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किसान कानून भी दूसरी नोटबंदी ना साबित हो

किसान कानून के मुद्दे पर बहस को फिर से दूसरे प्लेटफॉर्म पर धकेल देने की साजिशें हो

रही है। नियमों का उल्लंघन करने वालों के लिए चाय लेकर पहुंचे उप सभापति हरिवंश के

आचरण के समर्थन और विरोध में दलीलें दी जा रही है। लेकिन इसमें असली मुद्दा

किसानों का गौण होता नजर आ रहा है। नोटबंदी के साथ इसकी तुलना इसलिए लाजिमी

है क्योंकि अचानक की नोटबंदी के पूर्व यह दावा किया गया था कि इससे सारा काला धन

बाहर आ जाएगा और देश में काला धन नहीं होने के बाद खुशहाली आयेगी। बाद में क्या

कुछ हुआ यह सबकी आंखों के सामने है। लेकिन इस बात को समझ लेना चाहिए कि

भारत अब भी कृषि प्रधान देश है और देश की पूरी अर्थव्यवस्था इस वक्त खेती पर ही

सबसे अधिक निर्भर है। अच्छी बात है कि मजदूरों के महानगरों से गांव लौट जाने की

वजह से गांव में हर किस्म की खेती अच्छी हुई है। यह फसल बाजार में आने के बाद पैसे

का प्रवाह तेज होने की उम्मीद है। किसान भी बेहतर स्थिति में हैं क्यों कि दूर दराज में

अधिकांश घरों तक सरकारी मुफ्त राशन पहुंचा है। राज्यसभा में सदस्यों का हंगामा,

निलम्बन से लेकर सभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का घटनाक्रम इतनी तेजी से

घट रहा है, यह विश्वास नहीं हो रहा कि यह विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र का उच्च सदन है ।

आचरण से नहीं लगा कि यह संसद का उच्च सदन भी है

विषय किसानो को राहत को लेकर पारित विधेयक है, और सारे राजनीतिक दल इस बड़े

वोट बैंक को अपने कब्जे में रखने के लिए संसदीय और असंसदीय आचरण में भेद नहीं

कर पा रहे हैं। जैसे राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू ने उपसभापति हरिवंश के

खिलाफ आये विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव को खारिज कर दिया और कहा कि यह उचित

प्रारूप में नहीं था।

किसान कानून की बात पर दूसरी चर्चा निरर्थक

प्रश्न यह है कि राज्य सभा के माननीय इतनी छोटी सी प्रक्रिया भी कब सीखेंगे ?वहीं,

रविवार को सदन में अमर्यादित आचरण को लेकर विपक्ष के 8 सदस्यों को सत्र की शेष

अवधि के लिए निलंबित कर दिया गया। सभापति नायडू कि इस टिप्पणी के भी गहरे अर्थ

हैं। एक दिन पहले उच्च सदन में कुछ विपक्षी सदस्यों का आचरण दुखद, अस्वीकार्य और

निंदनीय है तथा सदस्यों को इस संबंध में आत्मचिंतन करना चाहिए। टीवी पर दिखाए

गये दृश्यों में साफ दिखता है कि रविवार को हुए हंगामे में सदस्यों ने कोविड 19 संबंधी

सामाजिक दूरी के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन तो किया ही इसके अलावा उन्होंने

उपसभापति हरिवंश के साथ बदसलूकी की। माइक उखाड़े गए और नियमों की पुस्तिका

फेंकी गयी। उप सभापति साथ अमर्यादित आचरण किया गया। आज सभापति नायडू ने

तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन को ‘नेम’ करते हुए उन्हे बाहर का रास्ता दिखा दिया। 

इन तमाम घटनाक्रमों के बीच आपसी विवाद और दांव-पेंच का खेल को नजर आया पर

किसान कानून के मुद्दे पर आम किसान क्या कुछ राय रखना है, इसपर अब तक पर्दादारी

रही। जब देश में नोटबंदी लागू की गयी थी तब भी राष्ट्रभक्ति का एक जज्बा उछाला गया

था। उसी जज्बे की वजह से नोटबंदी आलोचना करने वालों को तुरंत पाकिस्तान चले जाने

की भी काफी नसीहतें दी गयी थी।

नोटबंदी का परिणाम तो अब देश के सामने है

आज हम पीछे पलटकर देखते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि दरअसल नोटबंदी का

फैसला गलत था। इससे देश की अर्थव्यवस्था को वह सारे  नुकसान उठाने पड़े, जिनके

बारे में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के लिखित तौर पर आगाह किया था। डॉ सिंह को

मौन मोहन कहकर उनका मजाक उड़ाने वाले आज के दौर में उन तथ्यों पर चर्चा से न

सिर्फ बचते हैं बल्कि भाग जाने का रास्ता खोजते हैं। इसी वजह से यह भय स्वाभाविक है

कि कहीं किसान कानून भी जिस दावे के साथ इतने जोरदार तरीके से प्रस्तुत किया गया

है, उसके अंदर का हाल नोटबंदी के जैसा ही ना हो।


 

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