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अखिलेश और जयंत ने हाथ मिलाया तो शेखावत मिले कैप्टन से




चुनावी चकल्लस

पश्चिमी उत्तरप्रदेश की हवा में कमल फूल मुरझाने की संभावना अधिक है
पश्चिमी उत्तरप्रदेश की हालत भाजपा के लिए ठीक नहीं
पिछली बार इस इलाके से जबर्दस्त सफलता मिली थी
पंजाब में केजरीवाल का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है
राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः अखिलेश और जयंत की संयुक्त रैली ने यह साफ कर दिया कि अब उत्तरप्रदेश में भाजपा की राह आसान नहीं रही। पिछले चुनाव में जिस इलाके से भाजपा को जबर्दस्त जनसमर्थन हासिल हुआ था, वहां के अधिकांश गांवों में भाजपा के नेता नहीं जा पा रहे हैं।




यहां तक कि अपने रिश्तेदारों के यहां समारोह में भाग लेना भी उनके लिए मुश्किल हो गया है। कृषि कानूनों की औपचारिक वापसी और संभावित समाधान के बीच भी लोग भाजपा द्वारा इसी किसान आंदोलन को लेकर क्या कुछ कहा गया था, उसे याद रखे हुए हैं।

ऐसे में मोदी और योगी के साथ साथ अमित शाह का चुनावी पैंतरा कितना काम आयेगा, इस पर संदेह होना स्वाभाविक है। वैसे भी पिछले चुनाव के वक्त किये गये अधिकांश वादे पूरे नहीं हो पाये हैं।

दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ के बयानों ने यहां के लोगों को और नाराज कर दिया है। यह समझ लेना होगा कि मेरठ के दंगों की पीड़ा से मिले अनुभव की वजह से ही अब तक किसान आंदोलन के बीच हिंदू मुसलमान का कार्ड असर खो चुका है।

किसान नेता राकेश टिकैत ने इस चाल को भांपते हुए समय समय पर किसानों को आगाह भी किया है। नतीजा सबसे सामने है। यह जान लें कि पश्चिमी उत्तरप्रदेश में कुल विधानसभा सीटों की संख्या 136 है और पिछले चुनाव में यहां की 16 जिलों की 109 सीटों पर भाजपा की जीत मिली थी। अब किसान आंदोलन की वजह से वह सारा समीकरण बदल चुका है, इस पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।

अखिलेश और जयंत की रैली में हुई थी जबर्दस्त भीड़

मेरठ की संयुक्त रैली में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने साफ तौर पर खुले मंच से भाजपा के कमल फूल को एक नकली फूल करार दिया जिससे कभी भी सुगंध नहीं आती। अखिलेश और जयंत की इस विशाल रैली में मौजूद लोगों की भीड़ को ही अगर पैमाना माना जाए तो यह समझा जा सकता है कि इस इलाके पर अब भाजपा की पकड़ बिल्कुल कमजोर हो चुकी है।

इसके पीछे की असली वजह लेकिन किसान आंदोलन ही है। इसी किसान आंदोलन के बारे में भाजपा के नेताओं द्वारा समय समय पर की गयी बयानबाजी का असली असर अब देखने को मिल रहा है। छोटे छोटे दलों को अपने साथ जोड़कर अखिलेश यादव ने भाजपा के लिए इलाका वार चुनौती खड़ी करने में सफलता पायी है।




इसी वजह से अब उत्तरप्रदेश में भाजपा को एकतरफा जीत मिलने पर संदेह उत्पन्न हो चुका है। भाजपा द्वारा विकास के जो दावे किये जा रहे हैं, उससे किसानों को ऐसा नहीं लगता कि उनके लिए जो चुनावी वादे किये गये थे, वे पूरे हुए हैं। मसलन गन्ना किसानों के बकाया भुगतान का इस आग को भड़काने के लिए पर्याप्त है।

ऐसे में सपा और आरएलडी का गठबंधन निश्चित तौर पर किसानों के इस इलाके में कमल फूल के लिए अच्छी पैदावार के संकेत नहीं दे रहे हैं। इन इलाकों में भाजपा के झंडाबरदार कहे जाने वाले नेता भी किसान आंदोलन के बाद से परदे के पीछे चले गये हैं।

किसान आंदोलन ने भाजपा को समाज से काटकर रख दिया है

दूसरी तरफ मेरठ की रैली में जयंत चौधरी ने भी लोगों को इस बात के लिए फिर से आगाह किया है कि भाजपा दरअसल अपने पुराने हिंदू मुसलमान के नाम पर ही समाज को बांटना चाहती है। उसका जनता की भलाई से कुछ लेना देना नहीं है। यानी इस इलाके में कीचड़ में फंसे कमल फूल को खुद मोदी भी निकाल पायेंगे, इस पर अभी संदेह बढ़ता ही जा रहा है।

पंजाब की बात करें तो भाजपा के प्रदेश प्रभारी और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत की कैप्टन अमरिंदर सिंह से भेंट हुई है। इससे साफ हो गया है कि अब भाजपा के लिए शिरोमणि अकाली दल प्राथमिकता नहीं रही। वह कांग्रेस के उस वोट बैंक पर डाका डालना चाहती है तो पिछले चुनाव में कांग्रेस की सरकार के गठन का रास्ता बनाने वाला था।

श्री शेखावत और कैप्टन की मुलाकात का यही नतीजा निकलता है। यह भेंट तब हुई है जब पंजाब प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष अश्विनी शर्मा दावा कर रहे हैं कि उनकी पार्टी सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस छोड़ने के बाद लोक कांग्रेस पार्टी का गठन कर लिया है।

श्री शेखावत के साथ उनकी मुलाकात गठबंधन को लेकर ही हुई होगी, यह स्वाभाविक सोच है। शिरमणि अकाली दल की तैयारियां अलग हैं। लेकिन इस बार पंजाब के चुनाव में इन सारे दलों को जिससे गर्मी का एहसास हो रहा है वह आम आदमी पार्टी ही है। जिसके बारे में सर्वेक्षणों में ही अच्छे संकेत लगातार मिल रहे हैं क्योंकि दिल्ली में इस सरकार ने जनता के हित में काम कर खुद को साबित कर लिया है।



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