इसमें से कई में 14 दिनों के भीतर शरीर के अंदर प्रतिरोधक तैयार होने

तथा 28 दिनों के भीतर कोरोना वायरस को मार डालने की क्षमता रखने वाले टी सेल का

विकास होने की पुष्टि हुई है। फिर से जान लें कि यह टी सेव वह सफेद रक्त कण के अंश

हैं, जो शरीर में वायरस के आने पर उसे स्पाइक प्रोटिन की मदद से शरीर में वंशवृद्धि करने

से रोक देते हैं। इस क्रम में शरीर में मौजूद प्रतिरोधक प्रोटिन के वैसे अंश बनाते हैं, जो

वायरस और उसके कवच के तौर पर काम करने वाले प्रोटिन के आवरण को भी काम करने

से रोक देते हैं। इसके इस्तेमाल से कुछ लोगों पर हुए साइड एफेक्ट भी अब तक न्यूनतम

हैं, जिन्हें सामान्य दवाइयों से नियंत्रित किया जा सका है।

भारत में भी क्लीनिकल ट्रायल के लिए स्वयंसेवक तैयार

भारत ने चल रहे अनुसंधान के तहत सभी वैक्सिनों के प्रयोग के लिए स्वयंसेवकों की सूची

भी बनायी गयी है। जिन्हें इसमें शामिल किया जा रहा है, वे सभी 18 साल से अधिक उम्र

के हैं। सिरम इंस्टिट्यूट ने अपनी तरफ से आइसीएमआर को बताया है कि उसकी तरफ से

यह ट्रायल पीजीआई चंडीगढ़, एम्स दिल्ली, एबीजे मेडिकल कॉलेज पुणे, आरएम रिम्स

पटना, एम्स जोधपुर, नेहरु अस्पताल गोरखपुर, आंध्र मेडिकल कॉलेज विशाखापत्तनम

और जेएसएस एकाडेमी मैसूर में प्रारंभ होने जा रहा है।

इस बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन ने रुस से यह आग्रह किया है कि वह बाजार में अपनी

वैक्सिन उतारने के पूर्व स्थापित वैश्विक मापदंडों का पालन करे। दरअसल रुस ने

प्रारंभिक स्तर पर अपने वैक्सिन रिसर्च के बारे में कुछ नहीं कहा था। अब वह अगले 12

अगस्त को इसे बाजार में लाने की बात कह रहा है। वैसे रुस का भी कहना है कि वैक्सिन

का व्यापारिक उत्पादन प्रारंभ करने में सितंबर माह का समय लगेगा और वह पहले ही

महीने में करोडों वैक्सिन तैयार कर दुनिया को उपलब्ध करा देगा। लेकिन इस बारे में

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि दुनिया में पहले से स्थापित मानदंडों में खरा

उतरने पर ही रुस को पूरी दुनिया में अपने वैक्सिन के प्रयोग की अनुमति दी जाएगी।


 

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