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अकबर ने कराया था रामायण का फारसी अनुवाद

  •  उस वक्त भी धार्मिक तनाव बहुत अधिक होता था

  •  पांच वर्षों में पूरा हुआ था फारसी में अनुवाद का काम

  •  अकबर की मां की पुस्तकों में था यह संस्कृत रामायण

  •  अनुवाद करने वाले को 550 सोने की मुद्राएं मिली थी

नईदिल्लीः अकबर का नाम भी श्रीराम के साथ सिर्फ अनुवाद की वजह से जुड़ा रहा

श्रीराम मंदिर के भूमि पूजन के बाद वहां से जुड़े कई ऐतिहासिक घटनाक्रमों का अलग

अलग उल्लेख प्रासंगिक है। इस क्रम में लोगों को यह जान लेना चाहिए कि देश में अनेक

रामायण लिखे गये हैं। शोध के दौरान 23 अलग अलग प्रकार के रामायणों के होने का

उल्लेख अनेक बार किया गया है। मूल रामायण के रचयिता के नाम पर हम वाल्मिकी को

जानते हैं। लेकिन उसे आम हिंदीभाषियों के बीच लोकप्रिय बनाने का काम किया था

गोस्वामी तुलसीदास ने। अवधि में लिखी गयी उनकी कृति राम चरित मानस अब एक

कालजयी रचना बन चुकी है। साथ ही गोस्वामी तुलसीदास में भी इसी वजह से काल से परे

जा चुके हैं। लेकिन इस प्रकरण में यह रोचक तथ्य है कि मुगलों के शासनकाल में खुद

अकबार ने भी इसका फारसी में अनुवाद कराया था। इसकी घटना और उसकी पृष्टभूमि

भी काफी रोचक है। जिसकी चर्चा बहुत कम हुई है।

फारसी में अनुवाद के राजनीतिक कारण थे

अकबर द्वारा रामायण का फारसी में अनुवाद कराने की पीछे भी एक दूरदर्शी सोच थी,

ऐसा इतिहासकारों ने कहा है। दरअसल मुगल आक्रमण के बाद भी पराधीन जनता के मन

में इस्लाम और विदेशियों के प्रति जो नफरत थी, वह अक्सर ही किसी न किसी बहाने

आग उलगती रहती थी। हिंदू और मुसलमानों के बीच की यह दूरी इस वजह से भी थी

क्योंकि मुसलमानों को रामायण के बारे में बहुत कम जानकारी थी। यहां तक कि उस

दौरान विदेशी हमले में जिनलोगों ने धर्म बदला था, वे भी इस बारे में अधिक जानकारी

नहीं रखते थे। अकबर ने समझा था कि इस विवाद के पीछे का एक कारण एक दूसरे के

धर्म की समझ का कम होना भी है। इसी वजह से उन्होंने उस काल के भारतवर्ष में सबसे

अधिक चर्चित धार्मिक ग्रंथ रामायण का फारसी में अनुवाद कराया था। उस काल की

विवेचना करने वाले इतिहासकारों का मत है कि शायद अकबर इसके जरिए जो विद्वेष

फैला हुआ था, उसे कम करना चाहते थे। वह लोगों को बिना कुछ बोले भी यह भी बताना

चाहते थे कि सभी धर्मों का मूल ईश्वर एक ही है लेकिन अलग अलग धर्म और पंथ के

अनुयायी उसे अलग अलग तरीके से मानते हैं। इसी अलग अलग विधि की वजह से ही

कम पढ़े लिखे अनुयायी दूसरे धर्म के कट्टर विरोधी बन जाते थे।

अकबर की मां के पास थी रामायण

ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि फारसी में इस रामायण के अनुवाद की जिम्मेदारी मुल्ला

अब्दुल कादिर बदायूनी को सौंपी गयी थी। यह शायद 1584 के आस पास की घटना है।

लेकिन वह खुद यह काम नहीं करना चाहते थे। बदायूनी ने रामायण का अनुवाद नहीं

करने की बात जाहिर भी कर दी थी। इसके बाद बी बादशाह के हुक्म से रामायण के फारसी

अनुवाद का काम प्रारंभ हुआ और ऐतिहासिक तथ्यों के मुताबिक यह काम 1589 में

समाप्त हुआ था। इस फारसी रामायण में 176 मनोहर रेखांकन भी शामिल किये गये हैं।

संस्कृत के मूल रामायण में ऐसे चित्र आदि नहीं है। इस फारसी रामायण की एक प्रति

आज भी जयपुर के सवाई मान सिंह म्युजियम में सुरक्षित है।

जयपुर में सुरक्षित है इसकी एक प्रति

इतिहासकारों ने लिखा है कि दरअसल जिस रामायण का अनुवाद किया गया वह अकबर

की मां हामिदा बानो की थी। वह पुस्तक पढ़ने की शौकीन थी। उन्होंने इस काल के अनेक

दुर्लभ पुस्तकों का संग्रह अपने लिये किया था। उनमें से कई ग्रंथ ऐसे भी थे जो मुगलकाल

के पहले के थे। फारसी रामायण को लोगों के लिए जारी करने के पहले खुद हामिदा बानो ने

उसे ध्यान से पढ़ा था। ऐसा जयपुर के म्युजियम में रखे फारसी रामायण के दस्तावेजों से

ही स्पष्ट होता है। इसमें बाद में जहांगीर और औरंगजेब के हाथ से लिखे दस्तावेजी प्रमाण

मौजूद हैं। अब अंत में यह भी जान लीजिए कि इस संस्कृत रामायण के फारसी अनुवाद के

पारिश्रमिक के तौर पर उस काल में 550 स्वर्ण मुद्राएं मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी दी

गयी थी।


 

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