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जीवित बैक्टेरिया में अब डेटा रखने की तकनीक पर काम जारी

  • डीएनए श्रृंखलाओं में  होते हैं जीवन के खरबों संकेत

  • इसमें पहले से ही होते हैं खबरों कूट संदेश

  • ईकोली बैक्टेरिया पर किया गया है प्रयोग

  • पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित रहेगा यह आंकड़ा

राष्ट्रीय खबर

रांचीः जीवित बैक्टेरिया पर कई शोध चल रहे हैं। इनमें अभी कोरोना वायरस की काट का

शोध भी शामिल है। लेकिन सूचना तकनीक के जगत में इससे जुड़ी एक नई जानकारी

सामने आयी है। डीएनए श्रृंखला में अरबों खरबों ऐसे संदेश होते हैं, जो जीवन के इतिहास

और भविष्य के संकेत देते हैं। उदाहरण के लिए हम किसी इंसान की जेनेटिक कड़ियों का

जब विश्लेषण करते हैं तो यह पता चलता है कि वह अपने डीएनए में क्या कुछ अपने

पूर्वजों से हासिल कर आया है। साथ ही उनके गहन विश्लेषण से उसके आंतरिक बनावट

की खूबियों और खामियों का भी पता चल जाता है। इसी डीएनए की कड़ियों की मदद से

अनेक किस्म के जेनेटिक बीमारियों को सुधारने का काम भी चल रहा है। इस क्रम में अब

वैज्ञानिक इसी पद्धति से सामान्य इस्तेमाल के डेटा को भी जीवित बैक्टेरिया में संरक्षित

करने पर शोध कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि जब किसी जीवन की डीएनए

श्रृंखलाओं में इतने सारे कूटसंकेत रखे होते हैं तो वे निश्चित तौर पर अन्य संदेशों को

सुरक्षित रखने में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं। इस पर काम हो रहा है। प्रयोगशाला में

तैयार किये गये जीवित बैक्टेरिया में इस डेटा को रखने का काम प्रगति पर है। सूचना

तकनीक की दुनिया में इसे एक बड़े ही काम का अनुसंधान समझा जा रहा है। आम तौर

पर कंप्यूटर की बात करें तो लगातार हो रहे तकनीकों में बदलावों की वजह से डेटा रखने

की उपकरण बदलते चले जा रहे हैं। पहले दौर के कंप्यूटरों में डेटा रखने के लिए जो फ्लॉपी

ड्राइव इस्तेमाल किये जाते थे, वे सूचना तकनीक में बदलाव की वजह से अब इतिहास हो

चुके हैं। हर दौर में डेटा रखने के लिए नये नये उपकरणों की ईजाद हो रही है।

जीवित बैक्टेरिया बहुत कम स्थान में अधिक डेटा भंडारण करेगा

वर्तमान में पेन ड्राइव और पोर्टेबल हार्ड डिस्क इसके प्रचलित उदाहरण हैं। अब शोधकर्ता

मानते हैं कि किसी जीवित बैक्टेरिया में ऐसे आंकड़े सुरक्षित कर दिये जाएं तो वह लंबे

समय तक सुरक्षित और कालजयी तौर पर उपलब्ध रहेंगे।

जीवन की गाड़ी आगे बढ़ने के साथ साथ यह बैक्टेरिया भी इन आंकड़ों को अपने साथ

लेकर आगे बढ़ती रहेगी, जिन्हें बाद में आवश्यकता के अनुसार कभी भी वापस हासिल

किया जा सकेगा। अनुमान है कि बैक्टेरिया अपनी वंशवृद्धि के साथ ही इन आंकड़ों को भी

नये जीवन तक खुद ब खुद पहुंचा देंगे। ग्लैडस्टोन इंस्टिट्यूट और सॉन फ्रांसिसको के

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के बॉयो इंजीनियर सेठ शिपमैन कहते हैं कि यह भविष्य में

एक व्यापारिक परियोजना की शक्ल ले सकता है।

इसकी संभावना पर समर्थन करने वालों का तर्क है कि किसी भी डीएनए श्रंखला का घनत्व

किसी भी मौजूदा हार्ड डिस्क से एक हजार गुणा अधिक होता है। इसलिए वह अधिक डेटा

संरक्षित कर सकता है। उदाहरण के तौर पर मानें तो नमक के एक कण के बराबर के

डीएनए में दस सिनेमा स्टोर किये जा सकते हैं। इससे समझा जा सकता है कि डेटा रखने

में उपकरणों का आकार छोटा करने का काम भी इससे पूरा हो जाएगा। साथ ही उसमें रखे

गये आंकड़ों को लिखना और दोबारा वापस लेना अधिक सस्ता और समय की बचत करने

वाला साबित होगा। इसके लिए तकनीक का इस्तेमाल भी डेटा को और अधिक कम स्थान

लेने वाला बना देगा। हम जानते हैं कि वर्तमान में कंप्यूटर के आंकड़े दरअसल शून्य और

एक के तर्ज पर होते हैं। इसी शून्य और एक के आंकड़ों को किसी जीवित सेल के एडेनाइन,

गुवानाइन, क्राइटोसाइन और थाईमान पर स्टोर किया जा सकेगा। डीएनए श्रृंखला की

अपनी बनावट की वजह से वे कम स्थान में अधिक आंकड़ों का भंडारण कर सकेंगे।

नमक के एक छोटे कण के आकार में रखे जा सकेंगे दस फिल्म

किसी बैक्टेरिया में यह डेटा लिखे जाने पर वह स्वाभाविक तौर पर अगली पीढ़ी को यह

डेटा प्रदान करेगा। वर्ष 2017 में कोलंबिया विश्वविद्यालय के जीव विज्ञानी हैरिस वांग ने

इसके लिए सीआरआईएसपीआर जीन एडिटिंग की पद्धति से इस पर काम किया था।

इस पर जब शोध हुआ था तो पता चला था कि ईकोली बैक्टेरिया अपने अंदर फ्रूक्टोज को

शून्य और एक की तर्ज पर ही संरक्षित करता है। इस हिस्से को डेटा रखने के लिए काम में

लाया जा सकता है। हैरिस वांग ने अपने सहयोगियों की मदद से हैलो वर्ड का संदेश एक

ईकोली बैक्टेरिया में महज 72 बीट के आंकड़ों की मदद से रखने मे सफलता पायी थी। इस

तकनीक से डेटा को बैक्टेरिया के अंदर जिस विधि से लिखा गया है, उसी विधि के विपरीत

आचरण से दोबारा हासिल कर पाना संभव होगा। सिर्फ डीएनए श्रृंखला की बदौलत डेटा

संरक्षित करने का स्थान बहुत कम हो जाएगा और यह जीवित होने की वजह से उसके

संचालन में अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता भी नहीं होगी।

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