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नामांकन के ठीक पहले मतदाताओं का बताया भागलपुर का मिजाज

  • कोरोना काल में तो चुनाव नहीं कराना था

  • अजीत शर्मा तो कोरोना काल में सक्रिय रहे

  • किसी दूसरे नेता का तो चेहरा भी नहीं दिखा

  • वर्तमान विधायक की सक्रियता से संतुष्ट है लोग

ब्यूरो प्रमुख

भागलपुरः नामांकन के ठीक एक दिन पहले भागलपुर विधानसभा के मतदाताओं का

तेवर बहुत कुछ स्पष्ट होने लगा है। कई मुद्दों पर वर्तमान विधायक अजीत शर्मा के

खिलाफ लगने वाले आरोपों के संबंध में आम मतदाताओं ने भी अपनी राय बेबाक तरीके

से रखी। इससे उनका पलड़ा फिलवक्त भारी दिख रहा है। 

वीडियो में देखिये इस युवती ने क्या कुछ कहा

 

इसी सर्वेक्षण के दौरान अल्पसंख्यक परिवार की एक महिला ने राजनीतिक दलों की

सक्रियता पर साफगोई से अपनी बात रखी। मंतशा इस्माइल नाम की यह युवती इंटर पास

है। लेकिन इस संवाददाता के सवालों का उन्होंने जिस तरीके से उत्तर दिया, वह आज की

पीढ़ी के मतदाताओं की तेजी से बदली सोच की एक बानगी भर है। मंतशा ने उन मुद्दों पर

भी श्री शर्मा का मजबूती के साथ दबाव किया। उन्होंने कहा कि भोला पुल और हवाई अड्डा

पर जो आरोप लग रहे हैं, उसकी सच्चाई से आम जनता अच्छी तरह वाकिफ है। यह दोनों

काम अगर नहीं हुए हैं तो क्यों नहीं हुए हैं, यह भी जनता जानती है। लेकिन जिस बात की

तरफ पत्रकारों का ध्यान नहीं जा रहा है, वह यह है कि कोरोना संकट के दौर में अकेले

विधायक अजीत शर्मा ही हर व्यक्ति के लिए सहज उपलब्ध रहे हैं और उन्होंने अपने स्तर

पर लोगों को भरसक मदद की है। मंतशा ने कहा कि सुबह से शाम तक अपने यहां आने

वालों की भरसक मदद करने वाले श्री शर्मा के अलावा कोई दूसरा नेता भी रहा है तो कोई

बताये। उनके मुताबिक वर्तमान विधायक से मदद के लिए किसी परिचय की आवश्यकता

नहीं थी। हर किसी की उन्होंने मदद की। यह पूछे जाने पर कि क्या वह कांग्रेस अथवा

विधायक की समर्थक हैं तो मंतशा का उत्तर था कि जी नहीं वह किसी राजनीतिक

विचारधारा अथवा नेता की समर्थक नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि जब कोई ईमानदारी

से लोगों के लिए काम करता है तो उसका उल्लेख भी अवश्य किया जाना चाहिए।

नामांकन के पहले कोरोना के दौरान उनके मौजूद होना महत्वपूर्ण

एक अन्य प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि पहले को इस संकट के दौर में चुनाव होना ही

नहीं चाहिए था। अभी तो सरकार की यह जिम्मेदारी बनती थी कि वह लोगों को दो वक्त

की रोटी देती और जो हालात बिगड़े हुए हैं, उसे सामान्य बनाने में अपनी ताकत खर्च

करती। लेकिन अगर चुनाव कराना मकसद ही है तो जनता तो इसी बात पर अपना फैसला

सुनायेगी कि संकट की इस घड़ी में कौन से नेता उनके बिल्कुल करीब रहे हैं और किन

नेताओं का चेहरा पूरे कोरोना संकट काल में नजर ही नहीं आया है।

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