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अलास्का के पिघलते ग्लेशियरों की वजह से आयेगी भीषण सूनामी

  • बहुत बड़ा इलाका अचानक समुद्र में समा जाएगा

  • पहाड़ की ढलान पर स्थित हैं बहुत बड़े ग्लेशियर

  • किसी एटम बम के विस्फोट से ज्यादा प्रभाव होगा

  • वैज्ञानिकों ने बड़े खतरे के प्रति लोगों को आगाह कर दिया

राष्ट्रीय खबर

रांचीः अलास्का में जिस तरीके से ग्लेशियर पिघल रहे हैं, उससे कभी भी दुनिया के उन

तमाम इलाकों में बड़ा खतरा आ सकता है, जो समुद्र के किनारे हैं। वैज्ञानिकों ने साफ तौर

पर इसे पहले ही बता दिया है। उनका आकलन है कि वहां के हालात इतने गंभीर हैं कि यह

हादसा अगले एक वर्ष के भीतर भी और कभी भी हो सकता है। इसके आगे अलास्का के

इन ग्लेशियरों का अपने मूल से टिके रहने की कोई गारंटी नहीं है। जब कभी वे टूटकर

समुद्र में आये तो यह एक चेन रियेक्शन की तरह दुनिया भर के समुद्रों के रास्ते उन

स्थानों पर तबाही ला देगी जो समुद्री तटों के करीब बसे हुए हैं। अगले एक साल के भीतर

संकट गहराने के बारे में समुद्री विज्ञान के वैज्ञानिकों का मानना है कि इस इलाके के

विशाल ग्लेशियर अब अंदर से खोखला होने की वजह से बाहर से जितने बड़े दिखते हैं,

उतने बड़े रह नहीं गये हैं। साथ ही अंदर से खोखला होने की वजह से मूल भूखंड से उनका

जुड़ाव बहुत कम रह गया है। इसलिए वजन की वजह से वे कभी भी गुरुत्वाकर्षण के दबाव

में सीधे समुद्र के अंदर गिर सकते हैं। अगर अलास्का का कोई एक बड़ा ग्लेशियर समुद्र में

जा गिरा तो उससे जो लहर पैदा होगी, उसकी वजह से अन्य खोखला हो चुके ग्लेशियर भी

एक एक कर समुद्र में जा गिरेंगे। फिर अचानक से भीषण सूनामी का आना तय है।

अलास्का में ग्लेशियरों पर लगातार हो रही है निगरानी

इस पर लगातार निगरानी करने वाले वैज्ञानिकों के दल ने कई ऐसे ग्लेशियरों की पहचान

कर ली है जो दूसरों के मुकाबले अधिक खतरनाक अवस्था में पहुंच गये हैं। खास तौर पर

अलास्का के प्रिंस विलियम साउंड इलाके को लेकर वैज्ञानिकों की चिंता अधिक है। इस

इलाके में ग्लेशियर पहाड़ की ढलान पर है। बैरी आर्म नामक पर्वत पर स्थित बैरी ग्लेशियर

आकार में बहुत बड़ा है और ढलान पर होने की वजह से वह काफी तेजी से समुद्र में गिर

सकता है। वैज्ञानिकों ने इस बात की भी चेतावनी दी है कि इन खतरनाक इलाकों में

अधिक पर्यटकों का पहुंचना, मछली मारने वाली नौकाओं अथवा शिकारियों का होना जैसा

कोई भी कारण सूनामी पैदा कर सकता है। वैसे दरअसल इस गड़बड़ी का मूल कारण

मौसम में बदलाव और प्रदूषण का बढ़ना ही है। अब हालत ऐसे हो चुके हैं कि जितनी बर्फ

पिघल रही है, उस मुकाबले बहुत कम बर्फ इन ग्लेशियरों पर एकत्रित हो रही है।

वैज्ञानिक इसके लिए अपनी नजरों के अलावा सैटेलाइटों से प्राप्त होने वाली तस्वीरों पर

भी नजर रखे हुए हैं। इससे पता चल रहा है कि कौन कौन से इलाकों में अलास्का के

ग्लेशियर कम होते चले जा रहे हैं। ऊपर से पिघलने वाले ग्लेशियर समुद्र में जब तेजी से

फिसलते हुए जा गिरेंगे तो जाहिर है कि इससे बड़ी लहर पैदा होगी। आम तौर पर ग्लेशियर

का धीरे से पिघलकर समुद्र में जाना उतना खतरनाक नहीं है लेकिन किसी पहाड़ की

ढलाने से तेज गति से ग्लेशियर का समुद्र में जा गिरना निश्चित तौर पर बड़ी सूनामी पैदा

करने वाली स्थिति है। यह कभी भी घटित हो सकता है।

ग्लेशियरों की वजह से पहले भी आ चुकी है सूनामी

समुद्री विज्ञान के वैज्ञानिकों ने बताया है कि इसके पहले भी ऐसी घटनाएं घट चुकी हैं।

पिछले कई दशक में इन घटनाओं का रिकार्ड मौजूद है। अलास्का के तियान फियोर्ड में वर्ष

2015 के अक्टूबर माह में ऐसी ही घटना घटी थी। ग्लेशियर के समुद्र में जा गिरने की वजह

से 633 फीट ऊंची लहरे उठी थी और यह पंद्रह मील की दूरी पर भी 35 फीट ऊंची होकर

पहुंची थी। इसके अलावा कैरोट फियोर्ड इलाके में जून 2017 में इसी वजह से जो सूनामी

पैदा हुई थी, उससे चार लोग मारे गये थे। घटनास्थल से बीस मील की दूरी पर स्थित शहर

नूआगाटिसियाक लगभग तबाह हो गया था। वहां के लोग अब भी अपने घरों में इसलिए

वापस नहीं लौटे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि परिस्थितियां अब भी वैसी ही बनी हुई है।

लेकिन इस बार बैरी आर्म का इलाका खतरे में है, जहां का ग्लेशियर पूर्व की इन घटनाओं

के मुकाबले बहुत बड़ा ग्लेशियर है। जाहिर है कि यहां भी अगर वैसी स्थिति आयी तो

सूनामी की लहरें और ऊंची होगी और उसका असर भी काफी दूर तक जाएगा। इस बारे में

पूर्व के इतिहास में आंकड़े दर्ज हैं। वर्ष 1958 में जब ऐसी ही एक सूनामी आयी थी तो समुद्र

में 1720 फीट ऊंची लहर उठी थी और उसका असर किसी एटम बम के विस्फोट के जितना

था। ओहियो विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिक चूनली देई कहते हैं कि सारे आंकड़े और पूर्व

के अनुभव के आधार पर यह माना जा सकता है कि अगर ऐसा हुआ तो अलास्का में वर्ष

1958 से मुकाबले 16 गुणा अधिक बड़ी सूनामी पैदा होगी।

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