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छोटे दलों को जोड़कर बड़ी चुनौती खड़ी कर रहे हैं अखिलेश




  • सवाल है कि क्या सारे सहयोगी दल चुनाव के बाद भी एकजुट रह पायेंगे
  • भीम आर्मी के साथ भी सपा का गठबंधन बना और टूटा
  • दलबदलुओं को पसंद नही कर रहे हैं आम मतदाता
  • छोटे दलों का वोट मिला तो सपा को फायदा
राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः छोटे दलों को जोड़कर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने निश्चित तौर पर अब भाजपा के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। इसके बीच ही यह सवाल भी उभर रहा है कि जो दल अखिलेश के साथ जुड़ रहे हैं, क्या वे आगे भी एकसाथ रह पायेंगे।




पूर्व के अनुभवों के आधार पर ऐसी आशंका स्वाभाविक है क्योंकि सभी छोटे दलों का अपना अपना राजनीतिक एजेंडा है। इसका ताजा उदाहरण भीम आर्मी का सपा से मोहभंग होना है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से मुलाकात के 24 घंटे में चंद्रशेखर आजाद का मोह भंग हो गया।

आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ने अखिलेश को दलित विरोधी बताया और कहा कि हम समाजवादी के साथ गठबंधन में नहीं जा रहे हैं। आजाद समाज पार्टी (आसपा) के संस्थापक अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ने शनिवार को लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस की।

इस दौरान चंद्रशेखर आजाद ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव पर जोरदार हमला बोला। चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि अखिलेश यादव सामाजिक न्याय का मतलब नहीं समझते हैं। अखिलेश ने दलितों का अपमान किया है।

इससे पहले, आजाद समाज पार्टी (आसपा) के संस्थापक अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ने शुक्रवार को सपा दफ्तर में अखिलेश यादव से मुलाकात की थी। दोनों नेताओं के बीच करीब एक घंटे तक बैठक हुई थी। चंद्रशेखर ने कहा था कि उनका सपा से गठबंधन लगभग तय है। जल्द ही सीटों का बंटवारा हो जाएगा।

छोटे दलों का अपना अपना जनाधार तो हैं

दूसरी तरफ चुनाव से ठीक पहले भाजपा में भगदड़ मच गई है। पिछले 3-4 दिनों में तीन मंत्री समेत एक दर्जन से अधिक विधायकों ने पार्टी छोड़ दी है। शुक्रवार को स्वामी प्रसाद मौर्य और धर्म सिंह सैनी के अलावा कई विधायकों ने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। इस बड़े दलबदल से सवाल उठ रहे हैं कि क्या इससे योगी सरकार के खिलाफ माहौल बन रहा है?

चंद्रशेखर के जरिए दलितों का भले ही पूरा वोट गठबंधन के साथ न आए, लेकिन हर सीट पर चार से पांच हजार वोट जरूर मिल सकता था। यह वोट सपा के लिए पश्चिमी यूपी में गेमचेंजर हो सकता था। सपा न इन पार्टियों सेकिया गठबंधन सपा नेविधानसभा चुनाव के लिए सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट), राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी), अपना दल (कमेरावादी), प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया), महान दल, टीएमसी सेगठबंधन किया है।




वैसे इस बीच जारी ताजा सर्वेक्षण रिपोर्ट में अब भी भाजपा की गाड़ी ही सबसे आगे चल रही है। दरअसल पार्टी बदलने वालों के खिलाफ 63 प्रतिशत लोग पाये गये ह । लेकिन इस सर्वे के साथ साथ यह सवाल जुड़ा हुआ है कि ऐसा ही सर्वे पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के पूर्व भी हुए थे, जिनमें भाजपा को दो सौ से अधिक सीट मिलने का अनुमान बताया गया था।

अकेले प्रशांत किशोर ने यह कहा था कि पश्चिम बंगाल में भाजपा दहाई अंक से ऊपर भी नहीं जा पायेगी। इसलिए अब अचानक से ओबीसी का मुद्दा सामने आ जाने की वजह से इन सर्वेक्षणों का अंततः क्या नतीजा निकलेगा, यह कह पाना कठिन है।

सर्वे में अब भी भाजपा की जीत ही तय नजर आयी

वैसे सी वोटर ने इस सवाल को लेकर ताजा सर्वे किया है। सर्वे में लोगों से सवाल किया गया कि क्या मंत्रियों के इस्तीफे से योगी सरकार के खिलाफ संदेश गया? इसके जवाब में 51 फीसदी लोगों ने ‘ना’ कहा। वहीं, 42 फीसदी लोगों ने कहा कि हां सरकार के खिलाफ संदेश जा रहा है। 7 फीसदी ने कहा कि वह इसका साफ जवाब नहीं दे सकते हैं।

वहीं सी वोटर ने एक और सवाल लोगों से पूछा कि दलबदलू नेताओं के बारे में उनकी राय क्या है। इसके जवाब में 63 फीसदी लोगों ने इन नेताओं को मौकापरस्त बताया तो 21 फीसदी ने कहा कि ये उपेक्षित हैं। वहीं, 16 फीसदी ने ‘पता नहीं’ जवाब दिया।

सर्वे में लोगों से यह भी पूछा गया कि क्या बीजेपी छोड़कर आ रहे नेताओं से अखिलेश यादव को फायदा होगा? 48 फीसदी लोगों ने कहा कि समाजवादी पार्टी को इस दलबदल से फायदा नहीं होने जा रहा है। वहीं, 36 फीसदी लोगों ने कहा कि हां, अखिलेश को फायदा होगा, जबकि 16 फीसदी लोगों ने ‘पता नहीं’ जवाब दिया।

सर्वे के मुताबिक अभी भाजपा के पास 37.2 तथा सपा के पास 35.1 प्रतिशत वोट होने का अनुमान है। अब छोटे दलों के साथ आने से अगर यह अंतर पाटा जा सका तो चुनावी परिणाम इसके उलट भी हो सकता है। क्योंकि सर्वे के मुताबिक कांग्रेस के पास 9.7, बसपा के पास 12.1 अन्य के पास : 5.8 वोट है। जातिगत समीकरणों के तेजी से उभरते जाने की वजह से यह सब कुछ बदल सकता है। इससे अलग किसानों की भाजपा के प्रति नाराजगी का एक अलग समीकरण पहले से ही कायम है।



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